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सार्वजनिक जीवन में शुचिता के उपायों का समय

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अब तो देश के अपराधी गिरोह ही नहीं विदेशी ताकतें , कम्पनियां राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने लगी हैं । आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में नेताओं , अधिकारियों और उद्योग व्यापार से जुड़े लोगों के लिए आचार संहिता नियम कानूनों का पालन आवश्यक है । उम्मीद की जानी चाहिए कि आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में अगले चुनावों से पहले सार्वजनिक जीवन में शुचिता और नए मानदंडों के लिए संसद अथवा सर्वोच्च अदालत कोई कड़ा निर्णय लागू करवाए ।

आलोक मेहता, आई टी वी नेटवर्क इंडिया न्यूज और आज समाज के संपादकीय निदेशक
aloakmata7@gmail.com

यह बात किसी फिल्मी दृश्य की नहीं है । 1989 के चुनाव के दौरान मैंने अपने एक अनुभवी संवाददाता दिवाकर को बिहार की मुंगेर जेल में रहते हुए चुनाव लड़ रहे एक प्रमुख उम्मीदवार से इंटरव्यू के लिए भेजा। दिवाकर पटना से मुंगेर पहुंचे और दोपहर करीब 12 बजे जेलर के कक्ष में पहुंचे। जेलर की कुर्सी पर सादे कुर्ते पाजामे में बैठे रौबदार व्यक्ति ने हड़काते हुए पूछा – ‘बोलो क्या बात है ? क्या काम है ? किससे मिलना हैं ? दिवाकरजी ने कहा – सर मुझे इस बार चुनाव लड़ रहे नेताजी से मिलना है , जो आपकी जेल में बंद हैं । ‘कुर्सी पर बैठे व्यक्ति ने कहा – बताओ क्या बात करना है? ‘ हमारे पत्रकार का धैर्य टूटने लगा ।

उन्होंने कहा – श्रीमानजी मैं देश के एक बड़े अखबार का संवाददाता हूं, यह मेरा परिचय पत्र है, प्रदेश सरकार और जिलाधिकारी की अनुमति लेकर आया हूं । आप उनसे बात करने के लिए बुला दें या मुझे उनकी कोठरी तक जाने दें । ‘ कुर्सी पर बैठे व्यक्ति ने थोड़ा डांटने के अंदाज में कहा – ‘मैं कब मना कर रहा हूं । बोलो क्या पूछना है। मैं तुम्हारे सामने ही तो बैठा हूं । चुनाव लड़ रहा हूं , क्या वह भी गुनाह है? दिवाकरजी को समझ में आया कि जेलर की कुर्सी पर कैदी यानी नेता विराजमान हैं । उस जमाने में टी वी न्यूज चैनल नहीं थे और अखबारों में भी रंगीन फोटो कम छपते थे । बाहुबली नेता बिहार की एक बड़ी पार्टी से पहली बार उम्मीदवार थे। इसलिए तत्काल पहचान नहीं पाए थे । बहरहाल उन्होंने इंटरव्यू किया। बाहर निकलकर एक वर्दीधारी पुलिसकर्मी से पूछा – ‘भाई ये जेलर साहब कहां हैं ? उसने सहजता से बताया -‘अंदर जेल के किचन में नेताजी के खाने पीने का इंतजाम कर रहे हैं । लेकिन आप वहां नहीं जा सकते हैं। ‘

दिवाकर ने कहा – नहीं अब मुझे उनसे नहीं मिलना है। वह लौटकर आए। पूरा विवरण मुझे बताया और आंखों देखा हाल और बातचीत अखबार में विस्तार से प्रकाशित कर दी । नेता और पार्टी को कोई नाराजगी नहीं हुई । शायद इस बहाने उम्मीदवार के प्रभाव का प्रचार हो गया । प्रदेश या केंद्र की सरकार ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त क । वह कैदी उस बार तो नहीं, अगली बार चुनाव भी जीत गए। सत्ता में आने पर उनके अपराधों का प्रकरण भी धीरे-धीरे कमजोर कर दिया गया होगा । यह हमारे लिए पहला मामला था । पिछले तीन दशकों में ऐसे कई बाहुबली बाकायदा चुनाव लड़कर सत्ता या प्रतिपक्ष में प्रभावशाली हुए हैं ।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया है कि भविष्य में उच्च अदालत की अनुमति के बिना किसी प्रकरण को कोई सरकार वापस नहीं ले सकेगी । इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का एक और दिलचस्प आदेश सामने आया है। देश के सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद दो नामी बिल्डर को मुंबई की आर्थर रोड और तलोजा सेन्ट्रल जेल में स्थानांतरित करने का आदेश दिया है। असल में भारत सरकार के प्रवर्तन निदेशालय ने अदालत को बताया कि गंभीर आर्थिक अपराध के लिए कभी पे-रोल पर निकलकर ये लोग एक गुप्त भूमिगत दफ्तर से अपने अधिकारियों तथा अन्य लोगों से मिलकर अपने दस्तावेजों की गड़बड़ी तथा अन्य काली कमाई का धंधा कर रहे हैं । इन्होंने देश-विदेश में करोड़ों रुपयों का धन शोधन कर रखा है।

