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अनुभवों से परिपूर्ण ब्रह्माण्ड

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  • प्रो. हिमांशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

जैसा कि मैंने पिछले सप्ताह अपने आलेख में उल्लेख किया था,’विराट का पात्रों और रूपों में वर्णन करना केवल सार्वभौमिक प्रकृति की स्पष्ट समझ को सुविधाजनक बनाने के लिए है, जिसे एक व्यक्ति अपने सीमित ज्ञान मात्र से नहीं समझ सकता है। मुंडक उपनिषद में विराट का वर्णन इस प्रकार किया गया है : उसकी बोली वेद है, जो ज्ञान से परिपूर्ण है; सर्व-व्याप्त वायु उसकी उर्जा है; सम्पूर्ण ब्रह्मांड उसका हृदय है। विराट के रूप का वर्णन इस सार्वलौकिक, सर्वोच्च शक्ति की सर्व-समावेशी प्रकृति का एक रूपक चित्रण है।

इस विवरण में सभी उद्देश्य और अवस्थाएं सभी प्रकार अनुभवों के साथ एकीकृत होती हैं, जिससे द्वैत का खंडन होता है। गौरतलब है कि इस सम्पूर्ण अनुभव को लोग केवल उसी रूप में समझते हैं जिस तरह से इसे उनके सामने प्रस्तुत किया जाता है। जैसे,बिना किसी विशेष लक्षण वाले सार्वजनीन कंपन को कानों से ध्वनि,त्वचा से स्पर्श, आँखोंसे रूप, जिह्वा से स्वाद और नाक से गंध के रूप में अनुभव किया जा सकता है। उसी सार्वभौमिक कंपन को प्राणियों द्वारा उष्णता और शीतलता, भूख और प्यास के रूप में व्यक्तिपरक रूप से महसूस किया जाता है।

संपूर्ण ब्रह्मांड आदर्श प्रकृति का है, और इसकी यह आदर्श प्रकृति की उत्पत्ति और इसका सम्बन्ध, विषय-वस्तु पर आधारित होती है। व्यक्तिगत तौर पर, सभी अनुभवों को अंतरमन के रूपों की अभिव्यक्तियों या हावभाव के रूप में समझाया गया है। परिणामस्वरूप, किसी व्यक्ति (कर्ता) का अनुभव उसके उद्देश्य या परिस्थिति (वस्तु एवं कर्म) सेपरस्पर संबंधों का परिणाम है। यहाँ मौलिक प्रश्न यह है कि इस सब में चेतना कहाँ है और उसका क्या महत्त्व है।

यदि यह कर्म से संबंधित है, तो इसका अर्थ है कि एक सचेत प्राणी (कर्ता) एक अचेतन तत्व (कर्म)को जानने और समझने में सक्षम है। दूसरी ओर, यदि चेतना कर्म से संबंधित है, तोकर्ता उस कर्म, उस तत्व द्वारा नियंत्रित होगा। यदि कर्ता पूरी तरह से कर्म पर निर्भर है,तो उस कर्म का पूर्ण ज्ञान होना असंभव है । और यदि पूर्ण ज्ञान की संभावना है भी, तो इसका ज्ञान कर्ममें ही निहित होना चाहिए। इस प्रकार, अनुभव अनिवार्य रूप से असीमित है और अनुभवों में भिन्नतामात्र अलग-अलग चरणों हैं,जो भिन्न व्यक्तिगत प्रकृति के रूपों में मौजूद हैं और जो स्वयं के द्वारा निरपेक्ष के ज्ञान को प्राप्त करने के विभिन्न तरीके हैं। ‘अनुभव के ब्रह्मांड के रूप में मौजूद विराट की व्याख्या का यही संक्षिप्त अर्थ है।

विराट अपनी इच्छा से सब कुछ उत्पन्न कर सकता है : एक ऐसा दिव्य और स्वर्गीय क्षेत्र, जो सूर्य, चंद्रमा, वर्षा और पृथ्वी पर सभी वनस्पतियों से प्रकाशित होता है। पृथ्वी भोजन उत्पन्न करती है; भोजन से ऊर्जा जन्म लेती है और ऊर्जा से ही सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है। विराट विभिन्न प्रकार के अनुभवों को जन्म देते हुए अपनी-अपनी वस्तुओं एवं कर्म से जुड़े ज्ञान के विभिन्न रूपों के साथ, विभिन्न इंद्रियों के कार्यों को निर्धारित करता है।

वह अलग-अलग व्यक्तियों के संघटन के अनुसार, प्राणों द्वारा क्रियान्वित कार्यात्मक अंगों के विभिन्न बीजों के सतीत्व का कारण बनता है। पौधे और भोजन के विभिन्न स्वाद – सभी इस ब्रह्मांड के विभिन्न भागों का निर्माण करते हैं जिसमें सार्वभौमिक शक्ति या विराट-पुरुष निवास करते हैं। जो इन्द्रिय बोध की सीमाओं से परे जाकर इसे जानता है, वही अज्ञान से उभर पाता है और ज्ञान की दिशा में अग्रसर होता है।

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