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ब्रह्माण्ड का नियंत्रक कौन?

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हम अधिकतर आसपास के इस वातावरण, इसकी हर वस्तु, हर प्राणी, इस ब्रह्माण्ड को देखते हैं और इसके अस्तित्व का सम्पूर्ण श्रेय सर्वोच्च शक्तियों को,अग्नि, वायु, आत्मा जैसे तत्वों को दे देते हैं,परन्तु हम उस परम चेतना को देखने और समझने में विफल हो जाते हैं जो सभी में व्याप्त है और इन तत्वों को शक्ति प्रदान करती है।

प्रो. हिमांशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

केनोपनिषद में एक मौलिक प्रश्न उजागर होता है: वह कौन है जो हमारे जीवन को, हमारे मन की गति को, हमारी वाणी को, हमारी चक्षुओं में दृष्टि को और हमारे कानों में ध्वनि को निर्देशित करता है? वह सर्वोच्च चैतन्य हमारी संवेदी धारणाओं से परे हैं। यह अज्ञात इसलिए है, क्योंकि हम इसे देख नहीं सकते; लेकिन फिर भी, कहीं न कहीं, हम इसे महसूस कर सकते हैं। हमारे चारों ओर देखने से,इस ब्रह्मांड पर मात्र एक दृष्टि डालने से ही हमें इसके अस्तित्व, इसकी सार्वभौमिक उपस्थिति का आभास हो जाएगा।

उस चेतना को वाणी द्वारा, शब्दों से व्यक्त नहीं किया जा सकता है, लेकिन वास्तव में यह वही है जिसके द्वारा वाणी व्यक्त की जाती है। इसे मन नियंत्रित नहीं कर सकता, लेकिन यह चेतना हमारे मन को, हमारे मस्तिष्क को सोचने और विचार करने की क्षमता प्रदान करती है। इसे हम हमारे नेत्रों से देख नहीं सकते,इसे हमारे कान सुन नहीं सकते, लेकिन हम इसी के माध्यम से देखते और सुनते हैं। यह चैतन्य वही है, जो श्वास पर कतई निर्भर नहीं, अपितु हमारा यह सम्पूर्ण जीवन, हमारी इस जिन्दगी में हर एक क्षण, हर एक श्वास इसी पर आधारित है।

यह दावा करना कि आप इस अतिचेतना, इस परम चैतन्य को समझते हैं, यह आपका अज्ञान होगा, भ्रम होगा; क्योंकि वास्तविकता तो यह है कि इसे मात्र वे ही बेहतर रूप से समझ पाते हैं जिनका मानना है कि उन्हें इस बारे में कुछ ज्ञात ही नहीं। जब हम इस बाहरी दुनिया को, इस विश्व को देखते हैं,तो हम ब्रह्मांड को अनुभव और महसूस करते हैं, लेकिन इस चेतना को समझने के लिए हमें अपनी इंद्रियों पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है। तत्पश्चात,जहां हमारी इंद्रियां ले जाती हैं, उस दिशा में बढऩे से हम ज्ञान से भी आगे निकल सकेंगे। स्वयं को समझने के लिए, अंतर्मन में झांकने के लिए हमें अपनी चेतना को जागृत करना होगा, और अपनी आत्मा से एक सम्बन्ध विकसित करना होगा।

वेक वह आंतरिक वाणी है जो हमें लज्जा, भय और संदेह पर विजय प्राप्त करने की क्षमता दे कर साहसी, आनंदित और संवेदनशील बनाती है। इस आंतरिक वाणी को जागृत करने हेतु हमें अपने वास्तविक स्वरुप, हमारे जीवन में अपने उद्देश्य और अपने आसपास के इस वातावरण, इस ब्रह्माण्ड के साथ अपने संबंधों को समझने की आवश्यकता है। जब हम इस वास्तविकता को समझते हैं तो यह हमें अमरता की ओर ले जाती है, और यदि हम समय रहते ऐसा नहीं कर पाते हैं, तो दुर्भाग्यवश हम इस अवसर को सदा के लिए खो देते हैं।

हम अधिकतर आसपास के इस वातावरण, इसकी हर वस्तु, हर प्राणी, इस ब्रह्माण्ड को देखते हैं और इसके अस्तित्व का सम्पूर्ण श्रेय सर्वोच्च शक्तियों को,अग्नि, वायु, आत्मा जैसे तत्वों को दे देते हैं,परन्तु हम उस परम चेतना को देखने और समझने में विफल हो जाते हैं जो सभी में व्याप्त है और इन तत्वों को शक्ति प्रदान करती है। अग्नि प्रत्यक्ष भौतिक तत्वों का प्रतिनिधित्व करती है और वायु अगोचर, अव्यक्त, अप्रत्यक्ष भौतिक तत्वों का प्रतीक है। हम हमारी बुद्धि के माध्यम से हमारे मन को नियंत्रित कर इस आध्यात्मिक तत्व को समझ सकते हैं।

सृष्टि के आरम्भ में सब कुछ ‘एक’ था, सभी दिशाओं में एकता व्याप्त थी, सब सम्पूर्ण था। और फिर विविधता बढ़ गयी, और यह तभी संभव हो सकता था जब यह किसी सर्वशक्तिशाली वस्तु या प्राणी के द्वारा संचालित हो। यह वही सर्वोच्च चेतना है जिसने विविधता से परिपूर्ण इस ब्रह्मांड की इच्छाशक्ति जागृत की है। इसी परम चैतन्य को आत्मसात करना और इसके साथ अपने सम्बन्ध को सर्वस्व मान लेना ही हमारी नियति और मंजिल होनी चाहिए।

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