दिक् और काल की गणना में जनजातीय मध्य प्रदेश

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मध्यप्रदेश में कोई 46 जनजातियां निवास करती हैं। इनमें से अभी कुछ वर्ष पहले तीन जनजातियां (कीर, मीणा और पारदी) विलोपित की गई हैं और इस हिसाब से अब प्रदेश में 43 जनजातियों की प्रामाणिक अनुसूची को मान्यता दी जा रही है।

  • वसंत निरगुणे, जनजातीय मामलों के जानकार

मध्य प्रदेश की एक संज्ञा ‘आदिवासी या जनजाति प्रदेश के रूप में है। मध्य प्रदेश की जनजातीय पहचान विश्व में उसे खास बनाती है। भारत में जन जातियों का प्रतिशत 8.6 प्रतिशत है जबकि मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति का प्रतिशत 21.09 है। यहां सबसे अधिक जनजातियों का निवास होने के कारण उसे ‘जनजाति मध्यप्रदेश के नाम से जाना जाता है।

मध्यप्रदेश देश के मध्य भाग में स्थित है। इसीलिए इसे ‘भारत का हृदय भी कहा जाता है। मध्य प्रदेश के हृदय की सवा सात करोड़ धड़कनों में एक करोड़ 53 लाख 16 हजार सात सौ चौरासी (2011 की जनगणना के अनुसार) जनजातीय धड़कनें भी शामिल हैं। प्रदेश में 89 जनजातीय विकासखंड इसके जीवन्त साक्षी हैं।
मध्यप्रदेश में कोई 46 जनजातियां निवास करती हैं। इनमें से अभी कुछ वर्ष पहले तीन जनजातियां (कीर, मीणा और पारदी) विलोपित की गई हैं और इस हिसाब से अब प्रदेश में 43 जनजातियों की प्रामाणिक अनुसूची को मान्यता दी जा रही है। लेकिन इससे प्रदेश की जनजातियों के विकास में कोई अंतर नहीं आया है और ना मध्य प्रदेश की जनजातीय संस्कृति की पहचान में कमी आई है।

अभी भी मध्य प्रदेश की पहचान जनजाति प्रदेश की है। 43 जनजातियों में कुछ बहुत बड़ी और संस्कृति, कला, साहित्य संपन्न जनजातियां हैं जिनमें भील, गोंड, सहरिया, कोल, भारिया आदि हैं। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भील जनजाति की आबादी 37.7 प्रतिशत है। यह जनजाति जनसंख्या की दृष्टि से प्रदेश और भारत की सबसे बड़ी जनजाति मानी जाती है।

इसका फैलाव प्रदेश के साथ गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि राज्यों में है। इसके पश्चात गोंड जनजाति की गणना है। जिनका प्रतिशत 35.6 है। फिर कोल, कोरकू, सहरिया और बैगा- भारिया हैं। जिनका कुल मिलाकर प्रतिशत 18.9 है। गोंड की 51 उप शाखाओं को मिलाकर गिना जाए तो गोंड देश और प्रदेश की सबसे बड़ी जनजाति बन जाती है। जिसमें बस्तर के मुरिया मारिया भी सम्मिलित हैं।

आज हम विश्व में दो संस्कृतियों को पाते हैं- एक आदिवासी संस्कृति और दूसरी लोक या नागर संस्कृति। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि विकासशील परिवेश में आदिम संस्कृति अभी भी अपना अस्तित्व बनाए हुए है। आज भी उनकी पुरानी परंपराएं, रीति-रिवाज, रहन-सहन, वेशभूषा, गुदने, धार्मिक अनुष्ठान, नृत्य-गायन, संगीत, कथा और बोलियां बनी हुई हैं। तेजी से बदलते भूमंडलीकरण के दौर में जनजातियों की संस्कृति का बचा रहना एक तरह का आश्चर्य ही कहा जा सकता है।

लोग अभी भी जनजातीय जीवन को उत्सुकता से नजदीक से देखना चाहते हैं, समझना चाहते हैं। कुछ अध्येता उनकी संस्कृति, साहित्य और कलाओं का गंभीरता और गहराई से अध्ययन करना चाहते हैं। उनकी जीवनशैलियों का आद्योपांत शोध-सर्वेक्षण कार्य करना चाहते हैं। हालांकि आजादी के पूर्व मध्य प्रदेश और भारत की जनजातियों पर कुछ अंग्रेज अध्येताओं ने कार्य किया है, कुछ देश के शोधकर्ताओं ने भी कार्य किया है। पर वे कार्य पश्चिम की दृष्टि से किए गए हैं। हमें भारतीय दृष्टि से काम करने की जरूरत थी।

