कहां पचास डिग्री नीचे, तो कहां 50 से ऊपर

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  • मौसम और तापक्रम में अभूतपूर्व बदलाव: बड़े खतरों की आहट

एक ओर कनाडा व अमेरिका गरमी से जूझ रहे हैं वहीं दूसरी ओर न्यूजीलैंड में बर्फीले तूफान आ रहे हैं। यह घटना 55 वर्ष बाद दर्ज हुई है। इन दिनों सामान्य रहने वाला तापक्रम -1 से -4 तक है। इसका कारण आर्कटिक ब्लास्ट है। उत्तरी ध्रुव में जहाँ – 80एष्ट सेंटी. तापक्रम होता है। ठंड में बर्फीले तूफान उठते हैं, इलाकें में बर्फ जमी होती है, उच्च दबाव का क्षेत्र बनने से हवायें तेज चलने लगती है। ऐसा उच्च दबाव से निम्न दबाव की और हवाओं के चलने से होता है।

  • कृपाशंकर तिवारी

6 अगस्त 2019 की बात है। मैं सियेटल (वाशिंगटन राज्य, अमेरिका) से इमीरेटस की उड़ान से दुबई आ रहा था। 8000 कि.मी. की नानस्टाप उड़ान थी। उड़ान मार्ग में उत्तरी ध्रुव हिमनद बर्फ और बीच-बीच में अंटार्कटिक महासागर था। खिड़की से झाँकने पर केवल सफेद बर्फ, धुंध और अकल्पनीय दृश्य थे। हजारों फीट की ऊँचाई, एक हजार कि.मी. एयरक्राफ्ट की गति, नीचे -60एष्ट सेंटीग्रेड पर जमा महासागर/वनस्पति, आबादी जीवन की दूर दूर झलक नहीं। विशेषज्ञ मानते है कि मौसम संबंधी कारणों से ध्रुवीय क्षेत्र के ऊपर से उड़ाने वाले पायलट बहुत दक्ष होने चाहिये। इसी ध्रुव से सटे कनाडा और उत्तरी पश्चिमी अमेरिका के क्षेत्र वर्ष भर बर्फ से जमे रहते हैं।

इस बार मौसम की भारी उथल-पुथल से यह पूरा क्षेत्र सर्वकालीन भयावह गर्मी से जूझ रहा है। कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया, वैंकूवर और अमेरिका के पोर्टलैंड, इडाहो, आरेगान तथा वाशिंगटन में तापक्रम 49.6एष्ट सेंटीग्रेड तक रिकार्ड ऊँचाई तक पहुँच गया। भारत में दिल्ली 45 सेंटीग्रेड पर तप रही है। सिंध (पाकिस्तान) का जैकबाबाद 49एष्ट सेंटीग्रेड से हलाकान है। यह मौसम की बेहद विनाशकारी लीला है ऐसा कभी हजारों साल में होता है। जो कनाडाई और अमेरिका इलाके – 50एष्ट सेंटीग्रेड तापक्रम में ठिठुरते थे, अब +50एष्ट सेंटीग्रेड में तबाह हैं। वहाँ घरों में एयर कंडीशनिंग (कूलिंग) का न तो चलन रहा है और न ही जरूरत, पर अब इस खौफनाक गरमी में सभी धारणायें बदल दीं।

वहाँ 600 मौतें हो चुकी है। सैकड़ों बूढ़े लोग मर गये, क्योंकि वे जानते ही नहीं थे कि गर्मी क्या है और उससे कैसे निपटना है। जुलाई में वहाँ का तापक्रम 14-16एष्ट सेंटीग्रेड के आसपास ही रहता है। जो कभी नहीं हुआ, इस बार हो गया। इस बढ़े हुये तापक्रम और मौसम में खतरनाक बदलाव से 22 करोड़ लोग प्रभावित हुये।। पिछले दस दिनों से गरमी का तांडव जारी है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद हो गया, स्कूल, कोविड टीकाकरण केन्द्र, भी बंद हो गये। गरमी से बचने के लिये सड़कों पर ठंडे पानी के फव्वारे, अनेक कूलिंग सेंटर, पूल, ए.सी. सिनेमाघर सब खोल दिये गये, जिससे लोग जाने बचा सके। इस बीच अनेक जगहों पर जंगलों में आग की घटनायें बढ़ी हैं।

