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जलवायु परिवर्तन क्यों नहीं बनता चुनावी मुद्दा!

  • सोनम लववंशी
    देश में चुनावी पारे के साथ ही गर्मी अपने प्रचंड अवतार में है। एक तरफ़ तो जहां देश की राजनीति में भाषा का स्तर गिर रहा है। नेता येन केन प्रकारेण चुनावी मैदान फ़तह करने की जुगत में लगे हुए है तो वहीं बढ़ती गर्मी भी अपने पूरे शबाब में है। विडंबना देखिए कि देश के 2 सबसे बड़े दल अपने अपने चुनावी घोषणा पत्र को लेकर बड़े बड़े दावे कर रहे हैं। एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। लेकिन किसी भी राजनीतिक दल के घोषणा पत्र में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे गम्भीर मुद्दे का कोई जिक्र ही नहीं है।
    विश्व भर में जलवायु परिवर्तन एक विकट समस्या बन चुका है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन वैश्विक समाज के समक्ष मौजूदा दौर की सबसे बड़ी चुनौती है और इससे निपटना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। आंकड़ों पर गौर करें तो 19वीं सदी के अंत से अब तक पृथ्वी की सतह का औसत तापमान लगभग 1.62 डिग्री फॉरनहाइट बढ़ गया है। जबकि समुद्र के जल स्तर में भी लगभग 8 इंच की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अब समय आ गया है कि जलवायु परिवर्तन की दिशा में गंभीरता से न केवल विचार किया जाए बल्कि इस दिशा में उचित कदम भी उठाए जाए। वैसे पिछले कुछ दशकों में बाढ़, सूखा और बारिश आदि की अनियमितता काफी बढ़ गई है। ये सभी कहीं न कहीं जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप ही हो रहा है। कुछ स्थानों पर औसत से अधिक वर्षा हो रही है, तो कुछ स्थान भयंकर सूखे की मार झेल रहें हैं। वर्ल्ड बैंक ने भी इस विषय पर गम्भीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि बढ़ता तापमान, बारिश के पैटर्न में बदलाव, ग्राउंडवाटर लेवल में गिरावट, पिघलते ग्लेशियर और समुद्री स्तर में गिरावट की वजह से आजीविका, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा संकट खड़ा हो रहा है।
    जर्मन सेंटर फॉर इंटीग्रेटिव बायोडायवर्सिटी के रिसर्च की माने तो सदी के मध्य तक जलवायु परिवर्तन जैव विविधता में गिरावट का मुख्य कारण बन जाएगा। दुनियाभर में जैव विविधता में 11 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ‘एशिया में जलवायु की स्थिति 2023’ रिपोर्ट के अनुसार, गर्म मौसम, बार-बार आने वाली गर्मी की लहरों और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के साथ, एशिया दुनिया में सबसे अधिक आपदा-प्रवण क्षेत्र में अपना नाम दर्ज करा चुका है। इस रिपोर्ट की मानें तो साल 2023 के दौरान एशिया में बाढ़ और तूफान के कारण सबसे ज्यादा मौतें और आर्थिक नुकसान हुआ है। साथ ही, लू का प्रभाव भी अधिक गंभीर हो गया।
    संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्व मौसम विज्ञान संस्था ने एशिया में जलवायु परिवर्तन पर प्रभावों को लेकर एक रिपोर्ट जारी की जिसमें यह स्पष्ट कहा गया है कि वैश्विक तापमान वृद्धि का एशिया पर प्रभाव औसत से ज्यादा पड़ रहा है। जो कि गम्भीर स्थिति है। अभी हाल ही में वोटर टर्नआउट में गिरावट और एक केंद्रीय मंत्री के निधन के लिए भी हीटवेव को जिम्मेदार माना जा रहा है। ज्यादातर लोग इसके पीछे जलवायु परिवर्तन को वजह मानते हैं। जो कि सही भी है। भारत की 80 फीसदी आबादी ऐसे इलाकों में रहती है, जहां जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं का खतरा है।
    जलवायु परिवर्तन के कारण कहीं भयंकर बाढ़ की स्थिति निर्मित हो रही है तो कहीं सूखे की मार झेलनी पड़ रही है। चीन में आई बाढ़ और भारत में सूखे से 65 बिलियन डॉलर का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया है। एशिया में बढ़ते तापमान से ग्लेशियर भी तेजी सी पिघल रहे हैं। तापमान वृद्धि के कारण समुद्री जल भी औसत से ज्यादा गर्म हो रहा है जो कहीं न कहीं चक्रवात और समुद्री तूफान में इज़ाफ़ा कर रहा है। दूसरी तरफ विडंबना देखिए आम मतदाता सिर्फ अपना निजी लाभ देख रहे हैं, जिसकी परिणीति ये है जलवायु परिवर्तन जैसे गम्भीर मुद्दे चुनावी चर्चा के विषय तक नहीं बनते। हम जलवायु परिवर्तन के गम्भीर परिणामों को प्राकृतिक आपदा का नाम देकर आत्मसंतुष्टि हासिल करने में माहिर हो चले है। जलवायु परिवर्तन मानव निर्मित गलतियां है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, वरना आने वाली पीढ़ी इसके गम्भीर परिणाम भुगतेगी।

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