Home लेख संस्कृति के हनन के खिलाफ खड़े होने का समय : हिंदुत्व पर...

संस्कृति के हनन के खिलाफ खड़े होने का समय : हिंदुत्व पर फिल्मकारों का खंजर

208
0

गगन चौकसे

मूकदर्शक : सिनेमा भारतीय संस्कृति पर हर हफ्ते ही वज्रपात करता रहा है और दर्शक ने उसे क्यों इजाजत दें, यह सवाल स्वाभाविक है। दर्शक लवजिहाद देखता गया, निर्देशक दिखाते रहे। दुनिया के किसी भी देश में कोई अपनी धर्म विरोधी फिल्म नहीं देखता न कोई बना सकता है। अमिताभ से लेकर कई बड़े सितारे यह कहते हुए दिखाए गए कि वो भगवान को नहीं मानते, पर क्या कोई मुस्लिम किरदार यह कह पाया कि वो अल्लाह को नहीं मानता। यह संयोग नहीं, एक सफल प्रयोग था। ऐसी फिल्म का हिट हो जाना ही भारतीय पर कुठाराघात है। हमने तालिया बजाईं चिल्लर लुटाई और अपनी संस्कृति की इज्जत भी। सवाल सेंसर बोर्ड पर भी उठता ही है कि उसने हिंसक दृश्यों पर हजारों बार कैंची चलाई मगर देश की संस्कृति पर हमला होता गया, और वो चुप क्यों रहा? अब समय है कि दर्शक मूकदर्शक न बनें और स्वयं संस्कृति के हनन को न देखे। ऐसा देश और संस्कृति विरोधी फिल्म का टिकट खरीदना देश की संस्कृति की हत्या की ‘सुपारी देना है।


किसी देश को यदि नष्ट करना है तो उसकी संस्कृति को नष्ट कर दीजिए, वो स्वत: ही समाप्त हो जायेगा। सिनेमा समाज का आईना है, भारत की संस्कृति, सभ्यता धर्म, परिवार, सदाचार मर्यादा हमारा वैभव है। और गौरव भी। विचारणीय और चिंतनीय है कि विश्व की सबसे महानतम संस्कृति को धीरे-धीरे ‘हरे और फिरंगी रंग से ढंका गया और हमें पता ही नहीं चला। सिनेमा के 100 बरस से ज्यादा के इतिहास को टटोल कर देखें तो चलचित्र ही बता देंगे कि कितनी सफाई से हमारी संस्कृति परदे पर बेपर्दा हुई है। हमारी शुरुआत हरिश्चंद्र के पावन चरित्र से हुई थी, जब दादा साहब फाल्के ने देश को सद्चरित्र वाला चलचित्र देकर भारतीय सिनेमा की नींव रखी लेकिन दुर्भाग्यवश 1970 के आते-आते संस्कृति के हृास, परिहास और उपहास को फिल्मकारों ने फिल्मी स्टाइल में मैं,परदे पर उतारा। फिल्म में परिवर्तन या कहे आधुनिकता के नाम पर पाश्चात्यकरण इतनी तेजी से हुआ कि 1970 के बाद कपड़े कम और नग्नता बढ़ती गई। कहानी के नाम पर तो कभी दर्शकों की मांग पर निर्माता निर्ममता से संस्कारों का चीरहरण करते गए और दबेपाँव एक मानस देश में स्थापित हो गया कि ‘आजकल सब चलता हैÓ चाल-चलन से लेकर देह प्रदर्शन और फिर शुरू हुआ एक अन्धाण्धुुन्ध हिंसा और हिन्दू संस्कृति का माखौल बनाने का षडयंत्र जो आज भी जारी है।

