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खुली आँखों से सच देखने और दिखाने का समय

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  • मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार का विश्लेषण करने के तमाम परंपरागत मानदंडों के बीच यह देखना प्रासंगिक है


केन्द्रीय मंत्रिमंडल के इस ताजा बदलाव का मोटा निष्कर्ष तो यह है कि मोदी सरकार व्यक्ति के कद से कम, उसकी परफोर्मेंन्स से अधिक प्रभावित होती है । यही नही वे युवा और प्रतिभावान व्यक्तियों का सही स्थान और समय पर उपयोग करना भी जानती है । ऐसा होगा नहीं, पर कांग्रेस और शेष विपक्षी पार्टियाँ अपनी दुर्गति पर विचार करते समय यदि इस तथ्य पर गौर करे तो वह लाभदायक हो सकता है ।

  • प्रो. जी.एल. पुणताम्बेकर

मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार का विश्लेषण करने के तमाम परंपरागत मानदंडों के बीच यह देखना प्रासंगिक है कि मंत्रिमंडल में किये गए बदलाव राष्ट्र के समक्ष (भारतीय जनता पार्टी के समक्ष नहीं) खड़ी बड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए कितने कारगर होंगे? इस बदलाव के बाद विश्लेषक अपने-अपने मानदंडों के अनुरूप गुण-दोष निकालेंगे क्योंकि एक लम्बे समय से राजनीति में जाति, क्षेत्र, सहयोगी पार्टियों और ताकतवर साथियों के लिए मजबूरी में किये गए समझौते ही आलाकमान के निर्णयों के आधार रहे हैं ।

शायद इसीलिये आपने देखा होगा कि इस बदलाव के बाद यही गणित बताया गया कि कितने मंत्री ओबीसी या एस सी /एस टी कोटे से हैं और किस राज्य और पार्टी से कितने मंत्री हैं। । हटाये गए मंत्रियों के बारे में भी अभी अनेक सही-गलत बातें फैलाकर मोदी के निर्णय के विषय में भ्रम फैलाये जायेंगे परन्तु क्या ऐसा नहीं लगता कि विपक्षी दलों के साथ विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग न तो अपने परम्परागत मानदंडों के बाहर सोच रहा है और न ही यह मान रहा है कि मोदी-शाह की जोड़ी का नवाचार और निर्णय लेने की दृढ़ता जनता को भा रही है। इस समय तो मोदी सरकार के इस बदलाव के निहितार्थों का आकलन यह जानने के लिए करना ही उपयोगी है कि इनसे भारत के समक्ष दृश्य और अदृश्य चुनौतियों से निटपने के लिए क्या सहायता मिल सकती है?

केन्द्रीय मंत्रिमंडल के इस ताजा बदलाव का मोटा निष्कर्ष तो यह है कि मोदी सरकार व्यक्ति के कद से कम, उसकी परफोर्मेंन्स से अधिक प्रभावित होती है। यही नही, वह युवा और प्रतिभावान व्यक्तियों का सही स्थान और समय पर उपयोग करना भी जानती है। ऐसा होगा नहीं, पर कांग्रेस और शेष विपक्षी पार्टियाँ अपनी दुर्गति पर विचार करते समय यदि इस तथ्य पर गौर करें तो वह लाभदायक हो सकता है।

इस बदलाव के सम्बन्ध में कुछ विश्लेषक चार कद्दावर नेताओं को मंत्रिमंडल से हटाने से मोदी सरकार की चुनौतियां बढऩे का मुगालता भी पाल सकते है पर जो लोग मोदी की कार्य शैली को जानते हैं, उन्हें यह आशंका नही होनी चाहिए। इतिहास गवाह है कि आडवानी, मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा जैसे दिग्गजों को किनारा करने और उसके बाद के काम और उसके परिणाम यह बताते हैं कि न तो मोदी का लक्ष्य छोटा होता है और न ही रणनीति कमजोर। कोई आश्चर्य नहीं कि हटाये गए लोगों के लिए कोई और भी महत्वपूर्ण कार्य मोदी ने सोच रखा हो और उसे देकर वे फिर विरोधियों के मुगालतों पर पलीता लगा दें ।

मंत्रिमंडल के इस फेरबदल के राजनैतिक निहितार्थ नही होंगे, यह कहना तो ठीक नहीं है पर क्या अश्विनी वैष्णव जैसे व्यक्तियों के उपयोग से देश के स्थापित सरकारी तन्त्र में बड़ा बदलाव लाने की सोच काबिले तारीफ नहीं है? क्या इस कवायद से यह नही लगता कि आर्थिक-सामजिक बदलाव के लिए युवा चेहरों के कन्धों पर जिम्मेदारी देने की सोच ही मोदी की दिनों- दिन बढ़ती मजबूती और जनता के बीच लोकप्रियता का कारण है ? ऐसा नही है कि इस बदलाव से सब सध जायेगा। वास्तव में, मोदी की कार्यशैली में जिम्मेदारी के साथ सतत निगरानी भी है। इससे भी बढ़कर यह कि अब नए चेहरों पर परिणाम देने का दबाव भी होगा क्योंकि यह साबित हो गया है कि मोदी की प्रमोशन लिस्ट केवल परफोर्मेंन्स से ही बनती है।

