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प्रासंगिक बने रहने की चेतावनी

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  • प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार पर बल दिया

मोदी ने चाणक्य के शब्दों को दोहरारते हुए संयुक्त राष्ट्र को चेतावनी दी कि, ‘सही समय पर जब उचित कार्य नहीं किया जाता तो समय ही उस कार्य की सफलता को असफल कर देता है। गोया, हमें आने वाली पीढिय़ों को उत्तर देना है कि जब फैसले लेने का समय था और जिन पर विश्व को दिशा देने का दायित्व था, वे विकसित देश क्या कर रहे थे ? यदि संयुक्त राष्ट्र को खुद को प्रासंगिक बनाए रखना है तो उसे अपना प्रभाव दिखाना होगा।

  • प्रमोद भार्गव, वरिष्ठ पत्रकार
    pramod.bhargava15@gmail.com

संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा की 76वीं वर्षगांठ के अवसर पर अमेरिका की धरती से स्वयं को चाय बेचने वाला बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘यह भारत के लोकतंत्र की ताकत है कि एक छोटा बच्चा जो कभी रेलवे स्टेशन की चाय-दुकान पर अपने पिता की मदद करता था, वह आज चौथी बार भारत के प्रधानमंत्री की हैसियत से इस वैश्विक महासभा को संबोधित कर रहा है।

मोदी ने चाणक्य के शब्दों को दोहरारते हुए संयुक्त राष्ट्र को चेतावनी दी कि, ‘सही समय पर जब उचित कार्य नहीं किया जाता तो समय ही उस कार्य की सफलता को असफल कर देता है। गोया, हमें आने वाली पीढिय़ों को उत्तर देना है कि जब फैसले लेने का समय था और जिन पर विश्व को दिशा देने का दायित्व था, वे विकसित देश क्या कर रहे थे ? यदि संयुक्त राष्ट्र को खुद को प्रासंगिक बनाए रखना है तो उसे अपना प्रभाव दिखाना होगा। विश्वसनीयता को बढ़ाना होगा। यूएन पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। अफगानिस्तान पर संकट, दुनिया पर चल रहे छाया युद्ध (प्रॉक्सी वार) और कोरोना वायरस की उत्पत्ति ने इन सवालों को गहरा दिया है।

मोदी ने उन देशों को भी नाम लिए बिना चेतावनी दी कि जो देश आतंकवाद को बतौर हथियार इस्तेमाल कर रहे हैं, वे यह बात भूल रहे है कि आतंकवाद उनके लिए भी खतरा है। साफ है, भारतीय प्रधानमंत्री ने जितनी मुखर आक्रामकता से यूएन को उसी के मंच से फटकार लगाई है, उतनी बेवाकी से अन्य कोई राष्ट्र प्रमुख नहीं लगा पाया है।
नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र की कार्य-संस्कृति पर प्रश्न-चिन्ह लगाकर नसीहत दी है कि यदि यह वैश्विक संस्था अपने भीतर समयानुकूल सुधार नहीं लाती है तो कालांतर में महत्वहीन होती चली जाएगी और फिर इसके सदस्य देशों को इसकी जरूरत ही नहीं रह जाएगी।

भारत जैसे देश को संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता से बाहर रखते हुए इस संस्था ने जता दिया है कि वहां चंद अलोकतांत्रिक या तानाशाह की भूमिका में आ चुके देशों की ही तूती बोलती है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के अस्थायी सदस्य के रूप में भारत 1 जनवरी 2021 से दो साल के लिए चुन लिया गया है। भारत समेत कई देश इसमें सुधारों की मांग कर रहे हैं। परिषद् में स्थाई सदस्यता पाने के लिए भारत के दावे को अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस व रूस समेत कई देश अपना समर्थन दे चुके हैं। लेकिन चीन के वीटो पावर के चलते भारत परिषद् का स्थायी सदस्य नहीं बन पा रहा है।

