Home लेख वीर दुर्गादास जयंती : माई एहों पूत जण जेंहो दुर्गादास

वीर दुर्गादास जयंती : माई एहों पूत जण जेंहो दुर्गादास

85
0

प्रवीण गुगनानी, वरिष्ठ पत्रकार
guni.pra@gmail.com

भारतीय इतिहास में वीर शिरोमणि दुर्गादास के नाम को कभी परिचय की आवश्यकता नहीं रही। मारवाड़ के इस वीरपुत्र और मातृभूमि पर अपने सम्पूर्ण जीवन को न्यौछावर कर देने वाले जुझारू यौद्धा को केवल मारवाड़ की धरती और सम्पूर्ण देश में फैले राठौर बंधू ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिंदू समाज और इस राष्ट्र का कण कण उन्हें याद करके धन्य हो उठता है। आज उनके जन्मदिवस पर पूरा देश और विशेषत: मारवाड़ की धरती इस महान यौद्धा को कृतज्ञतापूर्वक याद करके उसे नमन करती है।

आज भी मारवाड़ के गाँवों में बड़े-बूढ़े लोग बहू-बेटी को आशीर्वाद स्वरूप यही दो शब्द कहते हैं और वीर दुर्गादास को याद करते है कि ‘माई ऐहा पूत जण जेहा दुर्गादास, बांध मरुधरा राखियो बिन खंभा आकाश अर्थात् हे माता! तू वीर दुर्गादास जैसे पुत्र को जन्म दे जिसने मरुधरा (मारवाड़) को बिना किसी आधार के संगठन सूत्र में बांध कर रखा था। दुर्गादास को वीर दुर्गादास बनाने का श्रेय उसकी माँ मंगलावती को ही जाता है जिसने जन्मघुट्टी देते समय ही दुर्गादास को यह सीख दी थी कि ‘बेटा, मेरे धवल (उज्ज्वल सफेद) दूध पर कभी कायरता का काला दाग मत लगाना।

मुगलों के दमनकारी कालखंड में जब 13 अगस्त 1638 को जोधपुर रियासत के सालवा कला में वीर दुर्गादास का जन्म हुआ। उस समय समृद्ध,संपन्न, और विशाल धनाड्य राज्य मारवाड़ का कोई स्वामी, सामंत या सेनापति नहीं था। चारों ओर औरंगजेब के कुटिल विश्वासघात की भेंट चढा समाज त्राहि त्राहि कर रहा था जनता कठोर दमन चक्र में फंसी थी। सर्वत्र आतंक लूट-खसोट, हिंसा और भय की विकराल काली घटा छाई थी। उस समय मारवाड़ ही नहीं पूरा भारत मुगल आक्रान्ताओं के अत्याचार, शोषण, दमन,जबरन धर्मांतरण, धर्म स्थलों ऊपर हमले और उनके खजानों को लूटने की घटनाओं को सहन कर कर के घोर आर्तनाद कर रहा था।

भारत माता के छलनी आँचल की संकटमय स्थिति में वीर दुर्गादास राठौर के पौरुष और पराक्रम की आंधी चली। इस वीर की चमकती तलवार और अनथक परिश्रम का परिणाम था कि मारवाड़ आजाद हुआ और खुले आकाश में सुख की सांस लेने लगा। दुर्गादास एक ऐसे देशभक्त का नाम है जिनका जन्म से मृत्यु पर्यंत संघर्ष का जीवन रहा। इस बालक की कहानी ऐसे कठोर तप और कर्मयुद्ध की श्रेष्ठ कहानी है जो शिशु दुर्गादास व उसकी माँ को घर से निकालने से शुरू होती है।

जन्म से ही माँ के हाथ से निडरता की घुट्टी पीने वाला दुर्गादास अपनी इस जन्मजात निडरता के कारण ही महाराजा जसवंत सिंह का प्रमुख अंगरक्षक बन गया था और यही अंगरक्षक आगे चलकर उस समय संपूर्ण मारवाड़ का रक्षक बन गया था जब जोधपुर के महाराज जसवंत सिंह के इकलौते पुत्र पृथ्वीसिंह को औरंगजेब ने षड्यंत्र रचकर जहरीली पोशाक पहनाकर मार डाला। इस आघात को जसवंत सिंह नहीं सह सके और स्वयं भी मृत्यु को प्राप्त हो गए थे।

वीर शिरोमणि दुर्गादास कहीं के राजा या महाराजा नहीं थे परंतु उनके चरित्र की महानता इतनी ऊंची उठ गई थी कि वह अनेक पृथ्वीपालों, प्रजापतियों, राजों, महाराजोंऔर सम्राटों से भी ऊंचे हो गये और उनका यश तो स्वयं उनसे भी ऊंचा होकर अजर अमर गाथा बन गया है। आज उनकी जयंती के अवसर पर उन्हें सादर नमन,प्रणाम और कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से पुण्य स्मरण।

Previous articleराष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 : शिक्षा के नए युग की शुरुआत
Next articleनया जम्मू-कश्मीर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here