इस बदलाव के पीछे की रणनीति में देश और पार्टी के सामने की चुनौतियां थी, यह भी बदलावों की प्रकृति से सहज समझा जा सकता है। बंगाल में अपेक्षित सफलता न मिलने और इससे देश के सामाजिक ताने- बाने के सामने जातिगत विद्वेष के साथ आगामी चुनाव बदलाव की बिसात में जरूर निर्णायक रहे होंगे। यही नहीं, हमारे चारों तरफ घट रही घटनायें, उनके उलझे षड्यंत्र और राजनीति की देशी-विदेशी साजिशों ने आज यह जरुरत पैदा की है कि विविध स्तरों पर तीव्र गति से और कठोर निर्णय लिए जाएँ पर बात यहीं समाप्त नही होती।

प्रजातंत्र में जब तक जनता का शासन पर प्रभावी अंकुश नही होता, तब तक सत्ता बेलगाम ही रहती है । हम मोदी पर चाहे जितना भरोसा करें, पर प्रजातंत्र की यह लगाम हमेशा कसी रहनी चाहिए। आम जनता की दृष्टि से तो आज का समय हर उस सच को खुली आँखों से देखने और दिखाने का है जो भले ही अप्रिय लगे, पर देश को एक राष्ट्र के रूप में मजबूत करने के लिए आवश्यक है। एक लम्बे समय तक सत्ताधीश और उनके षड्यंत्रकारी सहयोगियों ने जनता को सच से महरूम करके अपने स्वार्थ सिद्ध किये परन्तु जब आधुनिक तकनीक और उनसे जुड़े बदलावों ने जानकारी के स्रोतों पर सत्ताधीशों के एकाधिकार को समाप्त किया और दूरदराज के गाँवों तक जानकारियों की पहुँच बढ़ गई। तकनीक से लेस और उसके माध्यम से गवर्नेस वाली यह सरकार वर्ष दर वर्ष ऐसे ही बदलावों से देश की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाएगी, यह उम्मीद ताजा बदलावों की प्रकृति और नीयत से लगाईं जा सकती है ।

अब बात प्रजातंत्र के उस पहलू की, जिसे एक लम्बे समय से हमारे देश ने भुला दिया था और 2014 के बाद उसमें अनुकूल बदलाव आया और इसका स्पष्ट प्रभाव देश की प्रतिष्ठा पर पड़ा। यह है एक जागरूक नागरिक का बदलाव के लिए वोट जिसने दशकों से जारी जाति-धर्म और अगड़े-पिछड़े की राजनीती को हाशिये पर ला दिया। चुनाव दर चुनाव यह प्रकट भी हो रहा है और मोदी को मजबूत भी कर रहा है। मोदी विरोधी या तो इसे समझ नही रहे हैं या समझना नही चाहते। वे तो भोथरे अस्त्रों से मोदी के खिलाफ जंग कर रहे है और इसीलिये मोदी उन्हें अजेय बनते जा रहे है। मोदी ने तो केवल जनता की नब्ज़ पकड़ी है और उसी के सहारे बड़े- बड़े निर्णय लिए और आने वाले समय में भी लेंगे। इस भगीरथ कार्य में इस मंत्रिमंडल विस्तार से उन्होंने अपनी टीम की जमावट को आगामी चुनौतियों के हिसाब से पुनर्गठित किया है और ये ही एक कुशल और सफल सेनापति के लक्षण है।

प्रजातंत्र में जनता केवल अनुयायी ही नही होती, उसे समर्थन के साथ नेतृत्व पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी भी होती है और इसके लिए हमें खुली आँखों से सच को देखने और दिखाने का दायित्व निभाना होगा। यह दायित्व इसलिए अहम् है कि आज जब देश तेजी और शक्ति से अपनी कमजोरियों से उबार रह है तब देशी विदेशी ताकतें इन प्रयासों को असफल करने में लगी है। इसकी सबसे बड़ी बानगी न्यूयार्क टाइम्स का अपने संवाददाता के लिए जारी किया गया ताजा विज्ञापन है जिसमे उन्होंने मोदी और भारत विरोधी विचारधारा वाले पत्रकारों के चयन के लिए आवेदन आमंत्रित किये हैं जिसमें उन्हें अपराधी पृष्ठभूमि वाले लोग भी स्वीकार्य हैं। क्या इस प्रकार के खतरों के बीच दृढ़ता से आगे बढ़ते मोदी के समर्थन का हमारा दायित्व नही बनता? बेशक हम कुछ मामलों में मोदी के विरोधी हो सकते हैं पर न्यूयार्क टाइम्स की तर्ज पर नहीं ही होंगे, यह भरोसा किया जा सकता है।

(लेखक वरिष्ठ प्राध्यापक व विश्लेषक हैं। )

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