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भगवान से क्या माँगें

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  • नागेश्वर सोनकेशरी

यह बड़ी सोचने की बात है? आज कल मंदिरों में बड़ी भीड़ लगती है। मंदिर में कोई औलाद, नौकरी, कारोबार, सत्ता, कुर्सी, कोई अच्छी पत्नी, कोई बेटे-बेटी को सही मार्ग पर लाने की गुहार, कोई पति-पत्नि के झगड़े मिटाने की कह रहा है, कोई शत्रु परास्त, न्यायालय में मुकदमें में जीत के लिए, और आजकल यह कोविड की महामारी फैली है तो मुझे कुछ न हो यह याचना बहुत ज्यादा ही चल रही है। मंदिर में सब ओर मॉंगने वाले भिखारियों की ही भीड़ लगी रहती है, भक्त तो है ही नहीं ।

एक रोचक कथा : एक विशाल मंदिर था, उसमें प्रतिष्ठित प्रतिमा अत्यंत भव्य थी। एक महान चिंतक व उस प्रतिमा के मध्य एक मौन संवाद हुआ।चिंतक ने प्रतिमा से कहा- क्या आप कभी- कभी सूने बैठें रहतें हैं ?
प्रतिमा ने तुनक कर कहा- सूना कहाँ रहता हूँ, दिन भर तो भिखारियों की भीड़ लगी रहती है। ठाठ- बाट से स्वार्थी खूब पूजा आरती करते हैं ।
चिंतक ने पूछा- क्या आपके द्वार पर परम भक्त भी आते होंगे ? प्रतिमा ने कहा- नहीं- नहीं सभी मेरे परम भक्त नहीं है। ऊपर से भक्त दिखते हैं परन्तु अंदर से कामनाओं से भरे रहते हैं।

चिंतक ने पूछा- प्रभु आपके पास क्या विशेष कामनाओं को लेकर लोग आते हैं?
प्रतिमा ने कहा – हाँ- हाँ इनकी कामनाएं विचित्र होती हैं ? अधिक धन, पद, सत्ता, ख्याति सिंहासन, संतान, व्यापार और भी कामनाओं के लिए बड़ी- बड़ी मनौती मानते हैं, और दिखावे की पूजा करते हैं ।
चिंतक ने पूछा- क्या ये सभी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं ?

प्रतिमा ने व्यंग्यात्मक जबाब दिया – मेरी इस मूर्ति का सृजन, शृंगार मनुष्य ही करता है। जब मैं अपनी मूर्ति का अपना काम खुद ही नहीं कर सकता तो मनुष्य की मनौती कैसे पूर्ण करूँगा। परन्तु मनुष्य यह नहीं समझता है।
चिंतक ने पूछा – फिर आपनें भक्तों से यह मूर्ति क्यों बनवाई?
प्रतिमा ने कहा – मैंने नहीं कहा यह तो पूजा पाठ की दुकान चलाने वाले पुजारियों का काम है।
चिंतक ने पूछा- फिर आप कामनाओं की पूर्ति के लिए क्या करते हैं ?
प्रतिमा ने कहा – मैं भक्त के हृदय में रहता हूँ,और उन्हें प्रेरणा देकर उनका काम उन्हीं से करवाता हूँ। मैं यह भी देखता हूँ कि कामना के पीछे उसकी भावना क्या है ?केवल स्वार्थ सिद्धि है या परोपकार भी है। इसी गुप्त भेद को जानकार उसको उसी प्रकार का उत्तर देकर आत्मदेव को संतुष्ट कर देता हूँ।
चिंतक ने पूछा – क्या मूर्ति पूजा बंद कर दें?

प्रतिमा ने कहा- नहीं-नहीं। क्योंकि मनुष्यों ने भगवान को नहीं देखा है, इसलिए स्मरण के समय अंतध्र्यान में मुझ मूर्ति को ले आते हैं, मेरे स्वरूप का मन में स्मरण करते हैं तो इससे मेरा उनके हृदय में वास हो जाता है। और वास तभी होता है जब वह दास बनता है। पूजा पाठ हो यह खास बात नहीं परन्तु भीख मांगने से लोगों को संतोष तो हो ही जाता है। उस संतोष को छीनना उचित नहीं, इसलिए मूर्ति रूप में मैं प्रतिष्ठित रहता हूँ । जो भक्त निरंतर स्मरण करते हैं मैं उन्हीं की आत्मा में प्रेरणा देकर उनका मनचाहा कार्य करवाते रहता हूँ।
भगवान व संत से माँगना हो तो उनका आचरण माँगना, हृदय में भक्ति माँगना, कष्ट हनन का मार्ग पूछकर स्वयं कर्म करना। यही भव्य प्रतिमा व उस चिंतक के मध्य संवाद का सार है।

लेखक -पूर्व में अद्भुत श्रीमद्भागवत (मौत से मोक्ष की कथा) की रचना भी की है।

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