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हिंदुत्व का सत्य एवं भ्रांति

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  • प्रणय कुमार

हिंदू हेरिटेज फॉउंडेशन ऑफ अमेरिका ने हिंदुत्व पर 1 से 3 अक्टूबर के बीच वैश्विक हिंदू सम्मेलन, 2021 का आयोजन किया है। इसका सजीव प्रसारण अनेकानेक मंचों और माध्यमों से किया गया। उसके उद्घाटन-सत्र में ‘हिंदुत्व : वास्तविकता एवं भ्रांति पर दिया गया व्याख्यान-

हिंदुत्व का दूसरा नाम सनातन संस्कृति या सनातन धर्म है। सनातन का अभिप्राय ही यह है कि जो काल की कसौटी पर सदैव खरा उतरे, जो कभी पुराना न पड़े, जिसमें काल-प्रवाह में आया असत्य प्रक्षालित होकर तलछट में पहुँचता जाय और सत्य सतत प्रवहमान रहे। फिर यह भ्रांति कब, कैसे और क्यों उत्पन्न हुई? उन भ्रांतियों के क्या कारण रहे? इसे जानने के लिए हमें अतीत में झाँकना पड़ेगा। हिंदू-समाज विगत 1000 से अधिक वर्षों से विदेशी-विधर्मी आक्रांताओं से जूझता रहा है। परंतु प्रचारित यह किया जाता रहा कि हम सतत गुलाम रहे और सच्चाई यह है कि हम संघर्षशील रहे।

कभी हारे, कभी जीते, पर हमने कभी समर्पण नहीं किया, हम झुके, टूटे और मिटे नहीं। और जब भी हमें अवसर मिला हमने इन विदेशी-विधर्मी ताकतों को जड़-मूल समेत उखाड़ फेंकने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी।विश्व-कल्याण के लिए सभ्यता का यह वैचारिक संघर्ष आज भी सतत जारी है। हाँ, स्वतंत्र भारत में वह थोड़ा दुर्बल अवश्य पड़ा है। क्योंकि स्वतंत्रता के पश्चात देश की सत्ता जिन हाथों और कालांतर में जिस वंश के हाथों में आई, वे पश्चिमी रंग में रंगे थे। उनमें अंग्रेजियत का भाव कूट-कूटकर भरा था। वे स्वयं को दुर्घटनावश हिंदूू मानते थे। उन्हें भारत के मूल स्वरूप एवं स्व की समझ और पहचान नहीं थी। और कोढ़ में खाज का काम वामपंथियों एवं छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों ने किया।

उन्होंने मधुवेष्टित शुुगरकोटेड) तरीकों से बड़ी योजना एवं कुटिलतापूर्वक युवा पीढी को देश की जड़ों-संस्कारों-मूल्यों से काट दिया। उनमें शत्रु-मित्र की समझ, सम्यक-संतुलित इतिहास बोध ही नहीं विकसित होने दिया। उन्हें एक निश्चित दिशा में सोचने के लिए षड्यंत्र पूर्वक अनुकूलित कर दिया। वे भारतीय ज्ञान-परंपरा यानी हिंदू ज्ञान-परंपरा को संशय या हीनता की दृष्टि से देखने लगे। उन्हें समझाया गया कि जो कुछ भी श्रेष्ठ है, वरेण्य है, सब पश्चिम का दिया हुआ है। हम तो साँप के आगे बीन बजाने वाले, पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचने वाले, पत्थरों-पर्वतों-नदियों की पूजा करने वाले पिछड़ा और प्रतिगामी समाज हैं। इन सबके पीछे के वैज्ञानिक-व्यावहारिक पक्ष को जान-बूझकर उनसे छुपाया गया। भ्रांति का मूल कारण स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद की यही परकीय-परावलंबी-परमुखापेक्षी, स्वाभिमान-शून्य दृष्टि है, दुर्भाग्य से जिसे आज भी पल्लवित-पोषित किया जा रहा है।

यदि इस अज्ञान को दूर कर दिया जाय और स्व, स्वत्व एवं सनातन सत्य का बोध करा दिया जाय तो सब प्रकार की भ्रांतियाँ स्वत: दूर हो जाएँगीं। प्रश्न उठता है कि फिर हिंदुत्व क्या है? हिंदुत्व संपूर्ण सृष्टि में एक ही सत्य, एक ही परम तत्त्व, चैतन्य सत्ता को देखने की जीवन-दृष्टि, उससे अधिक जीवन-पद्धत्ति है। हिंदुत्व ने मनुष्य और संपूर्ण विश्व-ब्रह्मांड का चिंतन समग्रता से किया है। उसने मनुष्य को केवल शरीर, मन, बुद्धि तक सीमित नहीं माना, बल्कि उसने उससे आगे उसकी आत्मिक सत्ता की खोज की। व्यष्टि से समष्टि तक उस आत्मिक सत्ता का विस्तार ही हम हिंदुओं का अंतिम लक्ष्य है।

हिंदू-चिंतन के अनुसार हर व्यक्ति – परिवार, कुल-वंश-समुदाय(बिरादरी), समाज, राष्ट्र, विश्व, ब्रह्मांड के साथ अंगागी भाव से जुड़ा है। उसका आपस में अंत:संबंध है। उस अंत:संबंध का अनुसंधान और तत्पश्चात आत्म-साक्षात्कार ही हमारी दृष्टि में मोक्ष या अंतिम सत्य है। हम संपूर्ण चराचर में व्याप्त उस एकत्व को प्राप्त एवं आत्मसात करना चाहते हैं।

हिंदू जीवनदृष्टि मानती है कि आत्मा-परमात्मा एक है। अज्ञान और अहंकार के कारण दोनों की दो सत्ताएँ प्रतीत होती हैं, जिसे हमने माया कहा है। आत्मा-परमात्मा का चिंतन करते हुए हमारे ऋषि-मुनियों ने व्याख्या दी- ‘आत्मा- सच्चिदानंदमय रूप है, वह निराकार, निर्विकार, निरंहकार, अनादि और अनंत है और परमात्मा भी सच्चिदानंदमय रूप, निराकार, निर्विकार, निरंहकार, अनादि और अनंत है।

चूँकि दो अनंत नहीं हो सकते, इसलिए दोनों एक हैं। गणितीय सूत्र के अनुसार अनंत को अनंत से जोडऩे, घटाने, गुना करने या भाग देने पर परिणाम अनंत ही निकलता है। यानी हमने जीवात्मा को परमात्मा का अंश माना। और हम यहीं नहीं रुके, बल्कि हमने जड-चेतन सबमें एक ही सत्य, एक ही ऊर्जा, एक ही ईश्वर के दर्शन किए। दोनों के तदरूप हो जाने की संकल्पना की। सर्वं खल्विदं ब्रह्म ‘यत्र पिंडे, तत् ब्रह्माण्डे ‘आत्मवत सर्वभूतेषु हमारे महावाक्य व जीवन-मंत्र रहे। हमने धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के पुरुषार्थ-चतुष्ट्य का लक्ष्य रखा। हमने धर्म को नींव माना, पर अर्थ और काम की उपेक्षा नहीं की। बल्कि इनसे गुजरने के बाद ही कोई हिंदू मोक्ष का सुपात्र बनता है।

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