Home लेख स्वाधीनता के स्वर: स्वाधीनता के लिए बलिदान हुए बड़वानी के खाज्या नायक

स्वाधीनता के स्वर: स्वाधीनता के लिए बलिदान हुए बड़वानी के खाज्या नायक

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  • रंजना चितल

भील जन-जाति स्वतंत्रता प्रेमी है। परतंत्रता उन्हें स्वीकार्य नहीं है। उनके शौर्य के कारण मराठों ने उन्हें चौकीदारी सौंपी और यात्रियों व कारवां से सुरक्षा के बदले चुंगी वसूल करने का अधिकार भी दिया। 1818 के बाद भील क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन हो गया। अंग्रेज अधिकारियों ने विभिन्न भील नायकों और सरदारों को बुलाकर उनसे समझौता करना चाहा। लेकिन भील नायकों को सरकारी पद, चौकीदारी तथा वज़ीफा देने की अंग्रेज नीति विफल रही।


1824 में ‘खानदेश भील कोर का गठन हुआ जिसमें भीलों को ही नियुक्त किया गया। इस ‘कोर का मुख्य काम था अन्य भीलों से युद्धकर उन्हें नियंत्रण में रखना। कुछ समय के लिये यह नीति सफल रही। लेकिन 1840 से भील संघर्ष की राह पर चल दिये। उनका अपनी तरह का यह संघर्ष 1857 तक आते-आते चरम पर था। इसी समय के भील नायक थे खाज्या नायक। खाज्या नायक सेंधवा घाट के वार्डन गुमान नायक के पुत्र थे।

1833 में गुमान नायक की मृत्यु के बाद खाज्या नायक को सेंधवा घाट का नायक बनाया गया। एक हत्या का आरोप लगाकर उन्हें 1850 में अंग्रेज सरकार ने बन्दी बना लिया और 10 साल की सजा दी पर 1856 में उन्हें छोड़ दिया गया और फिर से सेंधवा घाट के वार्डन की नौकरी पर रख लिया। लेकिन स्वाभिमानी खाज्या ज्यादा दिन वहां नहीं रहे और नौकरी छोड़ दी। 1857 में उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियां तेज कर दी। उनके दल में 800 लोग हो गये जिनमें 150 बंदूकची, 80 मकरानी और अरब भी थे। उनके आमंत्रण पर 7 अक्टूबर 1857 को महादेव नायक, देवलिया नायक अपने 200 साथियों के साथ खाज्या के घर सांगवी आये। उनके दल ने खानदेश में सिरपुर को लूटा और 20 जनवरी 1858 को जामनेर के पास सामान से लदी बैलगाडिय़ों को भी लूट लिया।

ये क्रांतिकारी लूट का सारा सामान गरीबों में बांट देते थे। जून 1858 को ले. एटकिन्स और ले. पोरबिन ने नेवली के दक्षिण-पश्चिम में खाज्या के दल पर हमला बोल दिया जिसमें खाज्या की पराजय हुई लेकिन वे बच निकले। खाज्या का भीलों पर बहुत प्रभाव था और भीलों को भी खाज्या पर पूरा भरोसा था। सिरपुर से पांच मील दूर तक के सभी भील खाज्या के दल में शामिल हो गए। इसके अलावा भीमा नायक भी अपने दल के साथ 9 अक्टूबर 1858 को खाज्या के साथ हो गये। 1857 का महासमर समाप्त होने के बाद भी अंग्रेजों के खिलाफ खाज्या का संघर्ष जारी रहा। 1860 की शुरुआत में जब खाज्या नायक की खोज खबर का सघन अभियान चलाया गया तब वे बड़वानी चले गये और वहां भी क्रांति योजना में जुट गये। अंग्रेज सैनिक अधिकारियों बर्च, होसिलवुड तथा एटकिन्स को खाज्या नायक को पकडऩे के लिये भेजा गया।

1 जुलाई 1860 को दोनों में प्रत्यक्ष युद्ध हुआ। क्रांतिकारियों को तोप के गोले से उड़ा दिया गया जिससे क्रांतिकारियों के लगभग 1500 लोग मारे गये और 150 लोग पकड़े गये जिन्हें पेड़ पर बांधकर गोली से उड़ा दिया गया। खाज्या के सभी साथियों को पलायन करना पड़ा या बन्दी बना लिये गये। खाज्या के साथ भील, मकरानी और अरब योद्धा भी थे। तमाम कोशिशों के बावजूद जब खाज्या नायक पकड़े नहीं जा सके तो अंग्रेज पुलिस अधिकारी ने साजिश रची। सादे वेश में रोहिद्दीन नामक एक मकरानी जमादार को खाज्या के पास नौकरी की तलाश में भेजा गया।

उसने कुरान की शपथ लेकर वफादारी का वादा किया। 3 अक्टूबर 1860 को खाज्या नायक स्नान उपरान्त सूर्य की ओर मुंह करके खड़े थे तभी रोहिद्दीन ने पीछे से गोली चला दी और खाज्या गिर पड़े। गद्दारी के पुरस्कार में रोहिद्दीन को जमादार बना दिया गया।

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