यह कार्य भारत में स्वतंत्रता के पश्चात शुरू हुआ। जिसमें डॉक्टर एस सी राय, डॉक्टर श्यामाचरण दुबे, डॉ. रामदयाल मुंडा जैसी प्रतिभा संपन्न लोगों ने यह कार्य बखूबी किया और जनजातीय संस्कृति की भारतीय शोध दृष्टि भी विकसित की। डॉक्टर दुबे ने मध्य प्रदेश की कमार जनजाति पर पहला शोध कार्य किया। इसके पश्चात प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में जनजाति जीवन, कला, साहित्य और संपूर्ण संस्कृति पर शोध कार्य के द्वार खुले।

मैंने स्वयं आदिवासी लोक कला अकादमी भोपाल में रहते हुए पिछले तीन दशकों में प्रदेश की गोंड, बैगा, कोरकू, सहरिया, भारिया, कोल, अगरिया जनजातियों की जीवन पद्धति, उत्पत्ति, भाषा, साहित्य की परंपरा और संस्कृति के सरोकारों पर गंभीरता से कार्य किया। विस्तार से मोनोग्राफ लिखे जो ‘संपदा नामक किताब में प्रकाशित हैं।
इसके साथ ही आज तक आदिवासी लोक कला और बोली विकास अकादमी ने प्रदेश की जनजाति और लोक कला की अनेक प्रदर्शनकारी तथा रुपंकर विधाओं को प्रदेश और देश के स्तरीय सांस्कृतिक केंद्रों और मंचों पर पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया जिसमें आदिवासियों की नृत्य- गायन, वाद्य, संगीत की विभिन्न विधाएं शामिल हैं।

गोंडों के कर्मा, सेला, बैगोओं के कर्मा-परघोनी, कोरकुओं की थापटी, भुगडु, उरोवों का सरहुल, भीलों का भगोरिया। सहरियाओं का लहंगी, दुलेदुल, कोलों का कोलदहका आदि नृत्य परंपरा का सब दूर उल्लास बिखेरा है। आदिम आख्यानों में गोंडों की गोंडवानी, रामायणी और पंडवानी खास हैं। इन सब को संकलित कर अकादमी ने इन्हें प्रदर्शन योग्य बनाया।

प्रदेश में जनजातीय शिल्पों की पारंपरिक समृद्ध धरोहर को पहचान कर प्रदेश और देश में शिल्प मेले, हाट बाजारों को आयोजित कर शिल्पों की श्रंृखला को बचाने बढ़ाने की कोशिश राज्य में की गई जिससे राज्य को अच्छे राजस्व के साथ प्रदेश के शिल्पकारों की आर्थिक स्थिति भी सुधरी। अकादमी ने संरक्षण की दृष्टि से जनजातियों की वाचिक परंपरा का प्रभूत संकलन प्रकाशन किया है। गीत, कथाओं आख्यानों की रिकॉर्डिंग की गई है। इसके आधार पर प्रदेश में जनजातियों की जीवन शैलियों को एक संग्रहालय में जीवंत रूप में दिखाने की योजना भी मध्य प्रदेश जनजाति संग्रहालय के नाम से साकार हुई जिसे पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने लोकार्पण किया।

दूसरा महत्वपूर्ण संस्थान आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास भोपाल ने जनजाति के नेतृत्व शास्त्री अध्ययन कर प्रदेश के जनजातियों के विकास में अत्यंत सार्थक भूमिका निभाई। उनके बुनियादी शोध अध्ययन के सुझावों और प्रस्तावों के आधार पर सरकार नीतिगत योजनाएं बनाती है जिसमें परिवेश, पर्यावरण, प्रदूषण से लगाकर पोषण आहार तक की समस्याएं होती हैं।

इस संस्था को टी आर आई के नाम से जाना जाता है, शिक्षा से संबंधित योजनाओं का क्रियान्वयन जनजातियों में सर्वाधिक स्तर पर हुआ है। जनजातियों की बालक बालिकाओं का स्तर ऊंचा हुआ है आदिवासी बालक उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

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