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आदिवासी धर्मगुरुओं ने किया मिशनरियों का प्रभावी प्रतिरोध

  • मनोज श्रीवास्तव
    ईसाई मिशनरियों और आदिवासियों के बीच टकराव की तात्कालिक राजनीति कर वर्तमान में इस या उस राजनीतिक दल या किसी संगठन को दोष देना बहुत आसान है, लेकिन सच तो यह है कि यह टकराव तब से चल रहा है जब ये दल या संगठन अस्तित्व में नहीं थे। कोल, संथाल, खोंड, मुंडा, कोया, चेंचू, राम्पा, ओरांव आदिविद्रोहों के मूल में एक प्रमुख कारण मिशनरियों द्वारा किया गया धर्म- प्रचार था और इसी कारण यह हुआ कि अधिकतर आदिवासी विद्रोहों का नेतृत्व इस समाजों के किन्हीं गुरू या धार्मिक प्रमुख ने किया। ओरॉव सन्त जात्रा भगत, तूरिया भगत, ताना भगत, कालीचरण ब्रह्मा, तांतिया मामा, बिरसा मुंडा आदि बहुत से नाम इस श्रंखला में आते हैं।
    छोटा नागपुर और संथाल परगना में ब्रिटिश, जर्मन, लूथरन और पूर्वी भारत में आस्िट्रयन मिशन चलते थे। तब जात्रा भगत ‘धर्मेश’ के दर्शन होने की बात करते थे और उन्हें ‘भक्ति’ से पाने की बात करते थे। उन ओरांवों पर वैष्णवों और कबीर- पंथियों के प्रभाव की बात इतिहासकार स्वीकारते हैं। उनके भी काफी पहले बिरसा मुंडा ने खुंती, तमार, सरवदा और बेंडगांव क्षेत्रों में आदिवासी विद्रोह का नेतृत्व किया था। उन्होंने देखा कि कैसे मिशनरी लोगों की आस्थाओं और धर्म से खेल करते हैं। उन्होंने एक विरासत आंदोलन चलाया जिसे बीरसेत कहा जाता था। चर्च उस समय न केवल तेजी से धर्मान्तरण कर रहा था बल्कि उसने कर संग्रह भी शुरू कर दिया था। तब बिरसा स्वयं धर्मोपदेशक हो गये और चर्च के चमत्कारों के समकक्ष स्वयं भी चमत्कार करके दिखाने लगे।
    धरती आबा का नाम सब जगह गूंज गया था। अंग्रेजों ने बिरसा को गिरफ्तार किया और उन्हें दो साल जेल भी हुई। ईसाई मिशनरी उनके और उनके अनुयायियों के पीछे पड़े रहे और उन्हें भूमिगत होकर गुप्त सभाएं करनी पड़ीं। क्रिसमस (1899) के दिन 7000 आदिवासी स्त्री-पुरुषों ने ‘उलगुलान’(क्रांति) घोषित कर दिया और इस जनजातीय समुदाय ने मुरहू के एंग्लिकन मिशन से लेकर सरवादा के रोमन कैथलिक मिशन तक को निशाने पर लिया। एक साथ बीस से अधिक चर्चों पर आक्रमण हुए।
    आज ‘द वायर’ अपनी शक्ति इस बात को खर्च करने में लगाता है कि बिरसा आदिवासियों की एक विशिष्ट अस्मिता की स्थापना करना चाहते थे,न कि हिन्दुत्व की रक्षा। और आज यह देखकर भी आश्चर्य होता है कि आदिवासियों द्वारा मिशनरियों के प्रतिरोध को हिन्दुत्व के द्वारा प्रेरित और नियोजित बताने में भी उतनी ही शक्ति खर्च की जाती है।
    बिरसा भगवद्गीता से क्यों चीजें उद्धृत करते थे, वे रामायण तथा महाभारत के दृष्टान्त क्यों दिया करते थे? आज बिरसा के शत्रु जॉन बैप्टिस्ट हाफमैन नामक जर्मन प्रीस्ट, जो बिरसा के ही तीर से मारा गया, की मूर्ति झारखंड के खुंती जिले के रोमन कैथलिक चर्च में लगाना बताता है कि कैसे उस मिशनरी आंदोलन की, जो आदिवासियों के प्रतिकूल था, की निरन्तरता बनाये रखने की कोशिश की जा रही है और उसी समय बंदगांव के मुंशी आनन्द पांडे के बारे में चर्चा नहीं होती जिसने बिरसा को आध्यात्मिक रूप से जागृत किया।
