Home लेख वीर सावरकर: स्वातंत्र्य समर का एक उपेक्षित नायक

वीर सावरकर: स्वातंत्र्य समर का एक उपेक्षित नायक

95
0

संजय द्विवेदी

स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर की पूरी जिंदगी रचना, सृजन और संघर्ष का उदाहरण है। आजादी के आंदोलन के वे अप्रतिम नायक हैं। उनकी प्रतिभा के इतने कोण हैं कि किसी एक पक्ष का भी अभी ठीक से मूल्यांकन होना शेष है। वे क्रांतिकारी, सामाजिक चिंतक, समाज सुधारक,इतिहासकार, उपन्यासकार, कवि, राजनेता एवं संगठनकर्ता हैं। सावरकर भारतीय स्वातंत्र्य समर के प्रथम क्रांतिकारी हैं, जिन्हें दो बार काला पानी सजा सुनाई गई। सावरकर पर अंग्रेज अफसर की हत्या की साजिश रचने और भारत में क्रांति की पुस्तकें भेजने के दो अभियोगों में 25-25 वर्ष मतलब कुल मिलाकर 50 वर्ष की सजा सुनाई गयी थी। 4 जुलाई 1911 को अंडमान-निकोबार की सेल्लुलर जेल में भेज दिया गया। इसी जेल में उनके बड़े भाई गणेश भी थे, किंतु कड़े नियमों के कारण दो साल तक दोनों भाई आपस में मिल भी नहीं सके। उनके व्यक्तित्व का गलत आकलन और उनकी मृत्यु के इतने सालों बाद भी उनका उपहास उड़ाने वालों की एक लंबी सूची है। किंतु काला पानी की भयंकरता का अनुमान उनके आलोचकों को नहीं है। यदि होता तो वे स्वातंत्र्यवीर सावरकर की पूजा करते, आलोचना नहीं। काला पानी की विभीषिका,यातना और त्रासदी किसी नरक से कम नहीं है। सावरकर ने न सिर्फ इसे भोगा बल्कि उन्होंने इस अनुभव से ‘काला पानीÓ नामक एक उपन्यास भी लिखा। यह उपन्यास अंडमान की जेल में बंद सश्रम कारावास काट रहे बंदियों के ऊपर हो रहे अत्याचारों, क्रूरतापूर्ण व्यवहार के बारे में त्रासद वर्णन करता है।


वीर सावरकर का जन्म 28, मई,1883 में महाराष्ट्र के नासिक जिले ग्राम भगूर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई और 1905 में उन्होंने बीए पास किया। वे 9 जून,1906 को इंग्लैंड के चले जाते हैं और इंडिया हाउस, लंदन में रहते हुए क्रांतिकारी गतिविधियो के साथ लेखन कार्य में जुट जाते हैं। इंडिया हाउस उन दिनों राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र था, जिसे पंडित श्यामजी चला रहे थे। सावरकर ने ‘फ्री- इंडियाÓ सोसाइटी का निर्माण किया, जिससे वो अपने साथी भारतीय छात्रों को स्वतंत्रता के लिए लडऩे को प्रेरित करते थे। उनकी एक लेखक के तौर पर यहीं से पहचान बननी प्रारंभ हुई। 1907 में आपने ‘1857 का स्वातंत्र्य समरÓ नामक पुस्तक लिखनी प्रारंभ की। उनके मन में आजादी की अलख जल रही थी। वे ऐसे पहले भारतीय भी हैं, जिन पर हेग की अंतरराष्ट्रीय अदालत में मुकदमा भी चला। अपने जीवनकाल में संघर्षों के बाद भी उन्होंने विपुल लेखन किया। उनकी प्रमुख किताबों में- कमला, गोमांतक,मोपलों का विद्रोह,मेरा आजीवन कारावास, वरहोच्छवास, हिंदुत्व, हिंदु पदपादशाही, 1857 का स्वातंत्र्य समर, उ: श्राप, उत्तरक्रिया, संन्यस्त खड्ग आदि हैं।

30 जनवरी, 1948 को गांधीजी की हत्या के बाद नाथूराम गोडसे के बाद सावरकर जी को भी गिरफ्तार किया था, क्योंकि गोडसे भी हिन्दू महासभा का कार्यकर्ता था, जिसके सावरकर 1943 तक अध्यक्ष रह चुके थे। हत्या की साजिश में शामिल होने का उन पर भी आरोप लगाया गया। हालांकि नाथूराम गोडसे ने हत्या की योजना के लिए खुद को ही जिम्मेदार बताया। बाद में आरोप मुक्त करते हुए सावरकर को रिहा कर दिया गया। वरिष्ठ पत्रकार श्री राम बहादुर राय ने एक साक्षात्कार में कहा है कि, ‘दरअसल उन पर आखऱिी दिनों में जो कलंक लगा है, उसने सावरकर की विरासत पर अंधकार का बादल डाल दिया है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण मिले जो क्राँतिकारी कवि भी हो, साहित्यकार भी हो और अच्छा लेखक भी हो। अंडमान की जेल में रहते हुए पत्थर के टुकड़ों को कलम बना कर जिसने 6000 कविताएं दीवार पर लिखीं और उनकी कंठस्थ किया।

यही नहीं पाँच मौलिक पुस्तकें वीर सावरकर के खाते में हैं, लेकिन इसके बावजूद जब सावरकर का नाम महात्मा गांधी की हत्या के आरोप से जुड़ जाता है, सावरकर समाप्त हो जाते हैं और उनकी राजनीतिक विचारधारा वहीं सूख भी जाती है।Ó देखा जाए तो सावरकर अकेले ऐसे नहीं हैं, जिन्हें इतिहास में उपेक्षा मिली। ऐसे अनेक क्रांतिवीर हैं जो अंग्रेजों के विरूद्ध लड़े,किंतु स्वतंत्र भारत की बदली राजनीति ने उन्हें अप्रासंगिक कर दिया। खासकर ऐसे क्रांतिकारी जो गरम दल से जुड़े थे। बावजूद इसके इससे सावरकर का संघर्ष और त्याग कहीं से कम नहीं होता। कई बार उनकी भगत सिंह से तुलना की जाती है कि आखिर भगत सिंह ने माफी क्यों नहीं मांगी। सच तो यह है कि भगत सिंह अपने इरादों का ऐलान कर चुके थे और उन्हें बम धमाके के बाद फांसी के फंदे पर जाना स्वीकार था। सावरकर यहां अपने माफीनामे को रणनीति की तरह इस्तेमाल करते हैं।

वे शायद यह मानते रहे होगें कि यहां से निकलकर वे देश के लिए कुछ कर पाएं। श्री रामबहादुर राय उन्हें अपने इसी इंटरव्यू में सावरकर को एक ‘चतुर क्रांतिकारीÓ की संज्ञा देते हैं। राय कहते हैं- ‘उनकी कोशिश रहती थी कि भूमिगत रह करके उन्हें काम करने का जितना मौका मिले, उतना अच्छा है। सावरकर इस पचड़े में नहीं पड़े की उनके माफी मांगने पर लोग क्या कहेंगे। उनकी सोच ये थी कि अगर वो जेल के बाहर रहेंगे तो वो जो करना चाहेंगे, वो कर सकेंगे।
(लेखक : भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं)

Previous articleएक ध्येय के सूत्र से बंधे थे वीर सावरकर और भगत सिंह
Next articleहे भारत, मैं सावरकर बोल रहा हूँ

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here