लंकादहन से संस्कृति दहन तक सिनेमा

दादा फाल्के भारतीय सिनेमा के विधाता, व्याख्याता, निर्माता थे। उन्होंने हर फिल्म में भारत को दिखाया, समझाया। पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र भारत का चलचित्र नहीं चरित्र था। फिर उन्होंने धर्म, शिक्षा के कथानक रचे जो सत्यकथा पर आधारित थे। धीरे-धीरे सिनेमा रंगमंच देश को लुभाने लगा और एक विशुद्ध भारतीय चित्रपट का जन्म हुआ। हमारा वैभव, जीवन मूल्य और संस्कृति। फाल्के युग में मोहिनी भस्मासुर, सत्यवान सावित्री, लंका दहन, श्रीकृष्ण जन्म, कलिया मर्दन, बुद्धदेव बालाजी निम्बारकर, भक्त प्रहलाद, भक्त सुदामा, रूक्मिणी हरण, रूक्मांगदा मोहिनी, द्रौपदी वस्त्रहरण, हनुमान जन्म, नल दमयंती, भक्त दामाजी, परशुराम, श्रीकृष्ण शिष्टईं, काचा देवयानी, चन्द्रहास मालती माधव वसंत सेना, बोलती तपेली, संत मीराबाई इत्यादि फिल्में जनमानस के लिए बनाई गई, सराही गईं। दादा साहब फाल्के द्वारा निर्देशित बोलती फिल्म रावण के पाप की लंका को जलाने वाली रामायण पर फिल्म बनाई गई। फिल्म का उद्देश्य यह बताना था कि पाप को श्री हनुमानजी कैसे जलाते है। ब्लैंक एंड व्हाइट युग में कई कहानी अच्छी भी बनीं जिनमें भगतसिंह पर शहीद, विमल रॉय की बंद्रिनी और दोस्ती जैसी फिल्म सकारात्मक ऊर्जा और स्वस्थ मनोरंजन की निशानी थीं। लेकिन हर दूसरी फिल्म की कहानी कामुकता, भारतीय संस्कृति को ढोंग कहकर रची गई। इस 100 बरस के सिनेमाकाल में सूरज आर बडज़ात्या अकेले ऐसे फिल्मकार है जिन्होंने भारतीय संस्कृति को हद तक अँधेरे से बचाया। इस बीच हर दशक में नए नए बैनर संस्कृति पर जिहादी हमला करते रहे। वामपंथी कलम से हिन्दू संस्कृति का सिर ‘सरेआम कलम होना शुरू हुआ। मुगले आजम से लेकर ‘जोधा अक बर को योद्धा बनाया और बताया गया। मिशन कश्मीर का आतंकवादी नायक बना, खालिद मोहम्मद की फिल्म फिजा में आतंकी ही हीरो है, पी.के. का आमिर खान हिन्दू देवताओं का मजाक उड़ाता है। इसी दशक में आई पदमावत का विलेन लुटेरा खिलजी ज्यादा सशक्त दिखाया गया और उसकी भूमिका को बड़ा करने के लिए उस पर एक गाना भी है ताकि राजा रतन सिंह (शाहिद कपूर) को बौना दिखाया जा सके। अगर विरोध के चलते सीन न कांटे होते तो खिलजी को भारतीय सिनेमा और इतिहास का ‘हीरो बना दिया जाता। वामपंथी लेखक का भिन्न भिन्न तरीके से भिनभिनाता मधुमक्खी का छत्ता संस्कृति के सुन्दर चेहरे पर हमला करता गया और जन्म हुआ कामुक और इस्लामिक जिहाद का अब भारतीय संस्कृति पर दोहरा घात था। ऐसे-ऐसे कथानक ‘रचेंÓ गए जो भारतीय संस्कृति के खिलाफ थे।

वामपंथी और इस्लामिक फिल्मकार फि़ल्म को अपने तरीके से रचते थे। कुछ फिल्म तो सीधे इस बात की पुष्टि करती है जिनका शीर्षक ही हिंदुत्व के लिए अपमानजनक था इनके नाम है ‘गुनाहों का देवता फिर डरावनी फि़ल्म बनी नाम था ‘काला मंदिर बताइए क्या गैर इस्लामिक देश तक में कोई ‘काली मस्जिद नाम से फिल्म निर्माण की कल्पना कर सकता है यकीनन नही। एक और भयानक फि़ल्म आई नाम था ‘पुराना मंदिर, एक और बड़ी फिल्म जिसका नाम था ‘राम तेरी गंगा मैली फिल्मकार बड़ी लोमड़ी बुद्धि से ये कहने में कामयाब रहा कि हे राम तुम्हारी गंगा तो मैली है पवित्र नही।

संस्कृति का अंत तुरन्त

हर फिल्म में हिन्दू नायक लड़कियों को पटाने के लिए, भगाने के लिए उतावला दिखाया गया है। राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर में गुरु शिष्य की मर्यादा तार तार कर दी गई। साधु चोर है और मौलवी तो मन्नत के धागे बाँधकर हिंदुओ को इस्लाम से ‘बांधता हुआ दिखाया गया है। सफल रही है शुद्ध भारतीय फिल्में आंकड़े गवाह हंै की ‘राजा हरिश्चंद्रÓ से लेकर ‘बाहुबली तक हर दशक में भारतीय मूल्यों की धार्मिक और मार्मिक तथा पारिवारिक कहानी सुपर हिट रही है। ये इस बात पर मुहर लगाता है की दर्शक भारतीय संस्कृति को पसंद करता है, स्वीकार करता है, सरोकार करता है। सोरराज आर बडज़ात्या की नदिया के पार हो या हम आपके है कौन दोनों कमाई में आगे रही। शोले और जय संतोषी माँ की तुलना करे तो जय संतोषी माँ जैसी छोटे बजट की फिल्म ने शोले को कमाई के मामले मैं पीछे छोड़ा था। गुलशन कुमार के भक्ति संगीत ने नए आयाम दिए, एक सफल धार्मिक सिनेमा का जन्म हुआ। आज भी दक्षिण भारतीय सिनेमा में भारतीय संस्कृति के विषय को केंद्र में रखकर बनाई गई कहानी बड़ी सफलता की निशानी है। राष्ट्रवाद पर बनी फिल्म 2000 के दशक मैं आई लीजेंड ऑफ़ भगतसिंग, फिर 2020 में ‘तान्हाजी बड़ी हिट फिल्म रही। उरी और केसरी ने पारिवारिक दृश्यों के साथ रिकॉर्ड बनाये। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है। कि फिल्मकार ने गलत चीजें ज्यादा परोसीं या कहें कि नशे की लत डालना चाहते थे वामपंथी लेखक या फिल्मकार।
(फिल्म समीक्षक एवं स्तंभकार)

Previous articleरोड शो में सेल्फी ले रहे कार्यकर्ता को जया बच्चन ने मारा धक्का
Next articleहमारे देश के प्रबुद्ध वर्ग का मौन समझ से परे है : क्या हम राष्ट्रधर्म का निर्वाह कर रहे हैं ?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here