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शौर्य और पराक्रम की बेमिसाल वीरांगना

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  • बलिदान दिवस : रानी दुर्गावती
  • शिरोमणि दुबे

भारत इसलिए महान नहीं है कि वह दुनिया का सबसे प्राचीन लोकतंत्र है। यह इसलिए भी बड़ा नहीं है कि यहां आकाश की ऊंचाई को छूने वाला हिमालय है। दुनिया में हमारी पहचान इसलिए नहीं होती क्योंकि यहां अतल गहराई वाला सागर है। विश्व में हमारा वजूद इसलिए कायम नहीं है कि हस्तिनापुर को बचाने के लिए यशोदा नंदन अपनी शपथ-सौगंध को भी तोड़ देते हैं। हम विश्व गुरु इसलिए नहीं थे क्योंकि तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी, काशी जैसे गुरुकुल हमारे पास थे।

हम विश्व पटल पर अपनी चमक-हनक को कायम रख सके इसलिए क्योंकि भारत माता की कोख से ऐसे असंख्य वीरों-अनगिनत वीरांगनाओं ने जन्म लिया जो अपनी जीवन-जवानी को ठोकर मार कर राष्ट्र की अस्मिता की हिफाजत के लिए स्वदेश-स्वाभिमान की रक्षा के लिए श्वेद-रक्त की अंतिम बूंद तक लड़ते रहे-खपते रहे। संधियों का विषैला-कसैला राग और समझौतों का पलायन-पतझङ गान जिन्हें कभी लुभा नहीं सका। उनके जीवन का बस एक ही राग था देशराग-दधीचि राग। उनके जीवन का पूरा कथानक पुरुषार्थ-पराक्रम का पर्याय बन गया। राष्ट्र के समक्ष उत्पन्न हर विपत्ति-बाधाओं पर विजय के लिए अंत:पुर की मखमली शेजों की सलवटें जिसे ना कभी डिगा सकी न डरा सकीं। उन्होंने जीवन को नई परिभाषा दी-

आंसू पोंछे नहीं किसी के
भला किसी का नहीं किया है।
उसने स्वांस किए हैं पूरे केवल
सच्चा जीवन नहीं जिया है।।

मित्रो, हम एक गीत गुनगुनाते हैं भूमि यह महान है निराली इसकी शान है। इसकी जय पताका ही स्वयं विजय निशान है। रा्रष्ट की विजय वैजयंती वयार से नहीं लहराया करती। यह तो वीरों-वीरांगनाओं की राष्ट्र बंदना के लिए निकलने वाली हर श्वांस-निश्वास से फहराती है। हमारे देश का इतिहास नारियों के त्याग-तेज-तपस्या की अनंत-अविराम जीवन प्रसंगों से भरा पड़ा है। इन्हीं कुछ विरल-विलक्षण नायिकाओं में एक नाम है रानी दुर्गावती। हालांकि भारत के सपूतों और महान नारियों की वीर गाथाएं इतिहास के पन्नों में गलीज इरादों के कारण जरूर गुमनाम बनी रहीं। परंतु संपूर्ण देश की पलकें रानी की शहादत पर गीली हो जाती हैं।

जबलपुर क्षेत्र में स्थित गढ़ा मंडला की धर्मवती-कर्मवती-रणवती-बलवती रणगति प्राप्त करने वाली रानी दुर्गावती की 457वें बलिदान पर्व पर देश उन्हें श्रद्धा पूर्वक याद कर रहा है। क्या आप जानते हैं कि रानी दुर्गावती का देश के लिए किए गए प्राणोंत्सर्ग को ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा क्यों नहीं बनने दिया गया। देश की युवानी-जवानी को रानी के शौर्य-पराक्रम का पाठ न पढ़ाया गया और न बताया गया। इसका कारण था कि रानी ने मुगलिया सल्तनत को तीन-तीन बार समरांगण में न केवल पराजित किया था बल्कि हजारों मुगल सैनिकों के मुंड उतार कर लाशों के ढेर लगा दिए थे।

