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विश्व में वामपंथ की प्रासंगिकता कितनी?

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  • चीन और क्यूबा के अतिरिक्त लाओस और वियतनाम, उत्तर-कोरिया दुनिया के सबसे दमनकारी देशों की सूची में

वर्तमान समय में चीन और क्यूबा के अतिरिक्त विश्व में एक दलीय साम्यवादी शासन और समाजवादी गणराज्य वाले देशों में लाओस और वियतनाम के साथ वह उत्तर-कोरिया भी शामिल है, जो कि दुनिया के सबसे दमनकारी देशों में सूचीबद्ध है। इसके अतिरिक्त नेपाल, रूस, ब्राजील सहित सात बहुदलीय राष्ट्र ऐसे हंै, जहां वामपंथ प्रभावी है या सीमित। भारत में हिंदू-विरोध वामपंथियों की एक अतिरिक्त विशेषता है।

  • बलबीर पुंज

हाल ही में वामपंथ से जुड़ी दो घटनाएं सामने आई। एक चीन में सत्तारुढ़ चीनी साम्यवादी दल (सीसीपी) द्वारा अपनी 100वां वर्षगांठ मनाना, वही दूसरी ओर क्यूबा में खाद्य पदार्थों की कमी से हजारों लोगों का देश की साम्यवादी सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आना। यदि विश्व में किसी विचारधारा, मजहब या दर्शन का सटीक तार्किक अध्ययन करना हो और फिर उसे मानवता, समरसता और बहुलतावाद की कसौटी पर कसना हो तो वह उसके परिणाम के मूल्यांकन से संभव है। चीन की हेकड़ी और क्यूबा प्रसंग के बाद स्वाभाविक हो जाता है कि विश्व में वामपंथी विचारधारा की निष्पक्ष चर्चा की जाए।

छोटे द्वीपीय देश क्यूबा में 11-18 जुलाई को जो कुछ हुआ, उसने बर्लिन दीवार प्रकरण (1989) और सोवियत संघ विघटन (1991)- जिसमें हिंसा, दरिद्रता, उत्पीडऩ और भूखमरी की कड़वी सच्चाई को शेष विश्व ने देखा था- को पुन: सजीव कर दिया। क्यूबा में भारी राजनीतिक-सामाजिक असंतोष के बीच भोजन-दवाओं की कमी, महंगाई, कोविड-19 टीकाकरण की धीमी गति के विरुद्ध हजारों लोग देश के एकदलीय वामपंथी शासन को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए आक्रोशित दिखे।

प्ताहभर चले प्रदर्शनों के बाद राष्ट्रपति मिगुएल दीएज-केनेल और पुलिस द्वारा अपनी गलतियों की स्वीकारोक्ति पश्चात लोगों का गुस्सा शांत हुआ। इससे पहले भी क्यूबा में ऐसा प्रदर्शन 1994 में तब देखने को मिला था, जब सोवियत संघ टूटने के बाद इस कम्युनिस्ट देश को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था। क्यूबा के हालिया घटनाक्रम को विश्व (भारत सहित) का वामपंथी कुनबा अमेरिकी षडय़ंत्र बता रहा है।

जब क्यूबा में लोग वामपंथी शासन की अक्षमता के विरुद्ध सड़कों पर उतरे हुए थे, तब लगभग उसी कालखंड में चीन में क्यूबा सत्ता-अधिष्ठान के मानसबंधु अर्थात चीनी साम्यवादी दल (सीसीपी) अपने 100 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा था। इस अवसर पर एक जुलाई को आयोजित समारोह में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपने शीर्ष नेता माओ-त्से-तुंग की भांति परिधान में आए और अपने चिरपरिचित चिंतन का परिचय देते हुए शेष विश्व को धमकी दी। शी ने कहा, ‘हमें धमकाने या हमारा विरोध का प्रयास करने वाली विदेशी शक्तियों का सिर कुचल दिया जाएगा। चीन अपनी सैन्य ताकत को बढ़ाने और ताइवान, हांगकांग और मकाऊ को वापस मिलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।’

