Home लेख स्वाधीनता के स्वर: 1857 महासंग्राम की नायिका वीरांगना झलकारी

स्वाधीनता के स्वर: 1857 महासंग्राम की नायिका वीरांगना झलकारी

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  • रंजना चितले

वीरांगना झलकारी बाई ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महारानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में न सिर्फ अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया बल्कि अंग्रेजों द्वारा झाँसी के किले को घेरे जाने पर जान की बाजी लगाकर मोर्चा सम्भाला और रानी को छद्म वेश में सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया। इसीलिए इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई के साथ वीरांगना झलकारी का नाम जरूर आता है। भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857, एक ऐसा सामूहिक प्रयास था जो सभी के सांझे संकल्प और निश्चय के साथ लड़ा गया।

इन बलिदानियों में शूरवीर महिलायें भी अग्रणी रही हैं। उन्होंने देश पर मर मिटने की बलिदानी परम्परा को विकसित किया। उनका यह योगदान प्रेरित भी था, उत्साहित भी और कर्मठ भी। 1857 का संघर्ष तो मानों महिला नेत्रियों को ही समर्पित था। जहाँ झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और लखनऊ की बेगम हजरत महल युद्ध का नेतृत्व कर रही थीं, वहीं झलकारी बाई जैसी वीरांगनाएं द्वितीय पंक्ति में अपना शौर्य दिखा रही थीं। झलकारी बाई के अद्वितीय शौर्य, असाधारण कौशल, अदम्य उत्साह ने समय की शिला पर अपनी अमिट छाप अंकित की है।

इस वीर सैनिक का जन्म बुन्देलखण्ड की वीरप्रसू भूमि पर झाँसी राज्य के भोजला ग्राम में सदोवसिंह के यहाँ 22 नवम्बर 1830 को हुआ था। यह वह इलाका था जहाँ आये दिन डाकुओं का आतंक रहता था। इसलिए आत्मरक्षा के लिए झलकारी के पिता ने उसे घुड़सवारी और शस्त्र संचालन में निपुण किया, ताकि समय पडऩे पर स्वत: सुरक्षा की जा सके। बचपन की यही शिक्षा आगे चलकर राष्ट्र के काम आई। आदिवासी परिवार में जन्मी इस वीर बाला की यह शिक्षा रणभूमि में फिरंगियों से जूझने में सार्थक हुई। समय, नियती और प्रकृति के मेल से झलकारी का विवाह महारानी लक्ष्मीबाई के तोपखाने के तोपची पूरनसिंह के साथ हुआ और योग्यता एवं प्रतिभा के दम पर झलकारी बाई को महारानी लक्ष्मीबाई की महिला फौज में शामिल होने का अवसर मिला।

झलकारी ने फौज के विशिष्ट सैनिक का परिचय तब दिया जब झांसी के किले पर अंग्रेजों ने चढ़ाई की थी। अंग्रेजी सेना की शक्ति-सामर्थ्य की विपुलता को देख रानी ने आपात बैठक बुलवाई, तब झलकारी ने रानी को फौज में सामग्री की अल्पता और तोपचियों की गद्दारी के राज से अवगत कराया। शत्रु के किसी भी क्षण भीतर आने की संभावना स्पष्ट की। यह झलकारी की योग्यता थी कि उसने न केवल संकट से अवगत कराया बल्कि बचाव के उपाय भी सुझाए। झलकारी ने स्वयं रानी का वेश धारण कर मोर्चा संभालने का प्रस्ताव रखा ताकि छद्मवेश में रानी सुरक्षित स्थान पर पहुंच सके। झलकारी बाई जानती थी कि रानी के वेश में युद्ध करने का मतलब है मृत्यु को वरण करना। किन्तु उनकी अद्वितीय स्वामी भक्ति, अटूट राष्ट्र निष्ठा ने उन्हें आत्म बलिदान के लिए प्रेरित किया।

योजनानुसार अदम्य साहसी व बलिदानी झलकारी प्राणों की परवाह किये बगैर टुकड़ी लेकर आगे बढ़ी लेकिन दुर्भाग्य से पहचान ली गयीं। उसे कैद कर लिया गया। पर उसका उत्साह कम न हुआ। मृत्युदंड की धमकी देने पर निर्भीक झलकारी ने निडरता से कहा- ‘मार दे गोली मैं प्रस्तुत हूँ। इस पर अंग्रेजी अफसर ने व्यंग्य किया-‘मुझे तो यह स्त्री पगली जान पड़ती है। जनरल रोज बोले- ‘यदि भारत की एक प्रतिशत महिलाएँ इसी प्रकार पागल हो जायें तो हम अंग्रेजों को सब कुछ छोड़कर यहाँ से चले जाना चाहिए। जनरल रोज़ के मन में उठे पलायन का यह भाव केवल झलकारी की वीरता से ही उपजा था। इस वाक्य में दोनों संकेत छिपे हैं।

एक महिलाओं की असीम क्षमता का और दूसरा महिलाओं द्वारा अपनी क्षमताएं न पहचानकर केवल भ्रम में जीवित रहने और सामाजिक अथवा राष्ट्रीय सरोकारों के प्रति उदासीनता का। यही नहीं, झलकारी अपनी सूझबूझ और कौशल से भागकर उस जूझती टुकड़ी में जा पहुँची थी जहां पति पूरनसिंह अंग्रेजी सेना के साथ अग्रिम मोर्चा ले रहा था तभी पूरनसिंह को तोप का गोला लगा, वह वहीं जीवित भस्म हो गया। झलकारी पति की मृत्यु पर जरा भी विचलित नहीं हुई और एक क्षण भी बिना विलम्ब किए तोप का संचालन जारी रखा और अंतिम श्वांस तक शत्रुओं की सेना को चैन नहीं लेने दिया।

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