उद्देश्य और आकांक्षा में समझें भिन्नता

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  • प्रो. हिमांशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

अज्ञानता के कारण बहुत से लोग अहंकारी हो जाते हैं। उन्हें भ्रम होता है कि उन्होंने जीवन में अपने उद्देश्य को प्राप्त कर लिया है। हालाँकि सत्य तो यह है, कि उन्होंने जो भी हासिल किया है वह मात्र उनकी इच्छाओं, लालसा और आकाँक्षाओं की पूर्ति का प्रतीक है। हमें जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझने में परेशानी होती है। अक्सर, लोग अपने लक्ष्य को ही अपना उद्देश्य मान लेते हैं। शायद इसीलिए,गंतव्य, यात्रा और गंतव्य के बीच का अंतर समझने में भी चूक हो जाती है। इच्छा से प्रेरित कार्य, चाहे वे अच्छे हों या बुरे, भौतिक परिणामों को जन्म देते हैं जो अंतत: समाप्त या नष्ट हो जाते हैं, और इसलिए कभी स्थायी सुख भी नहीं दे सकते। हालांकि, अज्ञानी लोगों को लगता है कि वे बुद्धिमान हैं, क्योंकि उनकी चेतना उनके विचारों के माध्यम से परिलक्षित होती है।

इसके साथ ही,कर्मों के फल से प्राप्त हुई खुशी वास्तविक नहीं है, बल्कि केवल एक अस्थायी उत्तेजना है, जो उस वस्तु के वांछित संपर्क के कारण होती है।इससे हमें भ्रम होता है कि इस वस्तु को प्राप्त करने से निश्चित ही सच्चाआनंदमिल सकेगा। यह अधूरी, खोखली सी प्रसन्नता मात्र मिथ्या है, जो नकली उपलब्धि की भावना से आती है। उपलब्धि के विषय में समान भावना वाले लोगों का अनुमोदन और प्रोत्साहन इन्हें और अधिकपुष्टि तो देता है, लेकिन ह्रदय में उसके पश्चात भी अधूरापन महसूस होता है। इस प्रकार, यह वास्तविक सुख का अनुभव नहीं, अपितु यथार्थता है।

इसके अतिरिक्त, चूंकि एक जन्म में सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करना सदैव संभव नहीं हो सकता है, इसलिए व्यक्ति को उन्हें पूरा करने के लिए कई और जन्म लेने पड़ सकते हैं– और यह एक बंधन सिद्ध हो सकता है। यह अज्ञान और भ्रम ही है जो एक व्यक्ति को यह विश्वास दिलाता है कि बुद्धि, मन और इंद्रियों के माध्यम से परम आनंद का अनुभव किया जा सकता है। सत्य का अर्थ बेहद गहरा है और उसकी प्राप्ति और भी अधिक गहन विचारों के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है -जो बुद्धि से परे है। वास्तविक आनंद और मुक्ति ब्रह्म के ज्ञान से ही आती है। हालाँकि, यह समझना आवश्यक है, कि जो कुछ उत्पन्न या निर्मित नहीं हुआ है, उसे पूर्व में उत्पन्न या निर्मित वस्तु के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

सभी प्रभाव या वस्तुएंमात्र परिवर्तन, संशोधन या किसी क्रिया के माध्यम से ही किसी अन्य वस्तु या तत्व से संबंधित हो सकते हैं। इसलिए, आत्म-रूपांतरण सच्चा ज्ञान प्राप्त करने का तरीका नहीं है, क्योंकि परिवर्तन प्रकृति में क्षणभंगुर है और इससे प्रभावित ज्ञान भी क्षणमात्र का ही होगा। एक साधक या अन्वेषक, जिस उच्चतम आनंद की तलाश करता है, वह मात्र अपरिवर्तनीय शाश्वत शक्ति या आत्मा के अस्तित्व में ही पाया जाता है। वह सभी अनादि स्वरूपों और चिरकालिक अस्तित्व के बीच के अंतर के प्रति सचेत होता है, और इस चेतना को विवेक कहा जाता है। ‘विवेक हमें ‘वैराग्य की ओर ले जाता है, हर उस चीज़ का परित्याग कर देता है जो शाश्वत, सार्वकालिक नहीं है, और एक शिक्षक, एक गुरु, एक मार्गदर्शक की भूमिका यहीं अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

यदि साधक विद्वान भी हों, तो भी वे एक अनुभवी शिक्षक के विवेक से प्रेरणा ले सकते हैं, सीख सकते हैं; क्योंकि उस शिक्षक का मन शांत है, और मस्तिष्क नियंत्रित। यह बुद्धिमान शिक्षक शाश्वत सत्य, ब्रह्म-विद्या का ज्ञान प्रदान कर सकता है, जिसके माध्यम से एक व्यक्ति अविनाशी, अमरत्व को जानने और समझने की क्षमता विकसित करता है। एक अच्छे शिक्षक के ज्ञान माध्यम से, इस ज्ञान को पहले शुद्ध बौद्धिक क्षमता से समझा जाता है और फिर पवित्र हृदय में, अंतर्मन में महसूस किया जाता है। विवेक और वैराग्य बुद्धि और भावना की विशेषताएं हैं, और एक बार स्पष्ट रूप से समझ लेने के बाद, ये एक ऐसे व्यक्ति के गुण बन जाती हैं, जिसने शाश्वत आत्मा, सर्वोच्च शक्ति को भी पूरी तरह समझ लिया है।

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