स्वतंत्रता संघर्ष के दो महानायक : तिलक और चंद्रशेखर आजाद

Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on pinterest
Pinterest
Share on pocket
Pocket
Share on whatsapp
WhatsApp
  • दो महान बलिदानियों की जन्मतिथि (23 जुलाई)

प्रतिदिन प्रात:कालीन सूर्य को उदित होने में करोड़ों पलोंं ंंका बलिदान होता है। प्रत्येक पल का योगदान अतुलनीय है। यदि कोई पल रुका तो सूर्यदेव की गति थम जायेगी फिर भी इन पलों में कुछ पल ऐसे होते हैं जो प्रहर की भूमिका का निर्वाह करते हैं। वे अंधकार में प्रत्येक पल को यात्रा की दिशा निर्धारित करते हैं। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में भी हम पलों के संघर्ष और प्रहर पलों के मार्गदर्शन को समझ सकते हैं। भारत को स्वतंत्रता साधारण संघर्ष से नहीं मिली है। इसके लिये लाखों करोड़ों बलिदान हुये जिनकी गणना तक नहीं है। यदि हम पुराने संघर्ष का आकलन न करें केवल 1857 और उसके बाद के संघर्ष को देखें तो इसमें ही बलिदानियों की संख्या कोई पचास लाख से ऊपर होगी। आज हम केवल उन तीन महा विभूतियों की चर्चा करेंगे जो जिनकी भूमिका प्रहर पलों के रूप में रही। उन्होंने मार्गदर्शन किया, संघर्ष को एक निश्चित दिशा दी। इन महाविभूतियोंं की स्मृति जुलाई के साथ सहज ही आ जाती है। ये हैं लोकमान्य तिलक, चन्द्रशेखर आजाद और पं श्यामा प्रसाद मुखर्जी। इनके संघर्ष की शैली अलग थी, कालखंड भी अलग-अलग, पर ध्येय एक था। वह ध्येय था-राष्ट्र की स्वतंत्रता और स्वाभिमान को प्रतिष्ठित रखना ।

  • रमेश शर्मा

लोकमान्य तिलक

लोकमान्य तिलक का नाम केशव गंगाधर था । उनकी बातें सटीक और सर्वमान्य हुआ करतीं थीं इसलिये लोकमान्य कहलाये । उन्होंने सबसे पहले नारा दिया-स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है । उनका जन्म 1856 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के गाँव चिखली में हुआ। उन्होंने पहले बीए परीक्षा उत्तीर्ण की फिर वकालत पास की । तिलक का जन्म वह कालखंड था जब देश में स्वतंत्रता के लिये एक बड़ी तैयारी हो रही थी । बचपन और शिक्षण उन परिस्थितियों में हुआ जब देश में 1857 की प्रथम सशस्त्र और संगठित क्रांति की असफलता के बाद अंग्रेजों के दमन का दौर चल रहा था।

अंग्रेज क्रांति के प्रत्येक सूत्र का क्रूरता से दमन कर रहे थे। सामूहिक दमन के इस दृश्य के बीच तिलक ने होश संभाला । यह स्वाभाविक ही था कि दमन के इन दृश्यों ने उनके मानस में स्वत्व का बोध और दासत्व की विवशता का चित्रण सशक्त हुआ था । इसीलिये बाल्यकाल से ही उनके मन में संगठन, संघर्ष और स्वत्वाधिकार की भावना प्रबल होती चली गई। उनके परिवार की पृष्ठभूमि सांस्कृतिक जुड़ाव की रही है । 1857 की क्रांति की असफलता के बाद देश में बड़ा वर्ग अंग्रेजों की शैली अपनाने की होड़ में लगा था, तिलक इस समूह को सतर्क करना चाहते थे, सो उन्होंने दक्षिण शिक्षा सोसायटी गठित की जिसमें शिक्षा तो आधुनिक शैली में थी पर उसमें भारतीय चिंतन एक प्रमुख पक्ष था । इसके साथ उन्होंने दो समाचार पत्रों का प्रकाशन आरंभ किया। एक मराठी में और एक अंग्रेजी में।

मराठी समाचार पत्र का नाम केसरी और अंग्रेजी समाचार पत्र का नाम मराठा दर्पण रखा। इन दोनों ही समाचार पत्रों में भारतीय संस्कृति की महत्ता और विदेशी शासन द्वारा दमन किये जाने का विवरण होता। वे समय के साथ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और कांग्रेस के सदस्य हो गये। लेकिन तिलक के जल्दी ही कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद हो गये । इसका कारण यह था कि तब कांग्रेस के एजेंडे में भारतीयों को सम्मानजनक अधिकार देना तो था पर अंग्रेजी सत्ता का विरोध न था । जबकि तिलक अंग्रेजों और अंग्रेजी सत्ता के एकदम विरुद्ध थे। इसका सीधा टकराव 1991 में देखने को आया । तब अंग्रेज ऐज ऑफ कंसेंट विधेयक लाये जिसमें हिन्दुओं की बेटी की शादी की आयु निर्धारित की गयी थी ।

