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एक ध्येय के सूत्र से बंधे थे वीर सावरकर और भगत सिंह

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स्वातंत्र्यवीर सावरकर और भगत सिंह के बचपन के यह प्रसंग देश के दो अलग-अलग हिस्सों में घट रहे थे। भाव एक था। संस्कार एक था। लक्ष्य एक था। इसलिए आगे चलकर वे एक-दूसरे की ओर खिंचे भी चले आए। दोनों ही प्रखर बौद्धिक। दोनों ने ऐसे साहित्य की रचना की, जो क्रांति की ओर कदम बढ़ा रहे नौजवानों का पथ प्रदर्शित करता था। हम सब जानते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने भाड़े के इतिहासकारों को ठेका दिया था कि वे 1857 के स्वातंत्र्य समर के प्रभाव को कम करने के लिए उसे ‘सिपाही विद्रोह सिद्ध कर दें।

लोकेन्द्र सिंह

आपने देखा और पढ़ा होगा कि भारत में तथाकथित बुद्धिजीवियों का एक विशेष वर्ग स्वातंत्र्यवीर सावरकर और सरदार भगत सिंह को एक-दूसरे के सामने खड़ा करने का प्रयास करता है। ऐसा करते समय उसकी नीयत साफ नहीं होती। मन में बहुत मैल रहता है। दरअसल, वे स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को कमतर दिखाने और उनका अपमान करने की चेष्टा कर रहे होते हैं। लेकिन, सूरज से भी भला कोई आँखें मिला सकता है। दो महापुरुषों/क्रांतिकारियों की तुलना करके ऐसे लोग अपने ओछेपन को ही उजागर कर रहे होते हैं। ऐसा करते समय उन्हें पता ही नहीं होता कि दोनों क्रांतिवीर एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। भगत सिंह क्रांति की राह में सावरकर के प्रति आदर का भाव रखते थे और सावरकर के मन में भगत सिंह के प्रति गहरी आत्मीयता थी। सरदार भगत सिंह के बचपन का एक प्रसंग आप सबने पढ़ा या सुना होगा। भगत सिंह खेत में गड्डा खोदकर उसमें बंदूक डाल रहे थे, तब उनके चाचाजी ने पूछा कि यह क्या कर रहे हो? तब जन्मजात देशभक्त क्रांतिकारी भगत सिंह ने कहा कि ”मैं बंदूक की फसल उगा रहा हूँ, जिससे कई बंदूकें पैदा होंगी और हम सब मिलकर अपने देश को अंग्रेजों से आजाद करा लेंगे।

अब सावरकर के जीवन का प्रसंग देखिए। अतुल्य शौर्य और बलिदान के पर्याय चाफेकर बंधुओं को जब आतातायी ब्रिटिश सरकार ने फांसी दी, तो बालक सावरकर के मन पर इसका गहरा असर हुआ। चाफेकर बंधुओं की फांसी से सावरकर के भीतर जल रही क्रांति की लौ धधक उठी। 14 वर्ष का यह वीर बालक अपनी कुलदेवी माँ अष्टभुजा के चरणों में जाकर बैठ गया। उस दिन सावरकर ने अष्टभुजा देवी को साक्षी मानकर शपथ ली कि ”मैं मेरे देश की स्वतंत्रता पुन: प्राप्त करने के लिए सशस्त्र क्रांति करूंगा।

