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तंत्र में कहां हैं जन के सरोकार

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स्वतंत्र भारत में प्रशासन व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करना वांछनीय था। तंत्र की पेंचीदगियों को इस तरह दूर किया जाना था कि सच्चे अर्थों में जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन कायम होता। परंतु इस पर ध्यान नहीं दिया गया। स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद यह सवाल गंभीर है कि जो जन भारत भाग्य विधाता की जयकार करता है, उसकी खुशहाली कब आएगी?

विजयदत्त श्रीधर, संस्थापक-संयोजक, सप्रे संग्रहालय, भोपाल

सन् 1917 के अप्रैल में गांधीजी चम्पारन पहुंचे। किसानों की दीन-दशा से रू-ब-रू हुए। चम्पारन में ‘तीन कठिया प्रथा किसानों के लिए आफत बनी हुई थी। वे अपनी ही जमीन के 3/20 हिस्से में नील की खेती करने के लिए बाध्य थे। गांधीजी ने निलहे अंग्रेजों के अत्याचार से मुक्ति के लिए चम्पारन के किसानों को जागरुक किया, एकजुट किया, सत्याग्रह छेड़ा और इस तरह ‘तीन कठिया प्रथा का अंत कराया। यह भारत में सत्याग्रह के अमोघ अस्त्र के कारगर प्रयोग की शुरुआत थी जो अंतत: भारत की स्वतंत्रता का पथ-प्रशस्त करने वाली सिद्ध हुई। चम्पारन सत्याग्रह के इस 100वें साल में जगह-जगह तरह-तरह के आयोजन हुए। परंतु केवल उन घटनाओं का स्मरण किया जाना पर्याप्त नहीं। बल्कि वर्तमान संदर्भ में भारत की दशा और दिशा पर भी बहुत गंभीरता से चिंतन-मनन होना चाहिए। यह पड़ताल होनी चाहिए कि स्वतंत्रता संग्राम के साथ, जीवन-मूल्य और भविष्य की आशाओं-अपेक्षाओं-आकांक्षाओं का जो संकल्प जुड़ा रहा था, वह कहां तक पूरा हुआ और उस दिशा में कितना कुछ करना बाकी है।

जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, हमारे महापुरुषों ने जनता को यह भरोसा दिया था कि स्वतंत्रता का अर्थ होगा सभी के हिस्से में खुशहाली सुनिश्चित करना। बिना किसी भेदभाव के अवसरों की समानता सुनिश्चित करना। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम से जन-जन को जोडऩे के लिए नमक सत्याग्रह का प्रतीक चुना था। एक मु_ी नमक ने स्वतंत्रता संग्राम को जनसंग्राम में बदल दिया था। नमक है ही ऐसी चीज जिससे हर धर्म, हर जाति, हर वर्ग, हर आयु का प्रत्येक व्यक्ति जुड़ा हुआ है। सबसे सस्ती, लेकिन सबके लिए, सबसे जरूरी वस्तु ‘नमक तक पर हमारा हक नहीं है, इस माध्यम से महात्मा गांधी ने गुलामी की पराकाष्ठा का एहसास जन-जन को कराया था। कैसा दुर्भाग्य है कि उसी नमक को कारपोरेटों ने सरकारों के साथ सांठ-गांठ कर महंगे पैकेटों वाले आयोडीन युक्त नमक की माया में बदल डाला है।

