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बाघ: हमारी लोक संस्कृति का नायक

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मानव ने हमेशा से ही बाघ को वीरता और देवत्व भाव से देखा है, वहीं बाघों ने भी मनुष्यों को सदैव अपनी प्रकृति भोजन श्रंखला से परे एक जीवन के तौर पर देखा है। हमारी धार्मिक मान्यताओं में बाघ आदिशक्ति का वाहक है। वनवासियों में बाघ को देवता के रूप में निरूपित किया गया है और इसकी पूजा भी होती है।

जयराम शुक्ल

चीन भले ही अपने काल्पनिक/भुतहे ड्रैगन(अजदहा) को लेकर इतराता रहे लेकिन हम वास्तव में ‘बाघों के देश’ हैं। विश्व बाघ दिवस की पूर्व संध्या पर सरकार ने भारत में बाघों को लेकर जानकारी साझा की है, जिसके अनुसार भारत में बाघों की संख्या बढ़कर 2963 पहुँच गई जो विश्व की 70 प्रतिशत है। यह आँकड़े 2018 की बाघ गणना के निष्कर्ष हैं। वर्ष 2000 से 2014 का अंतराल बाघों की सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संकटपूर्ण रहा। 2006 बाघों की संख्या घटकर 1411 हो गई थी। यह वही दौर था जब राजस्थान के सरिस्का और मध्यप्रदेश का पन्ना टाइगर रिजर्व बाघविहीन हो चुका था। पन्ना टाइगर रिजर्व में तो 2009 में बाघों का पुनर्वास किया गया।

पन्ना की यह घटना वन्यजीव जगत की अनोखी है, जहां कैपटिव टाइगर को वाइल्ड बनाया गया। आज पन्ना टाइगर इसकी बड़ी दिलचस्प कहानी है, अलग से सुनने सुनाने लायक। बाघों की संख्या 6 प्रतिशत के मान से बढ़ रही है इसके मद्देनजर सरकार को कुछ और टाइगर रिजर्व बनाने की योजना पर विचार करना पड़ रहा है। बाँधवगढ़ नेशनल पार्क व टाइगर रिजर्व को विश्व की सबसे घनी बाघ आबादी का गौरव बरकरार है। नेशनल जियाग्रफी और डिस्कवरी में दिखने वाला हर दूसरा बाघ यहीं का है। बाँधवगढ़ नेशनल पार्क की कोर एरिया और बफर में बाघों की संख्या बढ़कर 124 हो गई है।

इधर 2010 तक बाघविहीन रहे संजय नेशनल पार्क में भी अब 12 से 14 बाघ बताए जाते हैं। कान्हा-बाँधवगढ़-पन्ना और संजय नेशनल पार्क में बाघों का कारीडोर प्रस्तावित है लेकिन जरूरत इन्हें तत्काल जोडऩे की है, नहीं तो बाघों की बढ़ती आबादी से जल्दी ही एक नया संघर्ष शुरू होने वाला है। जंगल में टेरीटरी बनाने के लिए और गाँवों को उस दायरे में शामिल करने के लिए।

भारत में बाघकथा बड़ी दर्दनाक रही है। सबसे पहले मुगलों ने बाघों के शिकार की परंपरा को नबावी बनाया। फिर अँग्रेजों ने इसे खेल में बदलते हुए गेम सेंचुरी का नाम दे दिया। यह गेम सेंचुरी देसी राजे-रजवाड़ों के प्रबंधन में शुरू हुई। आजादी के पहले तक भारत में गेम सेंचुरी का कारोबार 445 करोड़ रु. सालाना का था। विदेशों की टूर एवं ट्रेवेल एजेंसियां इसे संचालित करती थीं। राजाओं, इलाकेदारों के लिए यह व्यवसाय की भाँति था। ये शिकार अभियानों के साथ ही बाघ के शिरों की ट्रॉफी और उसकी खाल, नाखून व हड्डियों का व्यापार करते थे। यह सिलसिला 1972 तक चलता रहा जब तक कि वन्य संरक्षण कानून अस्तित्व में नहीं आया। शिकार के इसी सिलसिले ने भारत के जंगलों से चीता का वंशनाश कर दिया।