तिलक यद्यपि बाल विवाह के पक्षधर नहीं थे पर हिन्दुओं के निजी मामले में सरकार के हस्तक्षेप के विरुद्ध थे और उनका तर्क था कि कानून केवल हिन्दुओं पर ही क्यों लागू हो रहा है, अन्य पर क्यों नहीं । तिलक ने इस विधेयक का पूरी शक्ति से विरोध किया, कांग्रेस के भीतर एक बड़ा समूह ऐसा था जो समाज में कुरीतियों के सुधार के लिये इस कानून को आवश्यक मानता था इसलिये यह कानून बन गया । लेकिन तिलक ने अपना विरोध जारी रखा। इसी विधेयक के बाद कांग्रेस में सीधे सीधे दो गुट बन गये। इनकी टकराहट का विवरण कांग्रेस के इतिहास में दर्ज है। एक समूह गरम दल और दूसरा समूह नरम दल। अपने लेखों के कारण उन पर अनेक मुकदमे बने। कई बार सजायें और जुर्माना हुआ। लेकिन 1997 में उन पर देशद्रोह का मुकदमा बना और छ: साल की कैद हुई ।

अपनी इसी जेल यात्रा में ही तिलक ने गीता रहस्य लिखा। जेल से छूटने पर उन्होंंने दो उत्सव प्रारंभ किए-गणेश उत्सव व शिवाजी उत्सव। इन उत्सवों के आयोजन से अन्य वर्गों में भी चेतना का संचार हुआ । समाज का धार्मिक भावना वाला वर्ग गणेश उत्सव से जुड़ गया तो सामाजिक चेतना वाले लोग शिवाजी उत्सव से। इन प्रयत्नों से समाज में जागृति आई और स्वाधीनता के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में मदद मिली। 1905 में यदि तिलक ने देवनागरी को सभी भारतीय भाषाओं की संपर्क भाषा बनाने का आह्वान किया तो पूरे देशभर में समर्थन मिला और जगह जगह संस्थाएं बनने लगी भाषाई आयोजन होने लगे ।

तिलक ने काँग्रेस के समर्थन और अनुशासन की परवाह किये बिना 1907 में पूर्ण स्वराज्य का नारा दिया और 1908 में सशस्त्र क्रांतिकारी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाको जैसे आंदोलनकारियों का खुलकर समर्थन किया । यही कारण था बंगाल और पंजाब के क्रांतिकारी समूह तिलक जी से जुड़ गये । तिलक जी 1916 में ऐनी बेसेन्ट द्वारा गठित होमरूल सोसायटी से जुड़े । उनका निधन 1 अगस्त 1920 को मुम्बई में हुआ । नेहरूजी ने उन्हें भारतीय क्रांति का जनक कहा था तो गांधीजी ने तिलक को आधुनिक भारत का निर्माता बताया था।

चन्द्रशेखर आजाद

चन्द्रशेखर आजाद 1906 मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के अंतर्गत ग्राम भाबरा में जन्मे थे । पिता सीताराम तिवारी और माता जगरानी देवी के परिवार ने 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों का दमन झेला था । चंद्रशेखर ने वे कहानियाँ बचपन से सुनी थीं । इस कारण उनके मन में अंग्रेजी शासन के प्रति एक विशेष प्रकार की वितृष्णा का भाव था। 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए। किशोरवय चन्द्रशेखर ने इसमें भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया ।

लेकिन उनकी दृढ़ता और संकल्पशीलता का परिचय तब मिला जब वे मात्र चौदह साल के थे । जलियांवाला बाग हत्याकांड के के विरोध में उन्होंने अपने ग्राम में प्रभात फेरी निकाली। प्रतिबंध की परवाह नहीं की और अपने मित्रों को एकत्र कर कक्षा का बहिष्कार किया।चंद्रशेख र और कुछ किशोरों को पकड़ लिया गया। बच्चों को चांटे लगाये गये, माता-पिता को बुलवाया गया, कान पकड़कर माफी मांगने को कहा गया । चन्द्रशेखर ने माफी न माँगी और न अपनी गलती स्वीकारी, उल्टे भारत माता की जय का नारा लगा दिया ।

इससे नाराज पुलिस ने उन्हे डिस्ट्क्टि मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया और पन्द्रह बेंत मारने की सजा सुना दी गयी । उनका नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’ बताया । पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और घर का पता ‘जेल’ बताया। यहीं से उनका नाम चंद्रशेखर तिवारी के बजाय चन्द्रशेखर आजाद हो गया।