फसलें, हरियाली बरबाद हुईं, सूखे जैसी हालत पनप गई। 1990 की तुलना में तापक्रम 2एष्ट सेंटीग्रेड बढ़ चुका है। यह तापक्रम वृद्धि बहुत घातक है। केवल आधा डिग्री तापक्रम वृद्धि ही भयावह लू, हिमनद पिघलाव, समुद्र स्तर में वृद्धि, मछली उत्पादन में भारी कमी, फसलों की बरबादी, प्रजातियों के विलुप्तीकरण, कोरल रीव्स की क्षति के साथ एक बड़े इकोलॉजिकल -मौसम परिवर्तन और क्षति के लिये जिम्मेवार होती है। फिर इतने ऊंचे तापमान के प्रभाव विनाशकारी ही होंगे। समूची दुनिया इस आपदा से प्रभावित होगी। प्रमाण स्वरूप कनाडा-अमेरिका की भीषण गरमी सामने है।

इस बड़े मौसम बदलाव का मूल कारण नि:संदेह वैश्विक मौसम बदलाव, बढ़ता गैसों का उत्सर्जन ही है। अमेरिका प्रतिवर्ष 6700 मिलियन मीट्रिक टन गरमी बढ़ाने वाली गैसों का उत्सर्जन करता है और धरती पर कुल उत्सर्जन का 28त्न हिस्सा उसी का है। अमेरिका का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन भी लगभग 18 टन है। लगभग इसी गति से यूरोप के देश और चीन भी वैश्विक उत्सर्जन के लिये जिम्मेदार है। भारत विशाल आबादी के बाद भी संयत है। संभव है भारत में विकास की तेज गति अभी भी अपेक्षित है।

भारत का कुल उत्सर्जन 2597 मि. मीट्रिक टन है, हमारी वैश्विक हिस्सेदारी भी केवल 7त्न प्रतिशत है। हमारा प्रति व्यक्ति उत्सर्जन भी 1.7 टन ही है यानी अमेरिका से दस गुना कम 7 इस अचानक तापक्रम वृद्धि के कारण क्षेत्रीय भी है जो वैश्विक मौसम बदलाव से जुड़े हैं। ”हीट डोम नाम की घटना हुई है, जिसमें वायुमंडल समुद्रों से गरम हवा को टैप करके प्रेशर कुकर जैसा बना देता है। पूरा कनाडा व अमेरिका का क्षेत्र प्रैशर कुकर जैसा बन गया। जब यह हवा पूर्व उत्तरी क्षेत्र में मैदानी क्षेत्रों में पहुँचती है और वहाँ ठहरती है तो लू बन जाती है।

अमेरिकी मौसम विज्ञानी रिचर्ड बेन का मानना है कि गर्मी का कारण दो सिस्टम है, एक-अलास्का से अलैदियन द्वीप, दूसरा जेम्स बे से हडसन बे तक। इनके कारण एक गरम आवरण बनता है, प्रशांत क्षेत्र की ठंडी हवायें रुकी हैं, बादल नहीं बनते। उच्च दाब के कारण हवा सिकुड़ती है और लू का रूप ले लेती है। उच्च दाब वाला वायुमंडलीय विक्षोभ भी तापक्रम बढ़ाता है।

एक ओर कनाडा व अमेरिका गरमी से जूझ रहे हैं वहीं दूसरी ओर न्यूजीलैंड में बर्फीले तूफान आ रहे हैं। यह घटना 55 वर्ष बाद दर्ज हुई है। इन दिनों सामान्य रहने वाला तापक्रम -1 से -4 तक है। इसका कारण आर्कटिक ब्लास्ट है। उत्तरी ध्रुव में जहाँ – 80 डिग्री सेंटी. तापक्रम होता है। ठंड में बर्फीले तूफान उठते हैं, इलाकें में बर्फ जमी होती है, उच्च दबाव का क्षेत्र बनने से हवायें तेज चलने लगती है। ऐसा उच्च दबाव से निम्न दबाव की और हवाओं के चलने से होता है। फलस्वरूप ठंड और बर्फबारी होती है।

धरती पर एक साथ प्रचंड गरमी और दूसरी ओर बर्फबारी मौसम परिवर्तन में बड़े परिवर्तन और गंभीर खतरे का संकेत है। ये संकेत हमें बारंबार विकास की गति और दिशा बदलने का इशारा है। अब होने वाला बदलाव अपरिवर्तनीय और विनाशकारी हैं। हमारी संपूर्ण विकास प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिन्ह हैं। वैश्विक स्तर पर उर्जा उत्पादन, उद्योग/तकनीक, परिवहन, कृषि पद्धति, जीवाश्म ईंधन का दहन, निर्माण और बसाहट, बायोमास बर्निंग कचरा निपटान, जीवन शैली बिगाड़, खानपान की आदतें जैसे मुद्दे हैं जिनमें बदलाव करते हुये मौसम में हो रहे घातक परिणामों को रोक सकते हैं।

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