जेल में रहते हुए भी यह अपना बिजनेस और अपराध के सबूत मिटवाने की कोशिश करते रहते हैं। इस गंभीर प्रामाणिक रिपोर्ट पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाकर दिल्ली के पुलिस आयुक्त को जांच करके दो सप्ताह में अपनी रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करने को कहा है । नेता , पुलिस और अपराधियों के गठजोड़ पर बीस साल से पहले एक उच्च स्तरीय कमेटी की विस्तृत रिपोर्ट आई थी, लेकिन सरकारों ने न उसका पूरा विवरण जारी किया , न ही आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के चुनावों से अलग रखने के लिए कठोर प्रावधान किये।

बीस साल पहले 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह व्यवस्था दी थी कि भ्रष्टाचार के अपराध में निचली अदालत में दोषी पाए जाने के बाद ऊंची अदालत द्वारा बरी किये जाने के बाद ही किसी व्यक्ति को सरकार के किसी पद पर काम करने की अनुमति होनी चाहिए। लेकिन इसके बाद भी जयललिता और लालू यादव जैसे कई नेता प्रदेशों और केंद्र में महत्वपूर्ण पद पाते रहे। नतीजा यह हुआ कि ऊंची अदालत में वर्षों तक सुनवाई का आधार बनाकर कई दोषी नेता सत्ता में आकर मनमानी, भ्रष्टाचार और ज्यादतियों के साथ ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों को ही तबादलों तथा अन्य तरीकों से परेशान करते हैं। महाराष्ट्र में तो पिछले महीनों के दौरान पुलिस आयुक्त सहित इनकाउंटर पुलिसकर्मी और वरिष्ठ मंत्री अनिल देशमुख के गठजोड़ का गंभीरतम आरोप ही नहीं लगा, प्रमाण आने पर इस्तीफे और गिरफ्तारी हुई है ।

इस तरह के मामलों के लिए चुनाव आयोग ने बहुत पहले अन्य सुधारों के साथ यह सिफारिश की हुई है कि अदालत में चार्जशीट दाखिल होने के बाद ही नेताओं के चुनाव लडऩे पर प्रतिबन्ध लग जाना चाहिए । बाद में अदालतों से दोषमुक्त साबित होने पर भले ही वे चुनाव लड़ लें। लेकिन इस सिफारिश को किसी केंद्र सरकार, पार्टी और संसद ने अब तक स्वीकार नहीं किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद राजनेताओं पर गंभीर आपराधिक मामलों के लिए विशेष अदालत में समयबद्ध सुनवाई का सुझाव दिया था। लेकिन अदालतों में जजों की ही भारी कमी और हजारों लंबित मामलों के कारण यह काम भी अब तक संभव नहीं हुआ है।

राजनीति में गन्दगी से सामाजिक आर्थिक क्षेत्र में भी गड़बडिय़ां होती हैं । अब तो देश के अपराधी गिरोह ही नहीं विदेशी ताकतें, कम्पनियां राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने लगी हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में नेताओं, अधिकारियों और उद्योग व्यापार से जुड़े लोगों के लिए आचार संहिता नियम कानूनों का पालन आवश्यक है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में अगले चुनावों से पहले सार्वजनिक जीवन में शुचिता और नए मानदंडों के लिए संसद अथवा सर्वोच्च अदालत कोई कड़ा निर्णय लागू करवाए ।

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