स्वातंत्र्यवीर सावरकर और भगत सिंह के बचपन के यह प्रसंग देश के दो अलग-अलग हिस्सों में घट रहे थे। भाव एक था। संस्कार एक था। लक्ष्य एक था। इसलिए आगे चलकर वे एक-दूसरे की ओर खिंचे भी चले आए। दोनों ही प्रखर बौद्धिक। दोनों ने ऐसे साहित्य की रचना की, जो क्रांति की ओर कदम बढ़ा रहे नौजवानों का पथ प्रदर्शित करता था। हम सब जानते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने भाड़े के इतिहासकारों को ठेका दिया था कि वे 1857 के स्वातंत्र्य समर के प्रभाव को कम करने के लिए उसे ‘सिपाही विद्रोहÓ सिद्ध कर दें। सरकार नहीं चाहती थी कि क्रांति की यह आग तेजी से भारत में फैले और उसके विरुद्ध एक बार फिर संगठित प्रयास हों। तब प्रखर मेधा के धनी सावरकर ने तर्कों-तथ्यों के आधार पर ‘1857 का स्वातंत्र्य समरÓ जैसा प्रेरणादायी ग्रंथ तैयार किया। यह ग्रंथ क्रांतिकारियों के लिए ‘गीताÓ बन गया था। अंग्रेजों ने इस पुस्तक पर प्रकाशित होने से पूर्व ही प्रतिबंध लगा दिया। यह दुनिया की एकमात्र पुस्तक है, जिस पर प्रकाशन के पूर्व ही प्रतिबंध लगा है।

सरदार भगत सिंह इस पुस्तक से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने रत्नागिरी जाकर वीर सावरकर से भेंट की और पुस्तक के प्रकाशन की अनुमति माँगी। भगत सिंह ने वीर सावरकर की पुस्तक को ब्रिटिश सरकार की नजरों से बचाकर प्रकाशित कराया और उसे क्रांतिकारियों के बीच पहुँचाया। सावरकर की इस पुस्तक से भगत सिंह कितने प्रभावित थे, इसको उनके एक करीबी सहयोगी राजा राम शास्त्री ने विस्तार से ‘अमर शहीदों के संस्मरणÓ में लिखा है। वीर सावरकर और सरदार भगत सिंह के इस बौद्धिक एवं क्रांतिकारी रिश्ते का एक और रोचक तथ्य है, जिसे छिपाया जाता रहा है। बुद्धिजीवियों का यह खेमा बार-बार यह तो बताता है कि भगत सिंह कम्युनिस्ट लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। लेकिन यह नहीं बताते कि सरदार भगत सिंह जेल में बंद थे तब वीर सावरकर, लाला लाजपत राय और रविन्द्र नाथ ठाकुर सहित अन्य लेखकों की पुस्तकें भी पढ़ रहे थे। भगत सिंह ने जेल में वीर सावरकर की पुस्तक ‘हिन्दू पदपादशाहीÓ को पढ़ा और उससे प्रेरणादायी नोट भी लिए थे। भगत सिंह की जेल डायरी में उनके नोट्स पढ़े जा सकते हैं। 1857 की क्रांति पर लिखी गई पुस्तक को नेताजी सुभाष चंद्र बोस और रास बिहारी बोस ने भी आजाद हिंद फौज के सैनिकों को प्रेरित करने के लिए प्रकाशित कराया था।

कई बार प्रश्न आता है कि विनायक दामोदर सावरकर को वीर की संज्ञा किसने दी? यह प्रश्न पूछने वालों को अवश्य ही भगत सिंह को पढऩा चाहिए। कोलकाता से प्रकाशित साप्ताहिक ‘मतवालाÓ के १५ और २२ नवंबर १९२४ के अंकों में भगत सिंह के लेख प्रकाशित हैं। ‘विश्व प्रेमÓ शीर्षक से प्रकाशित लेख में भगत सिंह लिखते हैं- ”विश्व प्रेमी वह वीर है जिसे भीषण विप्लववादी, कट्टर अराजकतावादी कहने में हम लोग तनिक भी लज्जा नहीं समझते- वही वीर सावरकर। विश्व प्रेम की तरंग में आकर घास पर चलते-चलते रुक जाते कि कोमल घास पैरों तले मसली जायेगीÓÓ। इस लेख में वीर सावरकर के लिए जिस प्रकार का भाव सरदार भगत सिंह का है, उसको पढ़कर शायद ही सावरकर के अपमान के लिए आतुर बुद्धिजीवियों को शर्म आए। एक और बात स्पष्ट समझ लीजिए कि भगत सिंह, सावरकर को ‘वीरÓ उस समय संबोधित कर रहे हैं, जब इन बुद्धिजीवियों के अनुसार सावरकर अंग्रेजों से ‘माफीÓ माँग कर रत्नागिरी में अंग्रेजों का सहयोग कर रहे हैं। याद रखें, उस समय वीर सावरकर पर अंग्रेजों ने कड़ी नजरबंदी कर रखी थी। उन्हें रत्नागिरी से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी। इसी तरह कर्जन वायली को मौत के घाट उतारने वाले क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा और स्वातंत्र्यवीर सावरकर के संबंध में लिखते समय भगत सिंह ने उन्हें ऊंचा, पवित्र और पूजनीय बताया है।

