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जहरीले धुएं के दंश से आखिर कब मिलेगी निजात!

  • डॉ. अनिल कुमार निगम
    दिल्‍ली और एनसीआर की हवा में एक बार फिर जहर घुल गया है। दीपोत्‍सव का त्‍योहार अभी दूर है लेकिन देश की राजधानी की हवा की गुणवत्‍ता का इंडेक्‍स (एक्‍यूआई) 300 के पार चला गया है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। हर वर्ष प्रदूषण का कारण दिवाली में आतिशबाजी से होने वाले प्रदूषण, पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में जलाई जाने वाली पराली को मानकर कुछ चंद उपाय कर लोगों को प्रदूषण के दंश को झेलने के लिए छोड़ दिया जाता है। पिछले लगभग एक दशक में अक्‍टूबर से जनवरी महीनों के बीच हर साल यह समस्‍या गहरा जाती है। दिल्‍ली सरकार भी ‘जब आग लगे तो खोदो कुआं’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए प्रदूषण कम करने के चंद उपाय करती है जिससे कुछ तात्‍कालिक राहत भी मिल जाती है, लेकिन इस समस्‍या का स्‍थायी समाधान निकाले जाने के बारे में गंभीर प्रयास देखने को नहीं मिलते हैं। प्रदूषण की गंभीरता को यहां से समझना चाहिए कि अक्‍टूबर आते ही सांस और दमा के मरीजों की संख्‍या बढ़ने लगी है। इसीलिए उच्‍चतम न्यायालय ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) से दिल्ली और उसके आसपास वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए उठाए जा रहे कदमों पर रिपोर्ट मांगी है।
    ध्‍यातत्‍व है कि दिल्ली-एनसीआर में हर साल अक्टूबर से नवंबर के महीने में प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक स्‍तर तक पहुंच जाता है। प्रदूषण बढ़ने का प्रमुख कारण है कि सर्दियों में हवा का घनत्व बढ़ जाता है और तापमान गिर जाता है। इसके चलते प्रदूषण नीचे ही रह जाता है और स्मॉग के तौर पर दिखता है। यही स्‍मॉग कोहरे के साथ मिलकर प्रदूषण और तरह-तरह की गैस एक घातक मिश्रण को जन्‍म देती है। सर्दियों में हवा भी काफी कम चलती है, ऐसे में प्रदूषण लगातार बढ़ता रहता है। गर्मियों में तापमान अधिक होने से हवा में घनत्व काफी कम हो जाता है और प्रदूषण आसानी से छंट जाता है। दिल्‍ली एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने के अन्‍य कारण भी हैं। दिल्‍ली की आबादी पिछले एक दशक में बहुत तेजी से बढ़ी है। यहां की आबादी 3 करोड़ से अधिक हो चुकी है। इसी तरह एनसीआर की आबादी लगभग साढ़े 4 करोड़ से अधिक है। आबादी का ग्रोथ रेट काफी अधिक है। आबादी बढ़ने के साथ ही दिल्‍ली एवं एनसीआर में वाहनों का दबाव भी तेजी से बढ़ा रहा है। दिल्‍ली का विश्‍व में सबसे अधिक वाहनों वाला शहर माना जाता है।

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