पंद्रह अगस्त 1947 को भारत स्वाधीन हुआ। देश ने अपने लिए बहुदलीय संसदीय प्रणाली चुनी। छब्बीस जनवरी 1950 को नया संविधान लागू हुआ। लेकिन चूंकि आजादी के बाद भी भारत ने फिरंगियों द्वारा गढ़े गए संदेह और नकार पर आधारित तंत्र को यथावत कायम रखा, इसीलिए वह वास्तविक अर्थों में जन का सेवक नहीं बना। तंत्र में जन पर हुकूमत करने की प्रवृत्तियां विद्यमान रहीं और परवान चढ़ती रहीं। जो कायदे-कानून फिरंगियों ने देश पर गुलामी का शिकंजा मजबूत करने के लिए गढ़े थे, उन्हें भी बरकरार रखा गया। जबकि फिरंगी हुकूमत ने बड़ी कुटिलता से ऐसा तंत्र रचा था जो शासन और समाज के बीच दूरी और दुराव को बढ़ाता है। उन्होंने जल और जंगल को समाज से छीना। जमीन का ऐसा बंदोबस्त लागू किया जो किसान के पसीने का मोल न जाने। स्वतंत्र भारत में प्रशासन व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करना वांछनीय था। तंत्र की पेंचीदगियों को इस तरह दूर किया जाना था कि सच्चे अर्थों में जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन कायम होता। महात्मा गांधी ने फैसला करने वालों के लिए एक मंत्र दिया था – ”जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहं तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी आजमाओ। जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो उसको याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो वह उस आदमी के लिए कितना हितकारी होगा। परंतु इस सीख पर ध्यान नहीं दिया गया।

स्वतंत्रता के बाद भी क्या हरचरना फटा सुथन्ना पहनेगा?

यह सवाल गंभीर है कि भारत को आजाद हुए 73 बरस हो गए। आखिर हरचरना कब तक फटा सुथन्ना पहने हुए अदृश्य-अबूझ भारत भाग्य विधाता की जयकार करता रहेगा, यदि ‘जन-गण-मन अधिनायक जय हे में हरचरना की जय और खुशहाली शामिल नहीं हो पाई है तब आजादी और लोकतंत्र का करोड़ों हरचरनाओं के लिए महत्व क्या है? अर्थ क्या है? सन 1991 में भारत ने खुले बाजार की आर्थिक नीतियां अपनाईं और संसारीकरण की दौड़ में शामिल हो गया। कारपोरेटों की चकाचौंध चारों तरफ फैल गई। परंतु आज तक यह खुलासा नहीं हो पाया कि आम आदमी के पेट भरने से, तन ढकने के लिए कपड़े से, सिर पर छत की जरूरत से, बच्चों की पढ़ाई से, बीमारों के इलाज से इसका क्या रिश्ता है? विकास के मान से भारत और इंडिया के बीच जो फासला बढ़ा है और पूंजी निवेश का मायाजाल फैला है, आम आदमी की नजर से उसको देखते हुए ‘कुरुक्षेत्र में रामधारी सिंह ‘दिनकर की यह चेतावनी याद आती है –
राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है,फटा सुथन्ना पहने जिसके गुन हरचरना गाता है।


शरसैया पर पड़े भीष्म ने युधिष्ठिर को सत्ता की हवस के दुष्परिणामों के प्रति आगाह किया था। पिछले 20-25 बरसों में भारत में हवस और लूट का जैसा वातावरण बना है, वह भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। राजनीतिक दलों की रीति-नीति भी आश्वस्त नहीं करती है। जब देश संविधान की स्वर्ण जयंती मना रहा था तब मुख्य जलसा संसद में हुआ था। उन दिनों भारतीय संविधान की समीक्षा का मुद्दा गरमाया था। तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने तब गुरु-गंभीर सवाल देश के सामने रखा था – ”हम संविधान की वजह से विफल हुए हैं या हमने संविधान को विफल किया है।