सच तो यह है कि कई वैज्ञानिक शोधों में चीन का वैश्विक महामारी कोविड-19 का उद्गमस्थल सिद्ध होने, वर्तमान भारतीय नेतृत्व द्वारा सीमा सुरक्षा हेतु आक्रमक प्रतिबद्धता, अमेरिका द्वारा विस्तारवाद विरोधी सामरिक-व्यापारिक घेरेबंदी से चीन की बौखलाहट सर्विदित है। दिलचस्प बात यह है कि जिनपिंग बीजिंग के उसी थियानमेन चौक से शेष विश्व को धमका रहे थे, जहां 4 जून 1989 को तत्कालीन चीनी सरकार ने आंदोलित कई लोकतंत्र समर्थकों को सैन्य टैंकों से कुचलकर मार डाला था।

अपने भाषण में जिनपिंग ने जोर देते हुए यह भी कहा- ‘केवल समाजवाद ही चीन को बचा सकता है।’ वास्तव में, जिस व्यवस्था का दंभ जिनपिंग भर रहे है और जिसके कारण साम्यवादी क्यूबा में लोग भूखमरी का शिकार हो रहे हंै, उसकी वैज्ञानिक कल्पना विश्व में सर्वप्रथम जर्मनी के दार्शनिक कार्ल माक्र्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने प्रस्तुत की थी। इस चिंतन के केंद्रबिंदु में ‘वर्ग-संघर्ष’, ‘समतावाद’, ‘सर्वहारा’ और ‘जन-क्रांति’ है। यह सही है कि इससे प्रारंभ में सामंतवाद और अराजक पूंजीवाद से जकड़े यूरोप में श्रमिकों-वंचितों के शोषण पर रोक लगी थी, किंतु उसका भयावह रूप अल्पकाल में सामने आ गया।

माक्र्स के साम्यवादी घोषणापत्र (1847-48) और दास कैपिटल (1867) में जिस समाजवादी व्यवस्था का उल्लेख किया गया था, उससे अंगीकृत दुनिया के जिस भू-भाग में वामपंथियों की सरकार आई, वहां के अधिनायकवादी शासन में साधारण नागरिक के अधिकार न केवल छीन लिए गए, अपितु जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए लोगों को तरसना पड़ा और विरोधियों (वैचारिक-राजनीतिक) को मौत के घाट उतारे जाना लगा। व्लादिमीर लेनिन, जोसेफ स्टालिन, माओ, पोल पोट, किम परिवार आदि क्रूर साम्यवादी तानाशाहों का रक्तरंजित शासनकाल इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

वर्तमान समय में आबादी और क्षेत्रफल के संदर्भ में चीन दुनिया का एकमात्र सबसे बड़ा साम्यवादी राष्ट्र है। माओ के नेतृत्व में यहां 1921 में वामपंथ का उदय तब हुआ था, जब रूस में तथाकथित किसान-श्रमिक हितैषी और पूंजीवाद विरोधी सरकार बनते ही रक्तपात हो रहा था। माक्र्सवाद प्रेरित लेनिनकाल में विरोधियों का सामूहिक नरसंहार और राजनीतिक विरोधियों को सार्वजनिक फांसी देना सामान्य दिनचर्चा बन चुकी थी। लेनिन की मृत्यु के बाद जब सोवियत संघ की जिम्मेदारी जोसेफ स्टालिन ने संभाली, तब मानवता-लोकतंत्र विरोधी व्यवस्था ने गति पकड़ी।

यही कारण है कि जब माओ के हाथ में 1949 से चीन की सत्ता आई, तो वहां पर मानवीय जीवन और अधिकार गौण हो गए। माओ के माक्र्स प्रेरित समाजवाद के कारण करोड़ों लोग भूखे मरे। नरसंहार के मामले में तो माओ ने हिटलर, स्टालिन और मुसोलिनी जैसे क्रूर तानाशाहों को पीछे छोड़ दिया। माक्र्सवादी ‘सांस्कृतिक क्रांति’ के नाम पर माओ ने कई प्रयोग किए, किंतु विकास नहीं हुआ। 1976 में माओ की मृत्यु के बाद सत्ता में आए देंग शियाओपिंग ने अप्रासंगिक समाजवादी आर्थिकी में पूंजीवाद का मंत्र फूंका, जिसे ‘बाजार समाजवाद’ का नाम दिया गया।

