Home लेख पुष्कर सिंह धामी होने के कुछ मायने भी हैं

पुष्कर सिंह धामी होने के कुछ मायने भी हैं

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  • ध्रुव रौतेला

पृथक पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की कल्पना कर इसको अविभाजित उत्तरप्रदेश से अलग हुए 21 वर्ष हुए हैं और प्रदेश को 11 वें मुख्यमंत्री के रूप में एक नया चेहरा मिला है पुष्कर सिंह धामी के रूप में। केंद्रीय नेतृत्व ने बड़े अनुभवी मंत्री विधायकों को दरकिनार कर 45 वर्षीय उधम सिंह नगर जनपद की खटीमा विधानसभा से दूसरी बार चुने गए धामी पर अपना मास्टर स्ट्रोक खेला है। जब आठ महीने के भीतर चुनाव खड़े हों तो इस चुनौतीपूर्ण समय में उनके चयन के मायने हैं।

2003 से 2007 तक धामी भारतीय जनता मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए मजबूत एन डी तिवारी सरकार को अपने राजनीतिक गुरु तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष भगत सिंह कोश्यारी की छाया में सशक्त विपक्ष के रूप में घेरने में कामयाब हुए और तब के केंद्रीय संगठन के नेताओं जैसे राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान, धर्मेंद्र प्रधान की नजर में आये। पहाड़ में जन्मे मैदान में विधायक धामी एक फौजी पिता के इकलौते पुत्र हैं। चूंकि उनसे मेरा परिचय वर्ष 2001 राज्य गठन के बाद से ही ऊर्जा मंत्री और फिर मुख्यमंत्री बने श्री भगत सिंह कोश्यारीजी के सहयोगी के रूप के जमाने से है तो मैंने उनकी कार्यशैली को करीब से देखा और जाना है। गैर सरकारी पदों में रहते हुए भी उत्तराखंड की अफसरशाही में उनकी लंबे समय से पकड़ है ।

प्रशासनिक क्षमता के मामले में विधायक या उससे पहले दर्जी मंत्री रहते हुए भी सरकारी काम सरलता से करवाना उनको आता है। वर्ष 2006 की एक बार की बात है। रात के लगभग 11 बजे पुष्कर सिंह धामी बागेश्वर की तरफ से भाजयुमो अध्यक्ष रहते हुए परिवर्तन यात्रा से लौट रहे थे। मेरे भीमताल घर पर उन्होंने दस्तक दी और प्रेम से ‘माताजी रसोई में चलिए, बड़ी भूख लगी है- बोलकर कढ़ाई में ही बनी आलू-मटर-टमाटर की सब्जी और रोटी में ईजा का सहयोग कर खाने लगे और फिर सीधा आगे हल्द्वानी को प्रस्थान कर गए।’

बाबूजी के विशेष कार्याधिकारी रहते हुए जिस दिन सीधे वह भाजयुमों अध्यक्ष बनाये गए, उस दिन खैरना (कैंची धाम) में उनकी आंखों की चमक और अत्मविश्वास मुझे आज भी याद है। सभी वरिष्ठों को साथ लेकर चलने की एक बड़ी चुनौती उनके सामने खड़ी है। शपथ ग्रहण में उन्होंने काली टोपी और धोती पहनकर निश्चित रूप से एक बढिय़ा मैसेज भी दिया है। धामी के साथ एक और संयोग जुड़ गया है कि महाराष्ट्र में युवा देवेंद्र फडणवीस भी दूसरी बार मे विधायक रहते हुए मुख्यमंत्री बनाये गए और गोवा में भी युवा डॉ. प्रमोद सावंत दूसरी बार के ही विधायक रहते हुए केंद्र द्वारा मुख्यमंत्री प्रत्याशी तय किये गए और इन दोनों राज्यों के राज्यपाल इस समय उनके राजनीतिक गुरु श्री भगत सिंह कोश्यारी ही हैं।

सबसे ज्यादा युवा वोटरों वाले और फौजी पृष्ठभूमि के प्रदेश में पूर्व सैनिक मतदाताओं का बड़ा वोट बैंक तो है ही, प्रदेश में बहुसंख्यक क्षत्रिय समाज से भी वह आते हैं। मुख्यमंत्री बनने के पहले दिन ही उनके एक फैसले की जबरदस्त प्रशंसा हो रही है और वह है विवादों में रहे मुख्य सचिव ओमप्रकाश की छुट्टी कर वह केंद्र की प्रतिनियुक्ति में भेजे गए। वह 1988 बैच के अनुभवी और ईमानदार छवि के आईएएस डॉ. एस एस संधू को ले आये हैं। यहां भी धामी की राजनीतिक दूरदर्शिता नजर आती है।

किसान आंदोलन से नाराज सिख किसानों को वह दो बड़े जिलों हरिद्वार और उधम सिंह नगर में जहां साध सकते हैं वही नौकरशाही को ईमानदार नेतृत्व का स्पष्ट संदेश देते दिखाई दे रहे हैं। पहली कैबिनेट बैठक में अतिथि शिक्षकों वेतनमान 15 हजार से 25 हजार बढ़ाकर उन्होंने युवाओं को सौगात भी दी है ।
( लेखक राज्यपाल कोश्यारी के निजी सचिव हैं और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के करीबी हैं )

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