लोकतंत्र में ‘यथा प्रजा-तथा राजा

भारत में चुनाव जिस कदर महंगे किए गए हैं उससे चुनावों में काले धन का हस्तक्षेप बढ़ गया है। इतना ज्यादा कि बाकी चीजें गौण हो गई हैं। यह खतरनाक संकेत है देश के लिए और संसदीय प्रणाली के लिए। कविवर रामधारी सिंह ‘दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र में बड़ी तीखी टिप्पणी राजसत्ता के धन-लोलुप होने के संदर्भ में की है – ”वाणिज के हाथ की कृपाण ही अशुद्ध है। यहां वाणिज का आशय धन-लिप्सा से और कृपाण का आशय सत्ता से है। दोनों का मेल सिर्फ और सिर्फ अशुभ ही हो सकता है। देश यह अनुभव कर भी रहा है कि जब से राजनीति पर धनिकों का शिकंजा कसा है और नेताओं में कारोबार का लोभ-लालच पनपा है, तब से देश में भ्रष्टाचार भी बेतहाशा बढ़ा है। खुले बाजार वाली नई आर्थिक नीतियों से पनपी प्रवृत्तियों ने आग में घी डालने का काम किया है। प्राकृतिक संसाधनों की निर्लज्ज लूट बढ़ी है। जब तक समाज सेवा और जन संघर्ष की आंच में तपते हुए राजनीति के पायदान चढऩे का रिवाज कायम रहा, किसान-वकील-समाजसेवा की पृष्ठभूमि से उभरने वाले लोग राजनीति में आते रहे, भ्रष्टाचार का ऐसा दावानल नहीं सुलगा था। संसद और विधानमंडल बहस के मंच थे, जनता के सवाल वहां गूंजते थे।

‘तीन आना बनाम पंद्रह आना और ‘कुपोषण बनाम अपोषण जैसी बहसें छिड़ती थीं। भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता पर ऐसे तीखे और तार्किक हमले होते थे कि मंत्रियों को इस्तीफे देने पड़ते थे। तब ध्यान खींचने के लिए हुल्लड़ मचाने का चलन नहीं था। तर्क में दम होता था तो बात बोलती थी। जन प्रतिनिधि तैयारी करके सदन में आते थे। उसी संसद में इस नए दौर में कदाचरण में लिप्त सदस्यों को बर्खास्त करने का नजारा देखना पड़ा। गांधी एक पहेली है। उन्नीसवीं सदी उनके जन्म की, बीसवीं सदी उनके असाधारण कर्म की और इक्कीसवीं सदी उनके विचारों और प्रयोगों को विकल्प के रूप में अपनाने की है। लंगोटी और लाठी का फकीरी बाना और लोकमान्यता का सर्वोच्च शिखर!

आखिर क्यों बापू को लोक की आस्था में रचने-बसने के लिए आलीशन बंगले, चमचमाती कारों, डिजायनर कपड़ों, हाईटेक संसाधनों, काफिलों, लाल बत्तियों-सलामियों की कभी जरूरत नहीं पड़ी! कथित रौब और रुतबे वाले आज के बड़े से बड़े नेता को जनता का विश्वास-स्नेह-आदर नहीं मिल पाता! आज के नेताओं की समझ में इतनी-सी सच्चाई क्यों नहीं आती कि भारत में लोक-विश्वास और आदर केवल ‘त्यागियों को ही नसीब होता है। सवाल यह भी है कि क्या सारी जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन तंत्र की ही है? राजतंत्र के लिए कहा जाता है ‘यथा राजा तथा प्रजा। लोकतंत्र के लिए कहावत होगी ‘यथा प्रजा तथा राजा। अर्थात राजा तो अब कोई बचा नहीं, राजकाज चलाने वाले प्रजा के द्वारा चुने गए नुमाइंदे होते हैं। जाग्रत प्रजा की एकजुट ताकत ही राजकाज के हाथी पर जनआकांक्षाओं का अंकुश लगा सकती है।

उदासीन नागरिक समाज यह कतई नहीं कर पाएगा। नागरिकों को प्रत्येक स्तर पर सवाल उठाने और उनका जवाब पाने की मुस्तैदी बरतनी होगी। जनता के खजाने का कैसा उपयोग हो रहा है, इस पर चौकस निगाह रखनी होगी। इसमें भी सबसे प्रभावी भूमिका युवा वर्ग की है। क्योंकि अच्छा होने से उनका भविष्य संवरेगा और बुरा होने से उनका भविष्य बर्बाद होगा। यह बात जितने जल्दी युवाओं और नागरिकों की समझ में आ जाए उतना ही ठीक होगा।

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