मालवांचल क्षेत्र हमेशा से समृद्ध और संपन्न क्षेत्र रहा है। एक बार वहां का सूबेदार स्त्री लोलुपबाज बहादुर रानी दुर्गावती की संपत्ति पर आंख गड़ा बैठा। पहली ही मुठभेड़ में रानी ने बाज बहादुर के छक्के छुड़ा दिए। उसका चाचा फतेह बहादुर समर में खेत रहा। इतने पर भी बाज बहादुर की छाती ठंडी नहीं हुई और जब दोबारा उसने गोंडवाना पर हमला किया तो रानी मां ने कटंगी घाटी में उसकी सेना को इतना रौंदा उसकी पूरी सेना का सफाया हो गया। बाद में दिल्ली के बादशाह अकबर ने भी गोंडवाना को हड़पने का प्रयास किया। उसका रिश्तेदार आसफ खान भारी लाव लश्कर के साथ गोंडवाना की ओर बढऩे लगा। रानी पहले से ही सतर्क थी। भीषण युद्ध हुआ। रानी को कई मोर्चों पर भारी विजय मिली और इस युद्ध में आसफ खान पराजित होकर भाग गया। परंतु अगली बार दुगनी ताकत से उसने गोंडवाना पर हमला बोल दिया।

परंतु इस बार रानी के पुराने शत्रु रेवतीगढ़ के सुधार सिंह ने गोंडवाना के साथ गद्दारी की। उसने रानी के खास सेवक बदन सिंह को मुगल सेना में सिपहसालार की पदवी का लालच देकर तोड़ लिया। कौम के गद्दार बदन सिंह ने किले की गुप्त सुरंग का अंदर का दरवाजा खोल दिया। मुगल सेना धड़धडाती हुई किले में प्रवेश कर गई। मुगल सेना के इस अचानक हमले का उत्तर देने के लिए रानी की सेना बिल्कुल तैयार नहीं थी। फिर भी उसके सैनिक हथियार संभाल कर दुश्मनों पर पिल पड़े। पुरुष वेश में रानी को भीषण युद्ध करते देखकर दुश्मन सेना के छक्के छूट गए। इस बार भी रानी की सेना बड़ी बहादुरी से लड़ी और 3000 मुगल सैनिकों को युद्ध के मैदान में ढेर कर दिया। मुगल सैनिक जान बचाकर इधर-उधर भाग रहे थे।

अगले दिन 24 जून 1564 को फिर घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में वीर नारायण घायल हो गए। उन्हें रणक्षेत्र से दूर चौरागढ़ भेज दिया गया। रानी हाथी पर बैठकर लड़ रही थीं। तभी रानी की कनपटी में तीर धस गया। रानी मां को खून बहता देख कर गनू महावत विचलित हो गया। रानी ने कहा गनु यह खून तो वीरांगनाओं का आभूषण है। मुगल सेना से चारों ओर से खुद को घिरा हुआ देखकर रानी स्वयं की कटार सीने में भोंपकर आत्म बलिदान के पथ पर बढ़ गईं। वफादार गनू ने भी उसी क्षण रानी मां के साथ ही कटार से अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।

इतिहास गवाह है जहां रानी दुर्गावती के साथ अपने प्राण त्यागने वाले महावत गनू जैसे वफादार थे वही पदवी के लिए बिकने वाले बदन सिंह जैसे गद्दार भी थे। जानते हो अकबर ने उसे क्या इनाम दिया था। काला मुंह करके गधे पर बैठाकर सारे शहर में घुमाया गया और तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया गया। बदन सिंह को अपने किए की सजा मिल गई परंतु रानी दुर्गावती अपनी आन-बान और देश की शान के लिए मर मिटी। आज भी रानी की शहादत पर गोंडवाना में यह गीत गाए जाते हैं-
चंदेलों की बेटी थी वह गोंडवाना की रानी थी।
चंडी थी रणचंडी थी वह दुर्गावती भवानी थी।


(लेखक विद्याभारती मध्यभारत प्रांत के सचिव हैं।)

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