पंडित नेहरू को रीवा के महाराज ने एक जवान बाघ के सिर की रक्त रंजित ट्राफी और खाल भेंट की तो उसे देखकर इंदिराजी का दिल दहल गया, आँखों में आँसू आ गए, काश यह आज जंगल में दहाड़ रहा होता। राजीव गाँधी को लिखे अपने एक पत्र में इंदिराजी ने यह मार्मिक ब्योरा दिया है। प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिराजी ने वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट समेत वन से जुड़े सभी कड़े कानून संसद से पास करवाए। राष्ट्रीय उद्यान, टाइगर रिजर्व, व अभयारण्य एक के बाद एक अधिसूचित करवाए। आज वन व वन्यजीव जो कुछ भी बचे हैं वह इंदिरा जी के महान संकल्प का परिणाम है। आज देश में 50 से ज्यादा टाइगर रिजर्व हैं।

बाघ हमारी संस्कृति के अटूट हिस्से हैं। वे दैवीय हैं और ईश्वर के अवतारी। इन्हें भौतिकवादी प्रगतिशीलों ने कभी इस नजरिए से नहीं देखा। बाघ सनातन से हमारी आस्थाओं में हैं। जंगल प्रकृति की पाठशाला है, हर बार कुछ न कुछ सीख मिलती है। जानवर, पेड़-पौधे, नदी, झरने सभी शिक्षक हैं, बशर्तें उन्हें ध्यान से देखिए, सुनिए समझिए। ये सब उस विराट संस्कृति के हिस्से हैं जो सनातन से चलती चली आ रही है। ये सह अस्तित्व के प्रादर्श थे कभी। जब से सत्ता व्यवस्था शुरू हुई तभी से जंगल में संघर्ष की स्थिति बनी।

समूचा वैदिक वांगमय जंगल में ही रचा गया। इसलिए पशु-पक्षियों की बात कौन करे, पेड़-पौधे, नदी,पहाड़, झरने सभी जीवंत पात्र हैं। पुराण कथाओं में वे संवाद भी करते हैं। रामायण, रघुवंश, अभिज्ञान शाकुंतलम आर्दि ग्रंथों ने अरण्यसंस्कृति को स्थापित किया। इसके समानांतर एक लोकसंस्कृति की भी धारा फूटी जिसके अवशेष अब भी वनवासियों के बीच देखने को मिलते हंै। इस बार के जंगल प्रवास में यही सब कुछ देखा और अंतस में महसूस भी किया।
एकांत क्षणों में मैं महसूस करता हूँ कि जंगल मुझे बुला रहा है। जब वहां जाता हूँ तो हर जगह देखकर ऐसा लगता है कि हो न हो यह मेरा देखा हुआ। मेरा ही क्यों हर किसी का यहाँ से जन्म जन्मांतर का रिश्ता है। जरूरत है श्रवणग्राहिता और दृष्टिक्षमता की। सुनने और देखने का तरीका ही हमारी संवेदनाओं का सूचकांक है।

जंगलों में पशु पक्षियों के शिकार वाल्मीकि और सिद्धार्थ से पहले भी होते रहे हैं। संवेदना ने वाल्मीकि को आदि कवि बना दिया और सिद्धार्थ को भगवान् गौतमबुद्ध। जंगल प्रकृति की ऐसी पाठशाला हैं जहाँ पढकर मनुष्य भी ईश्वर समतुल्य बनकर निकलता है। बाणभट्ट ने कादंबरी में जिस विन्ध्याटवी का वर्णन किया है। वही विन्ध्याटवी सफेद बाघों का प्राकृतिक पर्यावास है। इतिहासवेत्ता और वनस्पतिशास्त्री इस क्षेत्र को बाँधवगढ, संजय नेशनल पार्क के साथ वर्णन जोड़ते हैं। सफेद बाघ मोहन जिसकी संतानें आज दुनियाभर के अजायबघरों में मौजूद हैं, संजय नेशनल पार्क के बस्तुआ बीट के बरगड़ी के जंगल से पकड़ा गया था। इस जंगल में अभी भी पचास से ज्यादा वन्यग्राम हैं। वहां अब सभ्यता पहुंच गई,बिजली, मोबाइल, जैसी चीजें, फिर भी वनों की लोकसंस्कृति के अवशेष देखने को मिल जाते हैं।

