स्कूल खोले या नहीं, पश्चिमी देशों में बहस का बड़ा विषय

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विश्व भर में 77 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो अभी तक भी पूर्णकालिक रूप से स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। इसके अलावा 19 देशों के 15 करोड़ बच्चों के पास प्रत्यक्ष शिक्षण तक भी पहुंच नहीं है। ऐसे बच्चे या तो वर्चुअल ढंग से पढ़ रहे हैं या फिर पढ़ाई से पूरी तरह कटे हुए हैं। संभावना है कि स्कूल खुल भी जाते हैं तो कई बच्चे वापस स्कूल नहीं जा पाएंगे।

यूनेस्को ने पिछले वर्ष अनुमान व्यक्त किया था कि महामारी के कारण लगभग 2.4 करोड़ बच्चे स्कूल छोड़ देंगे। न्यूयॉर्क में यूनिसेफ के शिक्षा प्रमुख रॉबर्ट जेनकिंस का मत है कि स्कूल शिक्षण के अलावा भी बहुत सारी सेवाएं प्रदान करते हैं। अत: स्कूल सबसे आखिरी में बंद और सबसे पहले खुलना चाहिए। अजीब बात है कि कई देशों में माता-पिता परिवार के साथ बाहर खाना खाने तो जा सकते हैं लेकिन उनके बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। पिछला एक वर्ष हम सभी के लिए चुनौती भरा दौर रहा है। एक ओर तो महामारी का दंश तथा दूसरी ओर लॉकडाउन के कारण मानसिक तनाव। साथ ही समस्त शिक्षण का ऑनलाइन हो जाना।

इस एक वर्ष में प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा एवं शोध कार्य प्रभावित हुए हैं। पहली बार स्कूल जाने वाले बच्चों को तो यह भी नहीं मालूम कि स्कूल कैसा दिखता है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने वायरस संचरण को रोकने के सुरक्षात्मक प्रयासों के साथ स्कूल दोबारा से खोलने का सुझाव दिया । जैसे-जैसे यह शैक्षिक सत्र समाप्त हो रहा है, कई देशों में स्कूल प्रबंधन अपने पुराने अनुभव के आधार पर नए सत्र की तैयारी कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि स्वास्थ्य महकमा उनका मार्गदर्शन करे। ब्रिटेन में बच्चों ने मार्च-अप्रैल में स्कूल जाना शुरू कर दिया। फ्रांस में तीसरी लहर कारण कुछ समय के लिए तो स्कूल बंद रहे लेकिन मई में दोबारा शुरू कर दिए गए।

अमेरिका में भी जून के अंत तक लगभग आधे से अधिक शाला संकुल खोल दिए गए थे और सभी स्कूलों में प्रत्यक्ष शिक्षण शुरू कर दिया गया। लेकिन सच तो यह है कि हालांकि, इस सम्बंध में काफी प्रमाण मौजूद हैं कि स्कूलों को सुरक्षित रूप से खोला जा सकता है लेकिन अमेरिका व यूरोप में यह बहस अभी भी जारी है कि स्कूल खोले जाएं या नहीं और वायरस संचरण को नियंत्रित करने के लिए क्या उपाय अपनाए जाएं। जहां अमेरिका और अन्य सम्पन्न देशों में किशोरों और बच्चों को भी टीका लग चुका है वहीं कम और मध्यम आय वाले देशों में टीकों तक पहुंच अभी भी सीमित ही है।

पश्चिम के शोधकर्ताओं ने दावा किया कि दूरस्थ शिक्षा से कई देशों के श्वेत और अश्वेत विद्यार्थियों के बीच असमानताओं में वृद्धि होगी। सिर्फ यही नहीं इससे विकलांग और भिन्न सक्षम बच्चों के पिछडऩे की भी आशंका है। लेकिन बच्चों का स्कूल से दूर रहना भी किसी जोखिम से कम नहीं है। बच्चों का सामाजिक अलगाव और ऑनलाइन शिक्षण काफी चुनौतीपूर्ण रहा है। कुछ हालिया अध्ययनों से पता चला है कि दूरस्थ शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चे अकादमिक रूप से पिछड़ रहे हैं। स्कूल शिक्षा के अलावा भी बहुत कुछ प्रदान करता है। यह बच्चों को सुरक्षा प्रदान करता है, मुफ्त खाना और अपना दिन गुज़ारने के लिए एक सुरक्षित स्थान देता है। (स्रोत फीचर्स)

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