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स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय जननायक

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  • रंजना चितले, कथाकार व रंगकर्मी

भारत में स्वाधीनता संघर्ष का अंकुर स्वतंत्रता प्रिय जनजातियों के बीच ही अंकुरित हुआ। वनों और पर्वतों में रहने वाले वनवासियों की जनजातीय चेतना ने अंग्रेजों सहित प्रत्येक आततायी, निरंकुश अथवा आक्रमणकारी सत्ता के विरुद्ध निर्लिप्त संघर्ष की शुरुआत की।
भारत में स्वाधीनता संघर्ष का अंकुर स्वतंत्रता प्रिय जनजातियों के बीच ही अंकुरित हुआ। वनों और पर्वतों में रहने वाले वनवासियों की जनजातीय चेतना ने अंग्रेजों सहित प्रत्येक आततायी, निरंकुश अथवा आक्रमणकारी सत्ता के विरुद्ध निर्लिप्त संघर्ष की शुरुआत की।

अपनी माटी के प्रति समर्पित इन जनजातियों के इसी स्वाधीनता संघर्ष को आगे चलकर संपूर्ण राष्ट्र ने स्वीकारा। स्वाभिमानी स्वतंत्रता प्रिय जनजातियों ने आरंभ से ही विदेशी हुकूमत को नकार दिया था। 1857 मुक्ति संग्राम की चिंगारी जब उत्तर भारत होती हुई मध्य भारत पहुंची तो जहां मालवा-निमाड़ के भील-भिलाला जनजातीय नायकों ने मोर्चा थामा वहीं, गोंडवाना के गोंड राजा शंकरशाह और उनके पुत्र रघुनाथशाह ने जबलपुर में युद्ध का नेतृत्व किया।

1857 की क्रांति में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले वीर राजा शंकर शाह गोंड़वाना साम्राज्य के राजा थे। उनके पुत्र रघुनाथ शाह गढ़ा मंडला और जबलपुर के गोंड़ राजवंश के प्रतापी राजा संग्राम शाह के वंशज थे। इस राजवंश की कई पीढिय़ों ने देश और आत्मसम्मान के लिए अपने प्राण न्यौछावर किये थे। राजा संग्राम शाह के बड़े पुत्र दलपत शाह थे जिनकी पत्नी रानी दुर्गावती और पुत्र वीर नारायण ने अपनी मातृभूमि और आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए अकबर की सेना से युद्ध कर अपना बलिदान दिया। इसके पश्चात रानी दुर्गावती के देवर, राजा दलपत के छोटे भाई चंदा नरेश, चंद्र शाह को राजा बनाया गया। इन्हीं चंद्र शाह की 11वीं पीढ़ी में अमर शहीद शंकर शाह ने जन्म लिया।

जब 1857 में क्रांति की ज्वाला सम्पूर्ण भारत में धधक रही थी, तब अपनी मातृभूमि को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराने के लिए उन्होंने युद्ध का आह्वान किया था। क्रांति युद्ध में केंद्रीय भूमिका होने और राष्ट्रभक्ति भावपूर्ण कविता लिखने पर अंग्रेजों ने उन्हें तोप से उड़ा दिया। पिता पुत्र ने गोंडवाना राजवंश की बलिदानी परंपरा को आगे बढ़ाया। इस तरह गोंड़ वंश के राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह ने देश के लिये अपना बलिदान दिया। मालवा- निमाड़ के भील भिलाला नायकों में टंट्या भील, भीमा नायक, खाज्या नायक, सीताराम कंवर और रघुनाथ सिंह मंडलोई ने एक युगांतकारी संघर्ष किया।

क्रांति नायकों के साथ बरूद के श्यामसिंह, अकबरपुर के रेउला नायक, मकरोनी परगना के कल्लू बाबा, नाना जगताप, दौलतसिंह, टिक्का सिंह, परगना सिकंदर खेरा के निहालसिंह के अतिरिक्त फौजी टीकाराम जमादार और जवाहर सिंह ने मिलकर स्वाधीनता संग्राम का अनोखा इतिहास रचा। 1857 महासंग्राम को अंग्रेजों द्वारा कुचल देने के बाद भी इन वनवासियों ने 1866 तक युद्ध किया। इस संघर्ष में अनेक जनजाति योद्धा शहीद हुए। कईयों को कालापानी की सजा हुई और कई फांसी पर लटका दिये गये।

इन रणबांकुरों की वीर गाथा, इतिहास में अजर-अमर है। मालवा-निमाड़ में जनजातीय चेतना के नायक जनयोद्धा टंट्या भील एक ऐसा व्यक्तित्व था जिसने अंधेरे वन प्रांतरों में जन्म लेकर, अभाव और अशिक्षा से जूझते हुए अपनी इच्छा शक्ति और संकल्प से एक ऐसा असाधारण आंदोलन छेड़ा जो शोषण और अन्याय के प्रतीकार का प्रतीक बनकर सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में छा गया। अपने समाज के प्रति टंट्या का जुड़ाव इतना गहरा था कि आज भी इस इलाके का हर बच्चा बलिदानी टंट्या को मामा के संबोधन से पुकारता है। निमाड़ के अमर वीर भीमा नायक एक ऐसे भील नायक हैं जिन्होंने 1857 स्वातंत्र्य समर में अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था।

भीमा नायक को सीधे पकडऩे में असफल होने पर अंग्रेजों ने षडयंत्र रचा, 2 अप्रैल 1867 को गद्दार की सूचना पर घने जंगल में सोते हए कर लिया। भीलों के स्वतंत्रता प्रिय स्वाभिमान को बनाये रखने वाले इस जननायक ने अंतिम क्षणों तक कोई समझौता नहीं किया। बड़वानी के खाज्या नायक निे अंग्रेजी राज को नकारते हुए नौकरी छोड़ दी और बड़वानी क्षेत्र में भीलों के स्वतंत्रता संग्राम की कमान संभाली। लगातार संघर्ष किया और फांसी पर चढ़ गये। भील नायकों के बाद भिलाला नायकों ने मोर्चा संभाला। जिसमें सीताराम कंवर और रघुनाथ सिंह मंडलोई भिलाला जनजाति के नायक थे। उन्होंने 1857 के युद्ध में अंग्रेजों के विरुद्ध निमाड़ क्षेत्र में आवाज उठाई। शोषण के खिलाफ मोर्चा लिया और अंग्रेजों से युद्ध करते हुए प्राणों का उत्सर्ग किया।

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