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जब रावण ने शिव से पार्वतीजी को मांग लिया

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सीताजी स्वयं अग्नि में चली गईं और अपने प्रतिबिम्ब को छोड़ गईं। यह बात लक्ष्मण भी नहीं जानते थे, तो रावण कैसे जान सकता था। उसने मारीच के साथ मिल कर अनेक प्रपंच रचे और नकली सीताजी का अपहरण कर लंका ले आया। फिर भी सीताजी की छाया को भी वह छू न सका। स्वयं को सबसे शक्तिशाली, बुद्धिमान समझने वाले रावण ने इस तरह पार्वती जी के बाद दूसरी बार धोखा खाया। तबसे यह कहावत चल पड़ी है– न माया मिली न राम।

विजय बुधोलिया


रावण अपनी माता कैकसी से बहुत प्रेम करता था और सम्मान भी। एक बार उसकी माता ने उससे कहा कि तुम भगवान शंकर को प्रसन्न करके उनसे आत्मलिंग प्राप्त कर ले आओ, मैं उसकी पूजा करना चाहती हूं। रावण इसके लिए तुरंत तैयार हो गया और कैलाश पहुंच गया। यहां उसने भगवान शिव को अपने संगीत से प्रसन्न करने के लिए बहुत दुष्कर कार्य किया। उसने अपने शरीर की आंतों और अन्य अंगों से वीणा बनाई। जिसके बाद षड्ष आदि स्वरों से रावण ने अपने ही मुंह से गंधर्व के समान सुंदर गायन आरंभ किया तथा शंकरजी का स्मरण कर उन्हें अपना एक सिर काट कर चढ़ाया। तब भगवान शंकर ने नंदी को कहा कि तुम रावण के पास जाओ और उसका कटा हुआ सिर वापस उसके कंधे पर जोड़ दो और उससे कहना कि महादेव तुम्हें आत्मलिंग कभी नहीं देेंगे, मैं उनके मन की बात जानता हूं। तुम वापस चले जाओ।


‘तदा नंदीश्वरं प्राहं शंकरो लोक शंकर:। शिर: संधाय हस्तेन त्वया वाचोअद्य रावण:।। आत्मलिंग राक्षसं त्वांशंकरौ न प्रदास्यति। हृद्वतं हि मया ज्ञातं शंभोस्तवं याहि स्वस्थलम्।।


ऐसा लगातार दस दिन तक चलता रहा किन्तु, रावण जाने का नाम नहीं लेता था। अन्त में भगवान शंकर उसके भयानक कृत्य और मनोहर गायन से प्रसन्न हुए। उन्होंने रावण से वर मांगने के लिए कहा। रावण पार्वतीजी के अलौकिक सौंदर्य को देखकर चकित हो गया था। उसने भगवान शिव से दो वर मांगे। एक तो अपनी माता के लिए आत्मलिंग और दूसरा अपने लिए पार्वती को-‘वरयामास मन्मात्रे आत्मलिंग तथा मम। पत्न्यर्थं पार्वतीं देहि तथेत्युक्वा ददौ शिव:।।


दूसरे वर को सुनकर शिव मन ही मन मुस्कराए। सोचने लगे सर्वशक्तिमान,सम्पूर्ण एश्वर्यों का दाता और त्रिलोकी का स्वामी होकर भी मैं जब भवानी कुपित होती हैं, तब उन्हें मना नहीं पाता हूं, तब यह रावण आदिशक्ति भवानी को कैसे मना पाएगा। वे तो कुपित होने पर उसका सर्वस्व भस्म ही कर देंगी। फिर भी उन्होंने ‘तथास्तु कह दोनों वर रावण को दे दिए। शिव ने रावण को सावधान किया कि इस लिंग को मार्ग में कहीं रख देने पर यह वहीं अटल हो जाएगा। इसके बाद रावण लिंग और पार्वती जी को लेकर चला गया।

यहां रास्ते में जाते-जाते पार्वती जी सोचने लगीं कि ये कैसे भोलेनाथ हैं। वर देते समय कुछ विचारते ही नहीं हैं। जो जैसा वर मांगता है, वैसा ही दे देते हैं। वैसे भी कोई अपनी पत्नी को किसी को भी दे देता है क्या। न जाने किस पिनक में रहते हैं। अब तो भगवान श्रीहरि ही कोई उपाय कर सकते हैं। ऐसा सोच कर इस विपत्ति से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने श्रीहरि विष्णु का स्मरण किया। विष्णु ने अपने शरीर के चंदन से सुंदरी मंदोदरी की सृष्टि करके उसे मय के घर में रख दिया।

तब वह ब्राह्मण का रूप धारण कर मार्ग में रावण से मिले और उन्होंने रावण से कहा की शिव धोखा देकर वास्तविक पार्वती को पाताल में मय के यहां छिपाया है। यह सुनकर रावण ने शिव के पास जाकर वास्तविक पार्वती को लौटाया और पाताल जाने को उद्यत हुआ। रास्ते में लघुशंका जाने की इच्छा से आत्मलिंग उस ब्राह्मण (विष्णु) के हाथ में दे दिया। देर हो जाने पर विष्णु आत्मलिंग गोकर्ण (कुछ विद्वान इसे आज का गोवा बतलाते हैं, जबकि बिहार की कथा में इस घटनास्थल को वैद्यनाथ मंदिर (देवघर) माना जाता है।) की भूमि पर रखकर अंर्तध्यान हो गए। वापस आकर रावण ने उसे उठाने के बहुत प्रयास किए। किन्तु, वह सफल न हो सका। तब उसने मय के घर आकर विष्णु द्वारा निर्मित मंदोदरी को प्राप्त किया।

रावण की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वह किसी सुंदर महिला को देखता या उसके बारे में सुनता तो उसे पाने के लिए आतुर हो जाता। उसकी इसी कमजोरी का लाभ शूर्पनखा ने तब उठाया, जब लक्ष्मण ने उसे उसके अनुचित प्रस्ताव के कारण उसे कुरूप कर दिया था और उसके भाई खर-दूषण राम के हाथों मारे जा चुके थे। लंका आकर उसने जहां राम-लक्ष्मण के विरुद्ध रावण को भड़काया, वहीं सीता के सौंदर्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की। रावण यह सुनकर सीता जी को पाने के लिए व्याकुल हो गया। वह किसी भी कीमत पर सीता जी को पाना चाहता था। दूसरी ओर श्रीराम से कोई भी बात छिपी हुई नहीं थी। वे भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में भी जानते थे। इसलिए एक बार एकान्त में श्रीराम ने सीता जी से कहा कि अब मैं कुछ मानव-लीला करना चाहता हंू। इसलिए तुम एक वर्ष के लिए अग्नि में निवास करो-‘तुम पावक महुं करहु निवासा। जो लगि करौं निसाचर नासा।। निज प्रतिबिम्ब राखि तहं सीता। तैसेइ सील रूप सुविनीता।।

सीताजी ने ऐसा ही किया। स्वयं अग्नि में चली गईं और अपने प्रतिबिम्ब को छोड़ गईं। यह बात लक्ष्मण भी नहीं जानते थे, तो रावण कैसे जान सकता था। उसने मारीच के साथ मिल कर अनेक प्रपंच रचे और नकली सीताजी का अपहरण कर लंका ले आया। फिर भी सीताजी की छाया को भी वह छू न सका। स्वयं को सबसे शक्तिशाली, बुद्धिमान समझने वाले रावण ने इस तरह पार्वती जी के बाद दूसरी बार धोखा खाया। तब से यह कहावत चल पड़ी है-न माया मिली न राम।

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