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परंपराएं पितृ पक्ष में कौवों को भोजन कराने से प्रसन्न होते हैं पितर

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हिंदू धर्म में पितृपक्ष का काफी महत्व होता है। इस साल पितृपक्ष 20 सितंबर से 6 अक्टूबर तक चलेगा। पितृ पक्ष में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। इसके साथ ही इस दिन कौवों को भी भोजन कराया जाता है। इस दिन कौवों को भोजन कराना काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। पितृपक्ष में पितरों का श्राद्ध और तर्पण करना जरूरी माना जाता है, यदि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं करता तो उसे पितरों का श्राप लगता है। लेकिन शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध करने के बाद जितना जरूरी भांजे और ब्राह्मण को भोजन कराना होता है, उतना ही जरूरी कौवों को भोजन कराना भी होता है। माना जाता है कि कौवे इस समय में हमारे पितरों का रूप धारण करके पृथ्वी पर उपस्थित रहते हैं।

पितृ पक्ष में कौवों को भोजन कराने से जुड़ी एक पौराणिक कथा है। इन्द्र के पुत्र जयन्त ने ही सबसे पहले कौवे का रूप धारण किया था। यह कथा त्रेतायुग की है, जब भगवान श्री राम ने अवतार लिया और जयंत ने कौए का रूप धारण कर माता सीता के पैर में चोंच मारा था। तब भगवान श्री राम ने तिनके का बाण चलाकर जयंत की आंख फोड़ दी थी। जब उसने अपने किए की माफी मांगी।

तब भगवान राम ने उसे यह वरदान दिया कि तुम्हें अर्पित किया भोजन पितरों को प्राप्त होगा। तभी से श्राद्ध में कौवों को भोजन कराने की परंपरा चली आ रही है। यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष में कौवों को ही पहले भोजन कराया जाता है। कहा जाता है कि भगवान श्री राम के वरदान के कारण ही कौवों को न तो मारा जाता है और न ही किसी भी रूप से सताया जाता है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उसे पितरों के श्राप के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं के क्रोध का भी सामना करना पड़ता है और उन्हें जीवन में कभी भी, किसी भी प्रकार का कोई सुख और शांति प्राप्त नहीं होता है। पितर पक्ष के समय पंच बली जरूर निकालें- चींटी, गाय, कौआ, कुत्ता, देव बलि.. यह जरूर करना चाहिए।

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