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23 गोलियों से छलनी होकर भी तुकाराम ने जिन्दा पकड़ा कसाब को

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  • मुम्बई पर हमला : कुछ अनुत्तरित प्रश्न (26 नवम्बर)



भारतीय इतिहास पन्नों पर 26 नवम्बर 2008 का वह काला अध्याय है जिस दिन देश की औद्योगिक राजधानी समझी जाने वाली मुम्बई पर सबसे भीषण और सबसे सुनियोजित हमला हुआ था। इस हमले में प्रत्यक्ष हमलावर केवल दस थे पर तीन दिनों तक पूरा देश आक्रांत रहा। इस हमले को तेरह साल बीत गये लेकिन कुछ प्रश्नों का समाधान अभी तक नहीं हुआ, कुछ रहस्यों पर आज भी परदा पड़ा है। हमले का एक पहलू यह भी है कि एएसआई तुकाराम आंवले ने गोलियों से छलनी होकर भी आतंकवादी कसाब को जिंदा पकड़ लिया था । उनके प्राणों ने भले शरीर को छोड़ दिया, पर तुकाराम ने कसाब को नहीं छोड़ा था।

कसाब की पकड़ से ही भारत यह प्रमाणित कर पाया कि इस हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ है । आतंकवादी हमलों से तो कोई नहीं बचा, आधी से ज्यादा दुनियां आक्रांत है । अमेरिका इंग्लैंड और फ्रांस जैसे देशों में भी आतंकवादी हमले झेले हैं। इन सब हमलों के पीछे एक विशेष मानस और मानसिकता रही है। जो दुनियां को केवल अपने रंग में रंगना चाहती है। हालांकि अब तक हुये आतंकवादी हमलों में सबसे भीषण हमला अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड टॉवर पर हुआ हमला माना जाता है। पर मुम्बई का यह हमला उससे कहीं अधिक घातक माना गया । यह आधुनिकतम तकनीक और सटीक व्यूह रचना के साथ हुआ था।

कोई कल्पना कर सकता है कि केवल दस आदमी सवा सौ करोड़ के देश की दिनचर्या तीन दिन तक हलाकान कर सकते हैं। ये कुल दस हमलावर थे, जो एक विशेष आधुनिकतम नौका द्वारा समुद्री मार्ग से मुम्बई पोर्ट पर आये थे। वे रात्रि लगभग सवा आठ बजे कुलावा तट पर पहुंचे थे। सभी एक ही वोट में आये थे। उनके हाथ में कलावा बंधा था और कुछ के गले में भगवा दुपट्टा भी दिख रहा था। सभी के पास बैग थे। ये जैसे ही पोर्ट पर उतरे मछुआरों ने देखा। उन्हें ये लोग सामान्य न लगे, न कर काठी में और न वेश भूषा में।

सामान्यत: भगवाधारी ऐसी टीम नाव से कभी न आती। नाव भी विशिष्ठ थी। इसलिये मछुआरों को उनमें कुछ अलग लगा मछुआरों ने इसकी सूचना वहां तैनात पुलिस पाइंट को भी दी थी। किंतु पुलिस को मामला इतना गंभीर न लगा जितना बाद में सामने आया।

भगवा दुपट्टे के कारण पुलिस ने ध्यान न दिया और सभी आतंकवादी पोर्ट से बाहर आ गये। वे वहां से दो टोलियों में निकले,बाद में पांच टोली बने। इन्हें पांच टारगेट दिये गये थे । प्रत्येक टारगेट पर दो-दो लोगों को पहुंचना था। ये टारगेट थे होटल ताज, छत्रपति शिवाजी टर्मिनल, नारीमन हाउस, कामा हास्पीटल, और लियोपोल्ड कैफे थे । कौन कहां कब पहुंचेगा यह भी सुनिश्चित था । ये सभी रात सवा नौ बजे तक अपने अपने निर्धारित स्थानों पर पहुंच गये थे हमला साढ़े नौ बजे से आरंभ हुआ। इन्हें पाकिस्तान में बैठकर कोई जकीउर रहमान कमांड दे रहा था । जकी ने साढ़े नौ बजे ही हमले की कमांड दी।

ये सभी अपने दिमाग से नहीं अपितु मिल रही कमांड के आधार पर काम कर रहे थे। इसलिये अपने टारगेट पर पहुंचकर इन्होंने कमांड का इंतजार किया । कहां बम फोडऩा है, कहां गोली चलाना है, कितनी गोली चलाना है, यह भी कमांड दी जा रही थी । ये हमला कितनी आधुनिक तकनीक से युक्त था इसका अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान में बैठा जकीउर रहमान इन सभी को देख सकता था, और वह देखकर बता रहा था कि किसे क्या करना है । वह किसी ऐसी आधुनिक प्रयोगशाला में बैठा था जहां से इन्हें आगे बढऩे का, दांये या बायें मुडऩे का मार्ग भी बता रहा था और आगे पुलिस प्वाइंट कहां, यह भी बताता था हैं।


बहुत संभव है कि इन पांचों टीम को कमांड देने वाले अलग अलग लोग हों। बाकी हमलावरों की मौत हो गयी इसलिये उनका रहस्य, रहस्य ही रह गया। जकी का नाम इसलिये सामने आया कि कसाब पकड़ा गया और उसने नाम बताया। यह आतंकवादी अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन लश्करे तयैबा के सदस्य थे। सभी के पास एके-47 रायफल, पिस्टल, 80 ग्रेनेट और विस्फोटक, टाइमर्स और दो हजार गोलियां थीं। हमला 26 नवम्बर को आरंभ हुआ और 28 नवम्बर की रात तक चला। 29 नवम्बर को सरकार की ओर से अधिकृत घोषणा की गयी कि भारत हमले मुक्त हो गया । तब जाकर पूरे देश ने राहत की सांस ली । इस हमले में 166 लोगों की मौत हुई। घायल हुये जिन लोगों ने बाद में प्राण त्यागे उन्हें मिलाकर आकड़े दो सौ से ऊपर जाते हैं। और तीन सौ अधिक लोग घायल हुये । आतंकवादियों से निबटने के लिए सुरक्षा बलों ने ऑपरेशन ‘ब्लैक टोर्नेडो चलाया था।

यह मुकाबला कोई साठ घंटे चला। अंतिम मुकाबला होटल ताज में हुआ था। आतंकवादी अपने योजना और कमांड के अनुसार हर स्पाट पर दो दो लोग थे। होटल ताज को इन दो आतंकवादियों से मुक्त कराने में सुरक्षा बलों को पसीना आ गया था। इसका एक कारण यह था कि सुरक्षा बलों को इनकी लोकेशन का पता देर से लगा जबकि आतंकवादियों को होटल के हर कोने की गतिविधियों का पता कमांड से चल रहा था। आतंकवादियों को होटल में सुरक्षा बलों के मूवमेंट का पता होता था जब कि सुरक्षा बलों को डेढ़ दिन तक इनके मूवमेंट का पता न चल रहा था। चूंकि आतंकवादियों ने होटल के कैमरे और लिफ्ट सिस्टम को नष्ट कर दिया था। जबकि पाकिस्तान में बैठा इनका कमांडर होटल की हर गतिविधि को देख रहा था उसी अनुसार इन्हें कमांड दे रहा था जिससे ये अपनी लोकेशन बदल लेते था। इसलिये वे होटल ताज में जन और धन दोनों का अधिक नुकसान कर पाये।

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