Home लेख आज देवशयनी एकादशी: देव के सोने से चराचर में परिवर्तन की प्रक्रिया

आज देवशयनी एकादशी: देव के सोने से चराचर में परिवर्तन की प्रक्रिया

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  • अशोक प्रवृद्ध


आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखने तथा अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष प्राप्ति और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाली देवशयनी एकादशी को पद्मनाभा, देवउठनी एकादशी, विष्णु-शयनी एकादशी, आषाढ़ी एकादशी तथा हरिशयनी एकादशी भी कहा जाता है।

पौराणिक मान्यतानुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के इस दिन से भगवान विष्णु चार मास के लिए बलि के द्वार पर पाताल लोक में निवास करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से ही चौमासे का आरम्भ माना जाता है। इस दिन से भगवान विष्णु चार मास के लिए क्षीरसागर में शयन करते हैं। इसी कारण इस एकादशी को हरिशयनी एकादशी तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं। आषाढ़ की इस एकादशी से देवदिवाली या कार्तिक एकादशी तक के समय को चातुर्मास कहा जाता है।

इन चार महीनों में भगवान विष्णु के क्षीरसागर में शयन करने के कारण विवाह आदि संस्कार के कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता। धार्मिक दृष्टि से यह चार मास भगवान विष्णु का निद्रा काल माना जाता है। इन दिनों में तपस्वी भ्रमण नहीं करते, वे एक ही स्थान पर रहकर तपस्या करते हैं, जिसे चातुर्मास व्रत के नाम से जाना जाता है। इन दिनों केवल ब्रज की यात्रा की जा सकती है, क्योंकि इन चार महीनों में भू-मण्डल अर्थात पृथ्वी के समस्त तीर्थ ब्रज में आकर निवास करते हैं।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में इस एकादशी का विशेष माहात्म्य अंकित करते हुए कहा गया है कि इस व्रत को करने से प्राणी की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, सभी पाप नष्ट होते हैं तथा भगवान हृषिकेश प्रसन्न होते हैं। यूँ तो वर्ष के सभी एकादशियों को भगवान विष्णु की पूजा-आराधना की जाती है, परंतु आषाढ़ शुक्ल एकादशी की रात्रि से भगवान का शयन प्रारम्भ होने के कारण उनकी विशेष विधि-विधान से पूजा किये जाने का विधान है।

इस दिन उपवास करके भगवान विष्णु की प्रतिमा को आसीन कर उनका षोडशोपचार सहित पूजन कर उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म सुशोभित कर उन्हें पीताम्बर, पीत वस्त्रों व पीले दुपट्टे से सजाया जाता है। पंचामृत से स्नान करवाकर, तत्पश्चात् भगवान की धूप, दीप, पुष्प आदि से पूजा कर आरती उतारी जाती है। भगवान को पान (ताम्बूल), सुपारी (पुंगीफल) अर्पित करने के बाद निम्न मन्त्र द्वारा स्तुति की जाती है- सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जमत्सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्व चराचरम्।। अर्थात- हे जगन्नाथजी! आपके निद्रित हो जाने पर संपूर्ण विश्व निद्रित हो जाता है और आपके जाग जाने पर संपूर्ण विश्व तथा चराचर भी जाग्रत हो जाते हैं।

इस प्रकार प्रार्थना करके भगवान विष्णु का पूजन करने के पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं फलाहार में रहकर रात्रि में भगवद्भजन व स्तुति कर भगवान के मंदिर में ही स्वयं सोने से पूर्व भगवान को भी शयन करकर शयन करना चाहिए। इस दिन अनेक परिवारों में महिलाएं पारिवारिक परम्परानुसार देवों को सुलाती हैं। इन चार महीनों के लिए अपनी रुचि अथवा अभीष्ट के अनुसार नित्य व्यवहार के पदार्थों का त्याग और ग्रहण करना चाहिए। मधुर स्वर के लिए गुड़ का, दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का, शत्रुनाशादि के लिए कडुवे तेल का, सौभाग्य के लिए मीठे तेल का और स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का त्याग करना चाहिए ।

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