Home लेख स्वाधीनता के स्वर: 1857 स्वातंत्र्य समर के प्रथम शहीद कुंवर चैन सिंह

स्वाधीनता के स्वर: 1857 स्वातंत्र्य समर के प्रथम शहीद कुंवर चैन सिंह

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रंजना चितले

नरसिंहगढ़ के राजकुमार कुंवर चैनसिंह ने प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 के लगभग 33 वर्ष पूर्व अंग्रेजों से सीधे युद्ध किया। अपनी हार की प्रबल संभावना के बावजूद उन्होंने समझौता नहीं किया और शहीद हो गये। सीहोर के दशहरा बाग मैदान म ेंहोने वाले रक्तरंजित युद्ध की पृष्ठभूमि 1818 में लिखी गयी थी। अंग्रेजों की साम्राज्य विस्तार की रणनीति के तहत 1818 में कैप्टन स्टीवर्ड और भोपाल के नवाब नजरउद्दौला नजर खान के बीच रायसेन में एक समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत अंग्रेजों ने सीहोर में अपनी छावनी कायम की। यहाँ मैडाक को पोलिटिकल एजेण्ट नियुक्त किया जिसके नियंत्रण में 1000 संख्या वाली फौज रखी गई। इस फौज को भोपाल राज्य के खजाने से वेतन दिया जाता था। भोपाल के साथ-साथ नरसिंहगढ़, खिलचीपुर और राजगढ़ की रियासतों संबंधी राजनीतिक अधिकार भी मैडाक को सौंप दिए गए।

नवाब भोपाल तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंग्रेजों का वफादार बना रहा, लेकिन सीहोर छावनी की स्थापना के छ:वर्ष बाद अंग्रेजों को क्रांति का सामना करना पड़ा। नरसिंहगढ़ रियासत का दीवान आनंदराम बख्शी गुप्त जानकारियाँ मैडाक को देता था। कुंवर चैन सिंह ने गद्दार आनंदराम को मौत के घाट उतार दिया। तभी एक और गद्दार मंत्री रूपराम बोहरा ने इन्दौर के होल्कर राज्य द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध मध्य भारत के सभी रजवाड़ों को संघर्ष के लिए एकजुट करने हेतु बैठक बुलाने तथा उसमें कुंवर चैनसिंह के भाग लेने की जानकारी मैडाक को पहुंचाई थी। कुंवर चैन सिंह ने गद्दार रुपराम बोहरा को भी मौत के घाट उतार दिया। गवर्नर जनरल ने मैडाक से जवाब-तलब किया। मैडाक ने चैनसिंह को उपस्थित होने का संदेश भेजा। मैडाक ने समझौते का प्रस्ताव रखा कि नरसिंहगढ़ क्षेत्र में होने वाली अफीम की खरीदी सिर्फ अंग्रेज ही करेंगे। यदि यह शर्त नहीं मानी गई तो आपके खिलाफ दोनों मंत्रियों की हत्या का मुकदमा चलेगा।

चैन सिंह ने अंग्रेजों की शर्त न मानकर संघर्ष को स्वीकारा। चैनसिंह के विरोध और शर्त न मानने पर मैडाक ने उन्हें 24 जून, 1824 को सीहोर आने को कहा। वे नरसिंहगढ़ से अपने विश्वस्त साथियों को लेकर निर्धारित तिथि को सीहोर आ पहुँचे। पॉलिटिकल एजेण्ट के निवास पर चैनसिंह और मैडाक की मुलाकात हुई। चैनसिंह उन्हें निहत्था कर बंदी बनाने अथवा मार डालने की अंग्रेजों की साजिश भांप चुके थे।मैडाक ने चैनसिंह को बंदी बनाने का आदेश दे दिया। चैनसिंह ने मैडाक पर हमला बोला।

सीहोर के वर्तमान तहसील चौराहे पर चैनसिंह के साथियों और अंग्रेजों के बीच भीषण लड़ाई हुई। एक ओर चैनसिंह और उनके मु_ीभर वीर साथी थे तो दूसरी ओर एक बड़ी और सुसज्जित अंग्रेजी फौज। कुछ घण्टों की लड़ाई में ही चैनसिंह के अधिकांश साथी मारे गए। चैनसिंह और उनके दो अंगरक्षकों हिम्मत खाँ और बहादुर खाँ बहादुरी से लड़ते रहे। अंत: सीहोर के वर्तमान दशहरा बाग वाले मैदान में चैनसिंह और उनके दो साथी भी वीरगति को प्राप्त हुए।

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