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वेद: अध्यात्म, कर्म और कर्तव्य

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वेदों में भी विभिन्न प्रकार के साहित्य हैं, जैसे ऋग्वेद में मुख्य रूप से भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान है,यजुर्वेद में कर्म, कर्तव्यों और जिम्मेदारी का वर्णन है,साम वेद में ललित कला सम्बंधित प्रार्थना और टिप्पणी शामिल है, और अथर्ववेद में अंकगणित, भूविज्ञान, जीवन विज्ञान, भौतिक विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान शामिल हैं।

प्रो. हिमाँशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

भारतीय अध्यात्म दर्शनकी स्व-उत्पत्ति नहीं हुई अपितु यह वैदिक शास्त्रों पर आधारित है और विभिन्न चरणों के माध्यम से प्रकट हुआ है। इसके प्राथमिक ग्रंथ -वेद, मूल शब्द ‘विद्’ से बने हैं जिसका अर्थ है ज्ञान, और भारतीय अध्यात्म दर्शन के अनुसार ये समय के प्रारंभ से ही अलिखित, शाश्वत और परिपूर्ण रूप में उपलब्ध हैं। यद्यपि वेदों में भी विभिन्न प्रकार के साहित्य हैं, जैसे ऋग्वेद में मुख्य रूप से भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान है,यजुर्वेद में कर्म, कर्तव्यों और जिम्मेदारी का वर्णन है,साम वेद में ललित कला सम्बंधित प्रार्थना और टिप्पणी शामिल है, और अथर्ववेद में अंकगणित, भूविज्ञान, जीवन विज्ञान, भौतिक विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान शामिल हैं।

पूर्व के अध्ययन संभवत: अनुवादों और व्याख्याओं में अर्थ बदलने के कारण वैदिक साहित्य में अंतर्निहित अवधारणा को समझने में असफल रहा हैं। स्पष्ट है कि वे मुख्य रूप से भौतिकशास्त्री वेबर के कार्य से प्रेरित हैं, और मूलत: शास्त्रों से पूर्व में दो बार अनुवाद करने के कारण उसका मूल अर्थ विकृत हो गया है । उदाहरण के लिए,फ्रांसिस बेनियन का तर्क है कि ‘वेद उनमें लिखित किसी भी जानकारी का कोई विचार व्यक्त नहीं करते … वास्तव में इनमें मनुष्य या ईश्वर से संबंधित कुछ भी नहीं है। यह विशेष रूप से धर्म (अनुष्ठान कर्तव्यों) की निंदा करते हैं’ (1992-51)।

वास्तव में यजुर्वेद के कई स्त्रोत्रों में से एक निम्नलिखित, मनुष्य की ईश्वर से प्रार्थना का वर्णन है:
‘विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।
यद् भद्रं तन्न आसुव।।Ó(यजुर्वेद: 30/3)
अर्थात: हे सकल जगत के निर्माता, समग्र ऐश्वर्य के मालिक, सुखों और सौभाग्य के दाता और ज्ञान के प्रकाशक हमारे सम्पूर्ण दुर्गुणों, दुव्यसनों और दु:खों के कारणों को दूर कीजिए, और जो कल्याण कारक गुण, कर्म, स्वभाव और सुख हैं, वे हमें प्राप्त कराइए।

इसके अतिरिक्त, यजुर्वेद राजा/समुदाय/संगठन के प्रमुख या अग्रणी के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को इस प्रकार वर्णित करता है:
‘नमो विन्याय च कक्ष्याय च नम: श्रव्याय च प्रति श्रव्याय च नम:।
आशुषेनाय चशुर्थाय च नम: शूरायचवभेदिने च।।Ó (यजुर्वेद: 16/34)
एक राजा अथवा प्रमुख या अग्रणी को विशेष रूप से शिक्षकों, विद्वानों, सेना के अधिकारियों और राजनयिकों पर अधिक धन, सुविधा और लाभ देना चाहिए, ताकि उन्हें बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित किया जा सके।

यहां स्पष्ट है कि शास्त्र और वेद स्पष्ट रूप से न केवल विभिन्न पदों पर आसीन लोगों के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों की जानकारी देते हैं बल्कि सर्वशक्तिमान के समक्ष आत्मसमर्पण कर उनके आशीर्वाद के लिए प्रार्थना भी करते हैं। इसी प्रकार,वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति को समझने में भी बेनियन से चूक हुई है। जैसे ‘व्रतं इति कर्मणां व्रणोति इति सत: वर्णो व्रणोत:’ (निरुक्त: 2/3) (गुण और कर्म एक व्यक्ति का वर्ण निर्धारित करते हैं),’चतुर्वर्ण मया सृष्टं गुण कर्म विभागश:’ (गीता: 4/13) (गुण और कर्म चार वर्णों का निर्धारण करते हैं), और ‘आचार्य तवस्य यम जाति मुतपादयति सावित्रय:’ (मनुस्मृति: 2/148) (गुणों, शिक्षा और कार्यों के आधार पर, शिक्षक स्नातक के दौरान छात्रों का वर्ण निर्धारित करता है) जैसे उदाहरण स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि दर्शन शास्त्रों द्वारा निर्धारित वर्ण व्यवस्था व्यक्ति के गुणों पर आधारित थी, न कि एक ही वर्ण (जिसे अभी विकृत स्वरुप में जाति बोला जाता है ) के किसी व्यक्ति से जन्म लेने से तय होती थी।
प्रो. हिमाँशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

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