    बोडो आदिवासियों के धर्मगुरु कालीचरण ब्रह्मा का ब्रह्म धर्म भी धर्मान्तरण की मिशनरी गतिविधियों को लक्ष्य करता था। उन्हें ‘गुरुदेव’ कहना, आदि ब्रह्म, परम ब्रह्म की अवधारणाएं, उनकी ‘आहुति’ आदि अन्य कर्मकांड भारत के पारंपरिक विश्वासों के प्रतिकूल नहीं थे, पर उन मिशनरियों से उनकी जबर्दस्त टकराहट हुई जो 1836 में दो अमेरिकी बाप्टिस्ट मिशनरियों की अगुआई में सादिया में मिशन स्थापित होने के बाद से ही धर्मान्तरण में लगे हुए थे।
    आज जैसे कनाडा सहित विश्व के कई एबॉरिजिनल क्षेत्रों में मिशन द्वारा निर्मित ‘झूठी चेतना (फाल्स कांशसनेस) की बात की जाती है, उसी झूठी चेतना का अहसास भारत के आदिवासियों को शुरू से ही था। 1899 के मुंडा विद्रोह की याद करते ही हमें यह भी याद करना चाहिए कि उसी वर्ष चीन में बाक्सर विद्रोह हुआ जिसमें मिशनरियों का इतना बड़ा संहार किया गया था कि इतिहास लेखक नेट ब्रांट ने उसे ‘ईसाई धर्म में अंतरण के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी (the greatest single tragedy in the history of Christian evangelicalism) कहा था। कुंओमितांग में KMT के पोस्टरों की भाषा भी याद की जानी चाहिए। ‘जीसस क्राइस्ट मर चुका, क्यों नहीं किसी जिन्दा चीज की पूजा करें जैसे राष्ट्रवाद’ (Jesus Christ is dead, why not worship something such as Nationalism.)।
    जापान में सत्रहवीं सदी के मध्य सभी क्रिश्चियन मिशनरियों को देश से बाहर भगाना, सभी धर्मान्तरितों को मृत्युदंड की घटनाएं स्थानीय प्रतिक्रिया ही थीं। मेडागास्कर की स्थानीय जातियों की रानी रानावलोना ने 19वीं सदी में ईसाइयत पर प्रतिबंध लगाने और मिशनरियों को द्वीप से निकालने की याद संदर्भ में की जा सकती है।
    जिस तरह से आज बस्तर के आदिवासियों को संस्कृतिहीन धर्महीन बताने की कोशिशें होती है, वैसे ही कभी देसी अमेरिकनों को ईसाई मिशनरियों ने धर्म व संस्कृति के बिना बताया था, और जिस तरह से आज ‘आत्माओं की फसल काटने’ (हार्वेस्टिंग आॅफ सोल्स) की बात होती है,वैसे ही अमेरिका के प्रारंभिक उपनिवेशन के दौरान स्पेनी और फ्रांसीसी मिशनरीगण ‘आत्माओं को बचाने’ (सेविंग ऑफ सोल्स) की बात किया करते थे। 1537 में जब पोप पॉल तृतीय ने यह कहा कि इंडियन्स (अमेरिकी) जानवर नहीं हैं कि उन्हें मारा जाए या बंदी बनाया जाए बल्कि आदमी,हैं जिनके पास वह आत्मा है जिनका मोक्ष हो सकता है, तो यह कहना ही बड़ी प्रगतिशील बात मानी गई थी। तब भी देशज अमेरिकी इंडियन्स को ‘हीथन’ कहा गया था जैसे पैगनों को कहा गया था। आज उन आदिवासी विद्रोहों को स्थानीय जमींदारों के विरूद्ध विद्रोह बताकर पढ़ाया जाना वामपंथियों का मुख्य शगल है। उन्होंने मोपला हत्याकांड को भी ऐसे ही पढ़ाया है। वामपंथ मिशनरी और मजहबी कट्टरता को ढंकने की शैली है। ये उन कट्टरताओं का Euphemism हैं ।

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