तब से लेकर दुनिया में चीन के रूप में ऐसी अस्वाभाविक व्यवस्था है, जिसका सत्ता-अधिष्ठान वामपंथी अधिनायकवाद से जकड़ा है, अर्थव्यवस्था शोषणयुक्त-अमानवीय पूंजीवाद से ग्रस्त है, तो विदेश नीति के नाम पर विस्तारवाद (ऋण-मकडज़ाल सहित) को उग्रता के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। इसी विषैले कॉकटेल के कारण चीन का भारत सहित लगभग कई देशों के साथ विवाद चल रहा है, जिसमें कई युद्ध भी हो चुके है।

विश्व माक्र्सवाद, लेनिनवाद, स्टालिनवाद और माओवाद प्रेरित हिंसक-अमानवीय-शोषित व्यवस्था को देख चुका है। अब इस कड़ी में चीन के वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग काल्पनिक ‘हाइड्रा दैत्य’ के रूप में उभर रहे है। शी की विस्तारवादी महत्वकांशा, जिसमें पाकिस्तान जैसा इस्लामी आतंकवाद केंद्रित इस्लामी देश प्रमुख सहयोगी की भूमिका में है, वह न केवल वैश्विक समरसता को चुनौती दे रहा है, साथ ही शी के नेतृत्व में चीन का उग्र राष्ट्रवादी अभियान (वन-चाइना नीति सहित) उसके मुख्यक्षेत्र और कब्जा भूखंडों के निवासियों पर कहर बनकर टूट रहा है।

जिस प्रकार वर्ष 1933-45 में तत्कालीन जर्मनी के क्रूर तानाशाह एडोल्फ हिटलर और उसकी नाजी पार्टी ने राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करके लाखों यहूदियों (महिला-बच्चों सहित) को मार डाला था और हिटलर की विस्तारवादी मानसिकता के कारण दुनिया ने द्वितीय विश्वयुद्ध भोगा था- ठीक वैसे ही वीभत्स चिंतन का अनुसरण चीनी वैचारिक-राजनीतिक अधिष्ठान कर रहा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में राजकीय नरसंहार संभव नहीं है, इसलिए चीन विशुद्ध राष्ट्रवाद के नाम पर शिनजियांग प्रांत में मजहबी प्रतिबंध लगाकर लाखों उइगर मुस्लिमों को उनकी संस्कृति से दूर, तिब्बत में बौद्ध-भिक्षु उत्पीडऩ और हांगकांग-ताइवान में नागरिकों का दमन कर रहा है।

हाल ही में चीन ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू करके हांगकांग के हजारों लोगों को जेल भेज दिया, वही प्रमुख समाचारपत्र एप्पल डेली पर ताला जड़ दिया। अब यदि हिटलर की यहूदी विरोधी मानसिकता और उसके काले कुकर्मों पर शेष विश्व मुखर चर्चा कर सकता है, तो विश्व के अमानवीय समाजवादी शासन में हुए नरसंहार-शोषणों पर अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है?

वर्तमान समय में चीन और क्यूबा के अतिरिक्त विश्व में एक दलीय साम्यवादी शासन और समाजवादी गणराज्य वाले देशों में लाओस और वियतनाम के साथ वह उत्तर-कोरिया भी शामिल है, जो कि दुनिया के सबसे दमनकारी देशों में सूचीबद्ध है। इसके अतिरिक्त नेपाल, रूस, ब्राजील सहित सात बहुदलीय राष्ट्र ऐसे हंै, जहां वामपंथ प्रभावी है या सीमित। भारत में हिंदू-विरोध वामपंथियों की एक अतिरिक्त विशेषता है।

वे सत्ताच्युत होने पर लोक-अधिकार, अभिव्यक्ति, प्रजातंत्र और संविधान की बातें तो करते है, किंतु सत्तासीन होने पर उन्ही जीवंत मूल्यों की हत्या करने में देर नहीं लगाते। केरल-प.बंगाल-त्रिपुरा राज्यों में वामपंथियों का इतिहास राजनीतिक विरोधियों का दमन, मतभेद के अधिकार का हनन और हिंसा से भरा है। सच तो यह है कि घृणा प्रेरित ‘हीथन’ और ‘काफिर-कुफ्र’ दर्शन के बाद वामपंथी चिंतन ने वैश्विक मानवता, समरसता और बहुलतावाद को सर्वाधिक क्षतिग्रस्त किया है।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सांसद और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष हैं।)

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