पिछले प्रवास में एक घर के भित्तिचित्र ने ध्यान खींचा था,जिसमें हाथी बाघ से हाथ मिलाते हुए चित्रित था। उस घर के मालिक वनवासी भाई से पूछा तो उसके लिए बस यूं ही ऐसी कलाकारी थी,जो उसके पुरखे के जमाने से चलती चली आ रही है। इस बीच संदर्भ के लिए प्रो.बेकर की पुस्तक ‘बघेलखंड द टाईगर लेयरÓ पढऩे को मिली तो पता चला कि विन्ध्य के जंगल कभी हाथियों की घनी आबादी के लिए जाने जाते थे। यहां के राजा का हाथियों के बेचने का कारोबार था। सीधी जिले के जिस मडवास रेंज के वन्यग्राम में वो भित्तिचित्र देखा उसी मड़वास के हाथियों के बारे में।

‘रीवा राज्य का इतिहास’ के लेखक गुरु रामप्यारे अग्नीहोत्री ने लिखा कि -‘एक बार राजा ने यहां से 30 हाथी पकड़वाए इसके बाद वे यह भूल गए कि इनका करना क्या है परिणाम यह हुआ की तीसों हाथी भूख से तड़प के मर गए थे।’ यानी इस जंगल में हाथी और बाघ सहअस्तित्व के साथ रहा करते थे। भित्तिचित्र का संदेश भी दोनों की दोस्ती की कथा बताता था। इसी क्षेत्र में सात सफेद बाघों के मारे जाने का रिकॉर्ड बाँम्बे जूलाजिकल सोसाइटी की जंगल बुक में दर्ज है। रीमाराज्य की तीन पीढ़़ी के राजाओं ने अपने हिस्से के जंगल में तीस साल के भीतर 2 हजार बाघ मारे थे। सरगुजा के राजा के नाम से तो 17 सौ बाघों को मारने का विश्व रेकार्ड कायम है। इन्होंने भी इसी समयकाल में शिकार किए।

सात साल पहले मैं जब इस जंगल में गया था, तब एक भी बाघ नहीं था। हाथी तो इतिहास की बात हैं। इस बार जंगल प्रवास में एक वन्य ग्राम के घर में बने भित्तिचित्र ने फिर ध्यान खींचा। गोबर से लीपी हुई भीत पर कोयले के रंग से एक बाघ, उसके सामने एक गाय और बीच में बछड़े का चित्र था। यह चकरा देने वाला मामला था। हाथी की दोस्ती तो चलो बराबरी की,पर इस गाय की भला बाघ के सामने क्या बिसात..? पूर्व की भाँति इस बार भी मकान मालिक का जवाब वही-पुरखों के समय से ऐसे ही कुछ न कुछ उरेहते आए हैं।

मेरे स्मृति पटल में कालिदास के रघुवंश की वह कथा आ गई जिसमें राजा दिलीप बाघ से यह निवेदन करते हैं कि गाय की जगह वह उन्हें अपना शिकार बना ले। पर इस भित्तिचित्र के साथ इस कथा का कोई तारतम्य जमा नहीं। उधेड़बुन में माताजी का बहुला चौथ उपवास और व्रतकथा याद आ गई। एक बार वह व्रतकथा मुझे सुनानी पड़ी थी, क्योंकि पंडित नहीं आए थे। यह है हमारी अरण्यसंस्कृति, हमारी लोकधारा जो जंगल से वन्यजीवों के बीच से फूटती है। वन्यजीव सरकारी सप्ताह के आयोजनों से नहीं बचेंगे। हमारी संस्कृति और परंपरा ही बचा सकती है इन्हें। जंगल को सुनऩे व देखने की श्रवणग्राहिता और दृष्टिक्षमता लानी होगी और वह जंगल के सरकारी कानूनों से नहीं आने वाली।

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