Home लेख स्वाधीनता के स्वर: समर्पण की बजाय मृत्यु का वरण- वीरांगना दुर्गावती

स्वाधीनता के स्वर: समर्पण की बजाय मृत्यु का वरण- वीरांगना दुर्गावती

65
0
  • रंजना चितले

गढ़ा मण्डला की रानी दुर्गावती भारतीय इतिहास के मध्यकाल की पहली वीरांगना हैं जिन्होंने स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए हाथ में तलवार लेकर मैदान में संघर्ष किया। मध्यकाल को भारतीय स्वाभिमान के लिए अंधकार का युग माना जाता है। यह वह युग था जब स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने वाले तमाम देशी राजा बिना युद्ध किये ही मुगल सल्तनत के सामने समर्पण करते जा रहे थे।

वह समर्पण भी साधारण नहीं था। मान-मर्दन करने का ऐसा अभियान था जिसमें व्यक्ति को अपनी पहचान मिटाकर दासत्व अंगीकार करना था। कोई अपनी बेटियों को शादी का स्वरूप देकर भेजता, कोई अपने बेटे को बतौर बंधक स्वीकार करता तो किसी के घोड़ों पर शाही सल्तनत की सील लगाई जाती। ऐसे भयानक दौर में अपने राज्य पर आक्रमण के वक्त रानी दुर्गावती यह अच्छी तरह जानती थी कि युद्ध में जीत उनकी नहीं होगी मुगल फौज के मुकाबले का मतलब है सर्वनाश के साथ मृत्यु।

रानी दुर्गावती के सामने दो ही विकल्प थे। एक सम्पूर्ण समर्पण और दूसरा सम्पूर्ण विनाश। स्वाभिमान और स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानने वाली रानी दुर्गावती को सब कुछ खोकर दासत्व का जीवन मंजूर नहीं था उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया। वे कहा करती थीं ‘जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है, समर्पण से वह एक क्षण आगे नहीं बढ़ेगी, तब जिसे कल स्वीकार करना हो वह आज ही सही। बस इसी उद्घोष के साथ वे हाथ में तलवार लेकर विन्ध्याचल की पहाडिय़ों में मोर्चा लगाकर बैठ गईं।

युद्ध का पहला दिन रानी के पक्ष में रहा। गौंडवाना के वीरों के साहस और उनके तीरों के अचूक निशाने के सामने मुगल सेना के छक्के छूट गये, किन्तु दूसरे दिन पाँसा पलट गया। मुगल सेनापति आसफ खाँ की मदद के लिए तोपखाना आ गया था। तोप का मुकाबला तीरों से नहीं हो सकता था। तोपों ने गौंडवाने का शौर्य-सम्मान और स्वाभिमान दोनों को धूसरित कर दिया था। यह लड़ाई 1564 में हुई थी। आसफ खाँ की फौज में 12 हजार पैदल, दस हजार घुड़सवार और इसके साथ एक मज़बूत तोपखाना था।


राठ महोबा के चन्देल राजा शालिवाहन के घर जन्मी रानी दुर्गावती 1542 में विवाह के बाद गढ़ा मंडला आयी थीं, दुर्भाग्य से पति दलपतिशाह की मौत अल्पायु में ही हो गई। रानी का दाम्पत्य जीवन लगभग 7 साल ही चला, किन्तु वे विचलित नहीं हुईं। अपने अबोध बालक वीरनारायण को गद्दी पर बैठाकर राजकाज संभालने लगीं। कोई पंद्रह वर्षों के शासन प्रबंध में रानी ने अनेक निर्माण कार्य करवाए। रानी की दूरदर्शिता और प्रजाहित चिन्तन का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने निर्माण कार्यों में जलाशयों, पुलों और रास्तों को प्राथमिकता दी ताकि नर्मदा के किनारे फैले सुदूर वनों की उपज का व्यापार हो सके और जलाशयों से किसान खेती के लिए पानी जुटा सकें। ‘रानीताल, ‘चेरीताल, ‘आधारताल जैसे अद्भुत निर्माण रानी की दूरदर्शिता एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के उदाहरण हैं।


52 गढ़ों वाले विस्तारित गोंडवाना राज्य की सम्पन्नता, समृद्धि व विशेषता की यही साख अकबर को रास नहीं आई। उसने पहले रानी के पास समर्पण करने और अधीनता स्वीकार करने का संदेशा भेजा। रानी ने अस्वीकार कर दिया तो फौज चढ़ आई। विसंगति रही कि तोपों की मार से जब गोंडवाना की फौज ने पीछे हटना चाहा तो नाले की बाढ़ ने रास्ता रोक दिया। खुद रानी का हाथी आगे न बढ़ पाया। रानी घेर ली गईं और राजकुमार वीरनारायण घायल हो गए। रानी के घिरते ही फौज में खलबली मची और मोर्चा बंदी बिखर गई।

Previous articleभारत के लिए खतरा है तालिबानी सोच
Next articleभारत पेट्रोलियम के भोपाल राज्य कार्यालय को राजभाषा हिन्दी के आदर्श कार्यान्वयन पर मिली सराहना

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here