चीन के अलावा वीटो की हैसियत अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस रखते हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की उम्र 76 वर्ष हो चुकने के बावजूद इसके मानव कल्याण से जुड़े लक्ष्य अधूरे हैं। इसकी निष्पक्षता भी संदिग्ध है। इसीलिए वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापित करने और आतंकी संगठनों पर लगाम लगाने में नाकाम रहा है। अब तो आतंकवादी संगठन तालिबान ने पूरा एक देश अफगानिस्तान ही कब्जा लिया है।

अतएव अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को समझने की जरूरत है कि तालिबान को काबू में लेकर उसे सही रास्ते पर लाने में कामयाबी तब मिलेगी, जब पाकिस्तान को नियंत्रित किया जाएगा। क्योंकि वह पाकिस्तान ही है, जिसकी बाहरी और भीतरी मदद से तालिबान अफगानिस्तान पर आधिपत्य कर पाया। यदि समय रहते पाकिस्तान की हरकतों पर लगाम लगाई गई होती तो अमेरिका और तालिबान के बीच दोहा की राजधानी कतर में हुई संधि की भी धज्जियां नहीं उड़ी होतीं। इसी तरह चीन की अनैतिक विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं पर भी अंकुश नहीं लग पा रहा है।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद शांतिप्रिय देशों के संगठन के रूप में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का गठन हुआ था। इसका अहम् मकसद भविष्य की पीढिय़ों को युद्ध की विभीषिका और आतंकवाद से सुरक्षित रखना था। इसके सदस्य देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन को स्थायी सदस्यता प्राप्त है। याद रहे चीन जवाहरलाल नेहरू की अनुकंपा से ही सुरक्षा परिषद् का सदस्य बना था। जबकि उस समय अमेरिका ने सुझाया था कि चीन को संयुक्त राष्ट्र में लिया जाए और भारत को सुरक्षा परिषद् की सदस्यता दी जाए। लेकिन अपने उद्देश्य में परिषद् को पूर्णत: सफलता नहीं मिली।

भारत का दो बार पाकिस्तान और एक बार चीन से युद्ध हो चुका है। इराक और अफगानिस्तान, अमेरिका और रूस के जबरन दखल के चलते युद्ध की ऐसी विभीषिका के शिकार हुए कि आज तक उबर नहीं पाए हैं। तालिबान की आमद के बाद अफगानिस्तान में किस बेहरमी से विरोधियों और स्त्रियों को दंडित किया जा रहा है, यह किसी से छिपा नहीं रह गया है? इजराइल और फिलींस्तान के बीच युद्ध एक नहीं टूटने वाली कड़ी बन गया है। अनेक इस्लामिक देश गृह-कलह से जूझ रहे हैं। उत्तर कोरिया और पाकिस्तान बेखौफ परमाणु युद्ध की धमकी देते रहते हैं। दुनिया में फैल चुके इस्लामिक आतंकवाद पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।

साम्राज्यवादी नीतियों के क्रियान्वयन में लगा चीन किसी वैश्विक पंचायत के आदेश को नहीं मानता। इसका उदाहरण अजहर जैसे आतंकियों को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने पर चीन का बार-बार वीटो का इस्तेमाल करना है। जबकि भारत विश्व में शांति स्थापित करने के अभियानों में मुख्य भूमिका निर्वाह करता रहा है। बावजूद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी एवं सामुदायिक बहुलता वाला देश सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य नहीं है।

भारत में दुनिया की 18 फीसदी आबादी रहती है। दुनिया का हर छठा व्यक्ति भारतीय है। साफ है, संयुक्त राष्ट्र की कार्य-संस्कृति निष्पक्ष नहीं है। कोरोना महामारी के दौर में विश्व स्वास्थ्य संगठन की मनवतावादी केंद्रीय भूमिका दिखनी चाहिए थी, लेकिन वह महामारी फैलाने वाले दोषी देश चीन के समर्थन में खड़ा नजर आया।

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