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आज पुण्यतिथि : क्या हमने तिलक के अवदान का सही मूल्य नहीं आंका?

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गांधी नेहरू को उभारने के चक्कर में आधुनिक भारत के कर्मयोगी लोकमान्य तिलक के योगदान को दबा दिया गया।

सुदेश गौड़

बाल गंगाधर तिलक अपनी राष्ट्र भक्ति, देश के प्रति अपने अथक त्याग व बलिदान के लिए जाने जाते हैं। वामपंथी इतिहासकारों ने जानते-बूझते उन्हें इतिहास में यथोचित स्थान न देकर एक अक्षम्य अपराध किया है, महात्मा गांधी और पंडित नेहरू दोनों ही जानते थे कि तिलक के काल में कोई दूसरा ऐसा नेता नहीं है जिसे जनता उनसे (तिलक से) अधिक प्यार करती हो। जनता उन्हें ‘लोकमान्य’ कहकर पुकारती थी।

वे आधुनिक भारत के महानतम कर्मयोगियों में से थे। उन्होंने भारतवासियों को स्वराज्य के अधिकार का प्रथम पाठ पढ़ाया। सूरत में राष्ट्रीय कांग्रेस महाधिवेशन में फूट के सूत्रधार वे ही थे। संगठन में दो विचारधारा के लोग शामिल थे, एक वे जो अंग्रेजी साम्राज्य के प्रति वफादार रहते हुए अपनी सहूलियत के लिए कार्य करना चाहते थे। दूसरे वे जो अंग्रेजी तरीकों से ही अंग्रेजों को देश से बाहर निकालना चाहते थे।इन दो विचारधारा के राजनीतिक संगठनों में एक संगठन उदारवादी कहलाता था एवं दूसरा संगठन उग्रवादी विचारधारा का कहलाता था। इन दोनों गुटों नरम दल व गरम दल के मतभेद का स्पष्ट उजागर कांग्रेस के सूरत अधिवेशन 1907 में हुआ। उन्होंने ही इसकी योजना बनाई थी। उन्होंने ही इसका प्रचार किया और उन्होंने ही उस असाधारण आन्दोलन को दिशा दी थी।

श्रीमती ऐनी बेसेण्ट ने लिखा है, ‘यदि भारतवर्ष की जनता में राजनीतिक चेतना काफी मात्रा में होती तो तिलक क्रॉमवेल की भांति भारत में सफल नायक होते।’ ब्रिटिश पत्रकार व इतिहासकार सर वैलेण्टाइन शिरोल द्वारा तिलक को ‘भारतीय अशान्ति के जनक’ की उपाधि देना उस महान भूमिका का प्रमाण है जो तिलक ने नवीन राष्ट्रवाद के प्रचार करने में अदा की थी। राजनीति के सम्बन्ध में तिलक ने आदर्शवादी मार्ग नहीं अपनाया।

ब्रिटिश शासन के प्रति विद्रोह उनके अंग-अंग में निहित था। राष्ट्रीय आन्दोलन को नया जीवन प्रदान करने के लिए तिलक ने ‘गणपति उत्सव’ और ‘शिवाजी उत्सव’ प्रारम्भ किए। तिलक ने कहा था, भाट की तरह से गुणगान करने से स्वतन्त्रता नहीं मिल जाएगी। स्वतन्त्रता के लिए शिवाजी और बाजीराव की तरह साहसी कार्य करने पड़ेंगे। ‘जन-जागृति’ के लिए तिलक ने ‘मराठा’ तथा ‘केसरी’ नामक दो समाचार-पत्रों का सम्पादन किया। 1897 में उन्होंने दक्षिण के दुर्भिक्ष के समय जनता की बहुत सेवा की तथा किसानों से कर न चुकाने का आह्वान इन शब्दों में किया, ‘क्या आप इस समय भी साहसी नहीं बन सकते जबकि मौत आपके सिर पर नाच रही हो।’

1898 में पूना में प्लेग फैलने पर उन्होंने सरकारी अव्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी थीं। उनके लेखों से भावुक होकर एक युवक ने तत्कालीन प्लेग कमिश्नर रैण्ड व एक अन्य अंग्रेज अधिकारी आयर्स्ट को मार दिया था। फलस्वरूप तिलक पर ‘कत्ल के उत्तेजक’ के रूप में मुकदमा चलाया गया व 18 माह की सजा सुनाई गई थी। 1908 में उन्हें सरकार विरोधी लेख लिखने के अपराध में सजा हुई थी।

स्वतंत्रता संग्राम में तिलक की भूमिका अतुलनीय है। सर्वप्रथम तिलक ने भारतीय जनता को ‘अवज्ञा का सिद्धान्त प्रदान किया, जो स्वराज्य प्राप्ति में सहायक बना।Ó उदारवादी नेताओं के विपरीत तिलक राजनीतिक अधिकारों व सुधार के लिए सरकार पर दबाव डालना चाहते थे। उनका मत था कि यदि स्वराज्य संवैधानिक साधनों से प्राप्त नहीं होता है, तो हिंसात्मक साधनों को प्रयोग करने में कोई बुराई नहीं है।

वे मानते थे कि साध्य की पवित्रता साधन को भी पवित्र बना देती है, इसलिए वे राजनीतिक भिक्षावृत्ति की नीति को बदलने को कहते थे। तिलक का कहना था कि ‘विदेशी शासन चाहे कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो, पर वह स्वशासन से श्रेष्ठ नहीं हो सकता।’ गांधीजी ने तिलक की मृत्यु के बाद जो आन्दोलन किए वे सब तिलक ने पहले ही कर लिए थे। तिलक की विचारधारा, साहित्य, स्मारक आज भी गांधी-नेहरु के प्रभुत्व में दबकर घुटन महसूस करते हुए यथोचित सम्मान पाने के लिए अनवरत प्रतीक्षा कर रहे हैं।

(पांचजन्य)

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