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स्वातंत्र्य वीर के त्याग और संघर्ष को कम करके आंकने की कोशिश राष्ट्रहित में नहीं

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  • मनगढ़ंत आरोपों से कम नहीं होता सावरकर का मान

सावरकर जी की हिंदुत्व एवं मातृभूमि-पुण्यभूमि वाली अवधारणा पर प्रश्न उछालने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी क्या आंबेडकर को भी कटघरे में खड़े करेंगें? क्योंकि उन्होंने भी इस्लाम के आक्रामक, असहिष्णु, विघटनकारी, विस्तारवादी प्रवृत्तियों से तत्कालीन नेताओं को सावधान और सचेत किया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि इस्लाम का भाईचारा केवल उसके मतानुयायियों तक सीमित है। मुसलमान कभी भारत को अपनी मातृभूमि नहीं मानेगा, क्योंकि वह स्वयं को आक्रांताओं के साथ अधिक जोड़कर देखता है।

प्रणय कुमार, लेखक स्वतंत्र पत्रकार
pranay.knp@gmail.com

विनायक दामोदर सावरकर यानी स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर एक विचारधारा विशेष के लोग आरोप लगाते रहे हैं कि उन्होंने तत्कालीन ब्रितानी हुकूमत से माफी माँगी थी और उनकी शान में कसीदे पढ़े थे। यद्यपि राजनीतिक क्षेत्र में आरोप लगाओ और भाग जाओ की प्रवृत्ति प्रचलित रही है। उसके लिए आवश्यक प्रमाण प्रस्तुत करने का आदर्श कोई सामने नहीं रखता। क्या उन आरोपों को तर्कों एवं तथ्यों की कसौटी पर नहीं कसा जाना चाहिए? सबसे पहले माफीनामे और सामान्य याचिका या शपथ-पत्र में अंतर को हमें समझना होगा। उस समय राजनीतिक कैदियों को कारावास से मुक्त होते समय भविष्य में शिष्ट-शालीन-अनुशासित बने रहने का शपथ-पत्र या बंध-पत्र (बांड) भरकर देना होता था। याचिकाएँ दायर करनी होती थीं।

ऐसी याचिका एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया होती थी, उसे दया-याचिका कहकर प्रचारित-प्रसारित करना सावरकर जैसे प्रखर देशभक्त एवं त्यागी-तपस्वी-बलिदानी व्यक्तित्व का घोर अपमान है। ऐसी याचिका या शपथ-पत्र केवल उन्होंने ही नहीं, अपितु तमाम राजनीतिक कैदियों ने भरकर दिए थे। सत्य यह भी है कि यह ‘मर्सी पिटीशन बिपिनचंद्र पाल की अध्यक्षता में तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व एवं संगठन द्वारा ही प्रस्ताव पारित कर ब्रिटिश सरकार को भेजी गई थी। भाकपा के संस्थापक श्रीपाद डांगे एवं महान क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल व बारीन्द्र घोष भी ऐसी ही ‘मर्सी पिटीशन के आधार पर सेलुलर जेल से रिहा हुए थे। मोतीलाल नेहरू ने जवाहरलाल नेहरू को नाभा जेल से रिहा कराने के लिए ऐसा ही बंध-पत्र (बांड) तत्कालीन वायसराय को भरकर दिया था।

25 जनवरी 1920 को स्वयं गाँधी जी ने पत्र लिखकर वीर सावरकर के छोटे भाई नारायण राव को पुन: याचिका दायर करने की नसीहत दी थी। 26 मई 1920 को उन्होंने ‘यंग इंडिया में लेख लिखकर सावरकर बंधुओं की रिहाई की माँग उठाई। क्या यह सत्य नहीं कि किसी एक पत्र, याचिका या कथित माफीनामे से किसी राष्ट्रनायक का महत्व या योगदान कम नहीं होता? और फिर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि उनकी यह याचिका उनकी रणनीति का हिस्सा भी तो हो सकती है! क्या शिवाजी द्वारा औरंगजेब को लिखे गए माफीनामे से उनका महत्व कम हो जाता है? कालेपानी की सजा भोगते हुए गुमनाम अँधेरी कोठरी में घुट-घुटकर मरने की प्रतीक्षा करने से बेहतर तो यही था कि बाहर आ सक्रिय-सार्थक-सोद्देश्य जीवन जिया जाय!


जहाँ तक ब्रितानी हुकूमत की कथित तारीफ की बात है तो बहुत-से स्वतंत्रता-सेनानियों ने अलग-अलग समयों पर किसी-न-किसी मुद्दे पर ब्रिटिश शासन की तारीफ की है। इन तारीफों को उनकी तत्कालीन परिस्थितियों एवं सूझ-बूझ का परिणाम माना गया। फिर सावरकर जी पर एकपक्षीय-अनर्गल आरोप क्यों? गाँधी जी ने समय-समय पर ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर उनके प्रति आभार प्रदर्शित किया है, उनके प्रति निष्ठा जताई है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से ऐसे पत्र लिखे हैं, जिसमें भारतीयों को अंग्रेजों का वफादार बनने की नसीहत दी गई है, ब्रिटिशर्स द्वारा शासित होने को भारतीयों का सौभाग्य बताया गया है। वे अंग्रेजों के अनेक उपकारों का जिक्र करते हुए भाव-विभोर हए हैं। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गाँधी द्वारा तत्कालीन वायसराय को लिखे गए पत्रों में वे अंग्रेजों की ओर से भारतीय सैनिकों की भागीदारी को उनका फर्र्ज बताते नहीं थकते! तो क्या इन सबसे स्वतंत्रता-संग्राम में उनका महत्व कम हो जाता है?

मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले जैसे काँग्रेसी नेताओं या राजा राममोहन राय जैसे अनेकानेक समाज सुधारकों ने खुलकर ब्रिटिश शासन और उनकी जीवन-शैली की पैरवी की, यदि इस आधार पर उनके योगदान को कम करके नहीं देखा जाता तो फिर राष्ट्र के लिए आयु का क्षण-क्षण और शरीर का कण-कण होम कर देने वाले सावरकर पर सवाल और आरोप क्यों? आंबेडकर भी अनेक अवसरों पर ब्रिटिशर्स की पैरवी कर चुके थे, यहाँ तक कि स्वतंत्रता-पश्चात दलित समाज को वांछित अधिकार दिलाने को लेकर वे स्वतंत्रता का तात्कालिक विरोध तक कर चुके थे। तो क्या इससे उनका महत्व और योगदान कम हो जाता है?

सावरकर जी की हिंदुत्व एवं मातृभूमि-पुण्यभूमि वाली अवधारणा पर प्रश्न उछालने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी क्या आंबेडकर को भी कटघरे में खड़े करेंगें? क्योंकि उन्होंने भी इस्लाम के आक्रामक, असहिष्णु, विघटनकारी, विस्तारवादी प्रवृत्तियों से तत्कालीन नेताओं को सावधान और सचेत किया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि इस्लाम का भाईचारा केवल उसके मतानुयायियों तक सीमित है। मुसलमान कभी भारत को अपनी मातृभूमि नहीं मानेगा, क्योंकि वह स्वयं को आक्रांताओं के साथ अधिक जोड़कर देखता है। उनका मानना था कि मुसलमान कभी स्थानीय स्वशासन को नहीं आत्मसात करता, क्योंकि वह कुरान, हदीस और सुन्नाह यानी शरीयत से निर्देशित होता है और उसकी सर्वोच्च आस्था इस्लामिक मान्यता एवं प्रतीकों-स्थलों के प्रति रहती है, जो उसे शेष सबसे पृथक करती है।

सच यह है कि ये दोनों राजनेता यथार्थ के ठोस धरातल पर खड़े होकर वस्तुपरक दृष्टि से अतीत, वर्तमान और भविष्य का आकलन कर पा रहे थे। यह उनकी दूरदृष्टि थी, न कि संकीर्णता। ये दोनों विभाजन के पश्चात ऐसी किसी भी कृत्रिम-काल्पनिक-लिजलिजी-पिलपिली एकता के मुखर आलोचक थे, जो थोड़े से दबाव या चोट से बिखर जाय या रक्तरंजित हो उठे! सावरकर जी मानते थे कि जब तक भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं, तभी तक राज्य(स्टेट) का मूल चरित्र पंथनिरपेक्ष रहने वाला है। कोरी व भावुक पंथनिरपेक्षता की पैरवी करने वाले कृपया बताएँ कि भारत से पृथक हुआ पाकिस्तान या बांग्लादेश क्या गैर इस्लामी या लोकतांत्रिक तंत्र दे पाया? वहाँ की मिट्टी, आबो-हवा, लबो-लहज़ा, रिवाज-तहजीब – कुछ भी तो हमसे बहुत भिन्न नहीं?

बांग्लादेश का तो निर्माण और भाग्योदय भी भारत के सहयोग से संभव हुआ, पर वहाँ हिंदुओं को आज किन नारकीय स्थिति एवं हिंसा से गुजरना पड़ रहा है, उसे कोई भी संवेदनशील एवं जागरूक व्यक्ति स्वयं अनुभव कर सकता है! छोडि़ए इन दोनों मुल्कों को, क्या कोई ऐसा इस्लामिक राष्ट्र है, जो पंथनिरपेक्ष शासन दे पाने में सफल रहा हो? तुर्की का उदाहरण हमारे सामने है, जिसकी बुनियाद में पंथनिरपेक्षता थी, पर आज मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठन या वहाबी विचारधारा वहाँ की केंद्रीय धुरी हैं। क्या इसमें भी कोई संदेह होगा कि लाख प्रयासों के बावजूद गाँधी जी स्वयं विभाजन की त्रासदी को रोक नहीं पाए और स्वतंत्रता-पश्चात की धार्मिक-सामुदायिक स्थिति का यथार्थ अनुमान एवं आकलन कर पाने में पूर्णत: विफल रहे?

सच तो यह है कि स्वातंत्र्यवीर सावरकर का महत्व न तो उन पर लगाए गए मनगढ़ंत आरोपों से कम होता है, न उनके हिंदू-हितों की पैरोकारी से। उनका रोम-रोम राष्ट्र को समर्पित था। वे अखंड भारत के पैरोकार व पक्षधर थे। उन्होंने अपनी प्रखर मेधा शक्ति, तार्किक-तथ्यात्मक विवेचना के बल पर 1857 के विद्रोह को ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दिलवाई। उन्होंने पतित पावन मंदिर की स्थापना कर अस्पृश्यता-निवारण की दिशा में ठोस एवं निर्णायक पहल की।

उन्होंने धर्मांतरित जनों के लिए उनके मूल धर्म में लौटने का पुरजोर अभियान चलाया। समाज-सुधार के लिए वे आजीवन प्रयत्नशील रहे। तत्कालीन सभी बड़े राजनेताओं में उनका बड़ा सम्मान था। गाँधी-हत्या के मिथ्या आरोपों से न्यायालय ने उन्हें ससम्मान बरी किया। राष्ट्र उन्हें सदैव एक सच्चे देशभक्त, प्रखर चिंतक, दृष्टिसंपन्न इतिहासकार, समावेशी संगठक और कुशल राजनेता के रूप में याद रखेगा।

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