अकसर यह भी प्रोपेगंडा किया जाता है कि भगत सिंह के लिए सावरकर ने एक शब्द भी नहीं लिखा या बोला? परंतु यह सच नहीं है। सावरकर विरोधियों की तरह ऐसा प्रश्न अंग्रेजों के मन में कतई नहीं था। अंग्रेजों को पूरा विश्वास था कि क्रांतिकारी अवश्य ही भगत सिंह की फांसी पर प्रतिक्रिया देंगे। उस समय सरकार ने पुलिस को यह जानने के लिए रत्नागिरी भेजा कि सावरकर कुछ करने का प्रयास तो नहीं कर रहे। रत्नागिरि में वीर सावरकर के घर पर हमेशा भगवा झंडा फहराया जाता था। लेकिन भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान के अगले दिन उनके घर पर काला झंडा लहरा रहा था। जब पुलिसवाले सावरकर के घर की तलाशी ले रहे थे तब वीर सावरकर ने वही नोटबुक/राइटिंग पैड उन्हें पकड़ा दिया, जिस पर उन्होंने भगत सिंह की फांसी के बाद एक लेख और यशस्वी क्रांतिकारी की शान में एक कविता लिख रखी थी। लेकिन पुलिसवाले यह देख नहीं पाए। तीनों क्रांतिकारियों की फांसी पर सावरकर को जो पीड़ा हुई, उसकी अनुभूति उनकी लिखी कविता में की जा सकती है। उस कविता को पढ़कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं-

हा, भगत सिंह, हाय हा!
चढ़ गया फांसी पर तू वीर हमारे लिये हाय हा!
राजगुरु तू, हाय हा!
वीर कुमार, राष्ट्रसमर में हुआ शहीद
हाय हा! जय जय हा!

तुलना करने वाले यह भी कहते हैं कि भगत सिंह फांसी से डरे नहीं जबकि सावरकर माफी माँगकर जेल से बाहर आ गए। यह इतनी अतार्किक तुलना है कि इस एक तुलना से ही उनके बौद्धिक दिवालिएपन का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह स्पष्ट तौर पर समझ लेना चाहिए कि सरदार भगत सिंह जब असम्बली में बम फेंकने जा रहे थे, उन्होंने तब ही अपने लिए फांसी का फंदा तय कर लिया था। वे अपनी फांसी से क्रांति की लौ भड़काना चाहते थे। इसलिए अवसर के बाद भी वे भागे नहीं, अंग्रेजों की पकड़ में जानबूझकर आए। जबकि वीर सावरकर क्रांतिकारी होने के साथ ही बैरिस्टर की शिक्षा प्राप्त व्यक्ति थे। उन्होंने चतुरायी से उस समय जेल से बाहर आने के लिए कानूनी विकल्प का उपयोग लिया। वीर सावरकर को यह सुझाव स्वयं महात्मा गांधी ने भी दिया था। गांधी ने इस संबंध में अपने समाचारपत्र ‘यंग इंडियाÓ में बार-बार लिखा है।

महापुरुषों को एक-दूसरे के बरक्स खड़ा करने का प्रयास करने वाले कुटिल लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत के लोग अब पहले से अधिक जागरूक हैं। वे अपने महापुरुषों को इस तरह के संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं देखते हैं। उनके लिए स्वातंत्र्यवीर सावरकर और सरदार भगत सिंह, दोनों ही भारत माता के सच्चे बेटे हैं। सपूत हैं। जिन्होंने अपना जीवन भारत की स्वतंत्रता एवं उसको सामथ्र्यशाली बनाने के लिए समर्पित कर दिया था।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।)

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