Home लेख स्वाधीनता के स्वर : टंट्या भील- वन प्रांतर का जनयोद्धा

स्वाधीनता के स्वर : टंट्या भील- वन प्रांतर का जनयोद्धा

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  • रंजना चितले


टंट्या भील एक ऐसा व्यक्तित्व था जिसने अंधेरे वन प्रांतरों में जन्म लेकर, अभाव और अशिक्षा से जूझते हुए अपनी इच्छा शक्ति और संकल्प से एक ऐसा असाधारण आंदोलन छेड़ा जो शोषण और अन्याय के प्रतीकार का प्रतीक बनकर सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में छा गया। जनसेवा, नारी सम्मान और अपने समाज के प्रति टंट्या का जुड़ाव इतना गहरा था कि आज भी इस इलाके का हर बच्चा बलिदानी टंट्या को मामा के संबोधन से पुकारता है। समूचे मालवा निमाड़ अंचल के वन प्रांतों में किवदंती बना टंट्या भील का जन्म 1842 में निमाड़ के वन क्षेत्रों में बसे पंधाना तहसील के छोटे से गांव बड़दा में हुआ था।

टंट्या भील का बचपन सामंतों और साहूकारों के शोषण के सामाजिक परिवेश में बीता। तब आदिवासियों का कोई मान नहीं था। उनकी व्यथा का कोई बोध नहीं। उनके दुखों का किसी को कोई दर्द नहीं था। कोई सुनवाई, कोई अपील या सहानुभूति के शब्द तक नहीं थे। तब संत सिंगाजी से संस्कारित टंट्या ने निमाड़ में शोषण के खिलाफ विद्रोह की परम्परा को जन्म दिया। टंट्या शुरु से ही स्वाभिमानी, निर्भिक और साहसी था। कहते हैं अंग्रेजों से उसकी भिड़ंत मात्र 13 वर्ष की आयु में ही हो गयी। हुआ यह कि वह अपने मित्रों की टोली के साथ माण्डू किला देखने गया। उस जमाने में अंग्रेजों का इतना आतंक था कि निगरानी चौकी पर थानेदार की टंगी हुई टोप को भी लोग सलाम करते थे। उस टोप की निगरानी एक सिपाही किया करता था।

जो सलाम नहीं करता उसे बेतों की सजा दी जाती थी। टंट्या जब तीर कमान से लैस होकर माण्डू किला पहुंचा तो उसने टोप को सलाम नहीं किया, जब सिपाही ने टोका तो तीर कमान तान लिया और सिपाही को सिर पर टोप लगाने को मजबूर कर दिया और फिर जंगल में भाग गया। तीर कमान चलाने में टंट्या का निशाना अचूक था, वह लाठी भी अच्छी चलाता था। दौडऩे में उसकी क्षमता 6 घंटे में 60 कोस यानि 35 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा और जब बंदूक चलाना सीखा तो उसमे भी निशानेबाजी अचूक थी। टंट्या के जीवन में विद्रोह अपने और समाज के शोषण को देखकर हुआ। टंट्या ने सबसे पहले अपने ही गांव में शिवा पटेल के खिलाफ मात्र 14 वर्ष की आयु में आवाज उठायी। जिसके प्रतिकार स्वरूप शिवा पटेल ने उसके पिता की हत्या कर दी। बस यहीं से टंट्या का विद्रोह शुरु हुआ। टंट्या का विद्रोह सामंतों और साहूकारों के विरुद्ध जनक्रांति थी जो आगे चलकर अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता का संग्राम बना।

टंट्या ने पांच वर्ष तक मालवा-निमाड़ यहां तक की राजस्थान की सीमा तक भ्रमण करके लोगों में जागृति उत्पन्न की। शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का मानसिक आधार बनाया। पांच वर्ष बाद लौटकर टट्या अपने गांव विरदा आया तब शिवा पटेल आतंक बरपा रहा था। लोगों से बेगारी करवाना, ऊपर से लगान वसूली के नाम पर जनजाति समाज का मानसिक, दैहिक शोषण का तांडव चल रहा था। टंट्या ने गांव वालों को एकत्रित करके उन्हें खेती करने के लिए प्रेरित किया। टंट्या की प्रेरणा से लोगों ने अपने खेतों में अपनी खेती करना शुरु किया। यह बात पटेल, साहूकारों के बर्दाश्त से बाहर थी, उन्होंने टंट्या पर चोरी का इल्जाम लगाकर जेल भिजवा दिया।

एक वर्ष पश्चात जेल से छूटकर टंट्या अपने गांव विरदा न पहुंतर लोगों में असहयोग जगाने के लिए पहले पोखर फिर हीरापुर गया, और झोपड़ी बनाकर रहने लगा। वहां वह मजदूरी करता और अपना अभियान चलाता। यह बात हीरापुर के हिम्मत पटेल को खटकती है वह झूठी चोरी की साजिश रचकर टंट्या को फंसाता है और टंट्या को फिर जेल भेज दिया जाता है। वहां उसकी भेंट बिजन्या भील से होती है। दोनों मिलकर मुक्ति संग्राम का संकल्प लेते हैं। जेल में भी टंट्या के खिलाफ षड्यंत्र रची जाती है। टंट्या को इस साजिश का पता चल जाता है। जब उसे जबलपुर से खण्डवा जेल शिफ्ट करने के लिए ले जाते हैं तो वह वहां से भाग निकलता है। अपनी सुरक्षा के पक्ष को ध्यान में रखकर अब टंट्या निमाड़ छोड़ होल्कर और निमाड़ की सीमा सीहोरा में अपना डेरा जमाता है। वहां साधू के वेश में रहता है। उसी समय अकाल पड़ता है, टंट्या सारे सामंत साहूकारों का अनाज गरीबों में बंटवा देता है।

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