सफर में मुकाम- क्या जरूरी है ?

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नागेश्वर सोनकेशरी

एक बार की बात है ,एक यात्री चौराहे पर रुका। उसने एक सज्जन से पूछा – यह सड़क मुझे कहॉं तक ले जाएगी? सज्जन व्यक्ति ने पूछा – आप कहॉं जाना चाहते हैं? यात्री ने कहा – मैं नहीं जानता। तब उस सज्जन व्यक्ति ने कहा – कोई भी सड़क ले लो क्या फर्क पड़ेगा, जब आप जानते ही नहीं हैं कि आपको कहॉं जाना है। कितनी सही बात है! क्या आप किसी भी बस या रेलगाड़ी में बैठ जाईंगे, बिना जाने कि यह कहॉं जा रही है? आपका जबाब नहीं में ही होगा। लेकिन जिंदगी के सफऱ का क्या? कभी सोचा है? या बस यूँ ही जिए जा रहे हैं।

मुझे समझ नहीं आता कि जिंदगी के सफर में बिना लक्ष्य के लोग चलने को तैयार क्यों हो जातें हैं? लक्ष्य वे सपने हैं जिन्हें हम निश्चित समय पर पूरी योजना के साथ हासिल करने का प्रयत्न करते हैं। अपने नाप से छोटे जूते पहनने वाले को अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचने की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए । ठीक इसी प्रकार छोटी सोच रखते हुए बिना लक्ष्य के आप अपनी जिंदगी के सफर में चलते तो रहेंगे पर पहुँचेंगे कहीं नहीं। और जब कभी एहसास होगा तो पता चला कि आप हॉस्पिटल के आई सी यू वार्ड में लेटें हों, और बहुत देर हो चुकी है।

यदि परमात्मा ने आपको थोड़ा भी सशक्त बनाया है तो अपने आसपास देखिए व जो भी मदद किसी गरीब व दुखी व्यक्ति की आप बिना परेशानी के कर सकतें हैं तो ज़रूर करिए। यही कार्य आपने जो कुछ भी हासिल किया है उसे सार्थकता प्रदान करेगा व आप अपने जीवन के सफर को भी इसी सुकून भरे कामों से पूरा कर पाईंगे।

लेखक ने पूर्व में अद्भुत श्रीमद्भागवत (मौत से मोक्ष की कथा) की रचना भी की है ।

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