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स्वाधीनता के स्वर : बुन्देलखण्ड में क्रांति का मोर्चा बानपुर के राजा मर्दनसिंह

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  • रंजना चितले

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बुन्देलखण्ड की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसी वीरभूमि में जन्मे मर्दन सिंह ने मुक्ति संग्राम में बुन्देलखण्ड का नेतृत्व किया उनके साथी थे शाहगढ़ के राजा बखतबली। बानपुर वर्तमान ललितपुर जिले में ललितपुर शहर के पश्चिम में मेहरोनी से नौ मील दूर जामनी नदी के निकट स्थित है। पहले बानपुर चंदेरी के बड़े राज्य का हिस्सा था। सन् 1808 में मर्दन सिंह के पिता मोद प्रहलाद चंदेरी के राजा हुए। 1830 में बानपुर को अपने राज्य की राजधानी बनाया गया।

राजा मोद प्रहलाद की मृत्यु उपरान्त सन् 1842 में मर्दन सिंह ने बानपुर का राज्य संभाला। रणकौशल में निपुण अप्रतिम योद्धा मर्दन सिंह ने 1857 के स्वाधीनता संग्राम में बुन्देलखण्ड के नेतृत्व का झण्डा थामा। राजा मर्दन सिंह की प्रेरणा से ललितपुर के फौजी सक्रिय हुए। राजा मर्दनसिंह का अंग्रेजों से प्रत्यक्ष युद्ध सागर-झांसी मार्ग पर मालथौन के निकट हुआ। क्रांति की ज्वाला प्रज्जवलित हुई और जुलाई के अंत तक क्रांतिकारियों ने बुंदेलखण्ड के बड़े क्षेत्र पर अपना अधिकार जमा लिया जहां मर्दनसिंह ने खुरई, खिमलासा, पंचमहल, नरियावली, भोपावर को जीता वहीं शाहगढ़ के बखतबली ने मनकोटा, मालथौन, बिनौला पर कब्जा किया। जनवरी 1858 के अंतिम सप्ताह में दमन अभियान के अन्तर्गत जब ह्यूरोज ने राहतगढ़ पर धावा बोला तो क्रांतिकारियों की सहायता के लिए मर्दनसिंह ने अंग्रेजी सेना पर आक्रमण किया।

राजा मर्दनसिंह से अंग्रेजों का अगला युद्ध 30 जनवरी, 1858 को बड़ौदिया के किले में हुआ। राजा अंग्रेजों को धकेलते हुए बीना नदी तक ले गये। राजा के युद्ध कौशल ने अंग्रेजों के होश उड़ा दिये। ह्यूरोज गढ़ाकोटा, नरियावली, हुरई, सानोदा होते हुए झांसी पर कूच करने वाला था। मर्दनसिंह हर हाल में ह्यूरोज की सेना को झांसी जाने से रोकना चाहते थे। सागर से झांसी का रास्ता विंध्याचल की पर्वत श्रेणियों से होकर जाता था। मर्दनसिंह ने इस रास्ते में मालथौन के पास नरहर की घाटी में ह्यूरोज से लोहा लेने के लिए मोर्चा जमाया। लेकिन किसी गद्दार ने ह्यूरोज को इस मोर्चे की सूचना दे दी। ह्यूरोज ने भ्रमित करने के लिए नरहर की घाटी के रास्ते में छोटी सेना भेजी और खुद मदनपुर की घाटी से आगे बढ़ा और बानपुर पहुंचा। उसने किले को ध्वस्त कर दिया। राजा के पुस्तकालय को जला दिया।

10 मार्च 1858 को ह्यूरोज ने बानपुर पर अधिकार कर लिया। लूट-खसौट का तांडव मचा। राजा जंगल में मोर्चे पर थे। बानपुर के लोगों पर आतंक बरसाया गया। अब राजा मर्दनसिंह और राजा बखतबली दोनों सांझे अभियान पर निकल पड़े, उनकी ह्यूरोज से शाहगढ़ और ठनगना में मुठभेड़ हुई। दोनों झांसी न पहुंच पाये इसलिए ह्यूरोज ने रास्ते में सेना जमा रखी थी। दोनों राजा पहले चरखारी गए और चरखारी जीतने में तात्या टोपे की सहायता की। फिर वे झांसी की रानी की सहायता के लिए बरुआ होते हुए झांसी पहुंचे। ह्यूरोज की सेना पर पीछे से आक्रमण किया। झांसी युद्ध के बाद राजा मर्दनसिंह और बखतबली कालपी पहुंचे जहां रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, राव साहब से राजा मर्दनसिंह की विचार मंत्रणा हुई और फिर अगले मोर्चे पर चल दिए।

अंग्रेजों से खुरई में युद्ध हुआ। राजा ने ललितपुर को संगठित किया तभी रानी लक्ष्मीबाई की शहादत की खबर मिली। फिर भी दोनों रणबांकुरे ग्वालियर की ओर बढ़े। मुरार में जुलाई 1858 को राजा मर्दनसिंह और राजा बखतबली दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया और अपनी जन्मभूमि, कर्मभूमि से बहुत दूर लाहौर जेल भेज दिया। सन् 1874 में उन्हें आगरा संभाग में रहने की अनुमति मिली। अपने जीवन के संध्याकाल में वे मथुरा-वृन्दावन में रहे।

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