अपनी शालेय शिक्षा पूरी कर चन्द्रशेखर पढऩे के लिये बनारस आये । यहां उनका परिचय सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी मन्मन्थ नाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी से हुआ और वे सीधे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गये । आंरभ में उन्हे क्रांतिकारियों के लिये धन एकत्र करने का काम मिला । उन्होंने बनारस में कर्मकांड और संस्कृत की शिक्षा ली थी। अतएव अपनी सक्रियता बनाये रखने के लिये उन्होंने अपना नाम हरिशंकर ब्रह्मचारी रख लिया और झाँसी के पास ओरछा में अपना आश्रम भी बना लिया ।

क्रांतिकारियों में उनका नाम चन्द्रशेखर आजाद था तो समाज में हरिशंकर ब्रह्मचारी । उनकी रणनीति के अंतर्गत ही सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी भगतसिंह अपना अज्ञातवास बिताने कानपुर आये थे । 1922 के असहयोग आन्दोलन में जहाँ उन्होंने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया वही 1927 के काकोरी कांड, 1928 के सेन्डर्स वध, 1929 के दिल्ली विधानसभा बम कांड, और 1929 में दिल्ली वायसराय बम कांड में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है । यह चन्द्रशेखर आजाद का ही प्रयास था कि उन दिनों भारत में जितने भी क्राँतिकारी संगठन सक्रिय थे, सबका एकीकरण करके 1928 में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का गठन किया गया । वे हरिशंकर ब्रह्मचारी वेश में ही यात्रायें करते और धन संग्रह करते । धनसंग्रह में उन्हें पं मोतीलाल नेहरू का भी सहयोग मिला।

वे जब भी आर्थिक सहयोग के लिये प्रयाग जाते या पं मोतीलाल नेहरू से मिलने की योजना बनती वे हमेशा इलाहाबाद के बिलफ्रेड पार्क में ही ठहरते थे । वे संत के वेश में होते थे । और यही पार्क उनके बलिदान का स्थान बना । वह 27 फरवरी 1931 का दिन था । पूरा खुफिया तंत्र उनके पीछे लगा था । वे 18 फरवरी को इस पार्क में पहुंचे थे । यद्यपि उनके पार्क में पहुंचने की तिथि पर मतभेद हैं लेकिन 19 फरवरी को उनकी कमला नेहरू से भेंट भी हुईं । कमलाजी यह जानती थीं कि पं मोतीलाल नेहरू क्रांतिकारियों को सहयोग करते थे ।

उनके कहने पर चन्द्रशेखर आजाद की 25 फरवरी को आनंद भवन में पं जवाहरलाल नेहरु से मिलने पहुंचे । इस बातचीत का विवरण कहीं नहीं है । मुलाकात हुई । अनुमान है कि पं नेहरू ने भी सहयोग का आश्वासन दिया था पर इसके प्रमाण कहीं नहीं मिलते । हालांकि बाद में पं नेहरू ने अपनी आत्मकथा में क्रांतिकारियों की गतिविधियों पर नकारात्मक टिप्पणी की है और चन्द्रशेखर आजाद को फ़ासीवादी लिखा है । जो हो । चन्द्रशेखर आजाद पार्क में ही रहे। और 27 फरवरी को पुलिस से बुरी तरह घिर गये ।

27 फरवरी को सबेरे सबेरे पुलिस की गाडिय़ां तीनों रास्तों से पहुँची । एनकाउन्टर आरंभ हुआ । पर ज्यादा देर न चल सका । यह तब तक ही चला जब तक उनकी पिस्तौल में गोलियाँ रहीं । वे घायल हो गये थे और अंतिम गोली बची तो उन्होंने अपनी कनपटी पर मारली। वे आजाद ही जिये और आजाद ही विदा हुये।

उनके बलिदान के बाद अंग्रेजों ने शव का अपमान किया और दहशत पैदा करने के लिये पेड़ पर लटकाया। यह खबर कमला नेहरू को लगी । उस समय पुरुषोत्तम दास टंडन आनंद भवन आये थे । कमलजी टंडन जी को लेकर पार्क पहुँची । अंग्रेजी अफसरों से बात की । शव उतरवाया और सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार का प्रबंध किया । बिलफ्रेड पार्क में उनके होने की सूचना अंग्रेजों को कैसे लगी इस बिंदु को अलग-अलग इतिहासकारों से अलग-अलग संदेह व्यक्त किया है ।

Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on pinterest
Pinterest
Share on pocket
Pocket
Share on whatsapp
WhatsApp

Never miss any important news. Subscribe to our newsletter.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News

Related News