ये देश है वीर जवानों का..

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राजीव सक्सेना, धारावाहिक निर्माता व समीक्षक

आजादी का अमृत महोत्सव मनाते हुए हमें याद आते हैं वो, मील के पत्थर जिनका देश की आजादी में कुछ न कुछ योगदान जरूर रहा है। देश के साहित्यकारों के साथ ही सांस्कृतिक जगत से जुड़ी हस्तियों ने भी अपने-अपने स्तर पर अपनी रचनाओं के माध्यम से आम जन में दासता के विरुद्ध बीज बोने में कसर नहीं छोड़ी। सन सेैंतालीस से कोई दो दशक पहले हिंदी और बांग्ला सिनेमा से जुड़े फिल्मकार, आजादी के आंदोलन में खुद की भूमिका तय कर चुके थे। कविवर बंकिमचंद्र चटर्जी की रचना ‘आनंदमठ 1941 में आकार ले चुकी थी। अमर गीत ‘वन्देमातरम भी आजादी के मतवालों में अंदरूनी तौर पर ऊर्जा का स्रोत बन चुका था। पंडित प्रदीप के लिखे गीत ‘चना जोर गरम.. और ‘चल चल रे नौजवान.. ने भी गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारतीय जनमानस को उकसाने में खासी भूमिका निबाही।

आजादी के बाद, भारत – चीन, भारत – पाकिस्तान, बांग्लादेश के तमाम युद्धों के दौरान हमारे जाँबाज सैनिकों में उत्साह, ऊर्जा के संचार के साथ ही आम जन में देशभक्ति का जज्बा पैदा करने की गर्ज से रामानंद सागर ने ‘ऑंखें, ‘ललकार, विजय आनंद और चेतन आनंद ने ‘हकीकत, ‘हिंदुस्तान की कसम और मनोज कुमार ने ‘उपकार सारीखी फि़ल्में बनाईं।

यहां विशेष रूप से उल्लेख करना होगा कि बलदेवराज चोपड़ा की फि़ल्म ‘नया दौर’ का, जिसका सीधा सम्बन्ध मध्यप्रदेश से रहा है। मोहम्मद रफ़ी और साथियों के स्वर में इस फिल्म के गीत ‘ये देश है वीर जवानों का… अलबेलों का मस्तानों का.. बेहद लोकप्रिय हुआ। हालांकि फि़ल्म की पटकथा स्वतंत्रता के बाद के भारत, खासकर ग्रामीण अंचलों के विकास को लेकर रची-बुनी गईं थी, लेकिन भावनाएं नये दौर के नये भारत की ही यानी देशप्रेम से ही सराबोर थीं।
छह दशक पहले भोपाल से होशंगाबाद के बीच, बुधनी गांव में बीआर चोपड़ा साहब की सफलतम फिल्मों में शुमार ‘नया दौर की शूटिंग का खासा हल्ला था। उस जमाने के तमाम बड़े स्टार फिल्म नगरिया बम्बई से सीधे भोपाल होते हुए, कुदरत के बीच इस खूबसूरत आउटडोर लोकेशन पर जो पधारे थे यानी सितारे ज़मीं पर उतर आये हों जैसे।

उस दौर के सुपरस्टार दिलीप कुमार, दक्षिणी सौंदर्य, नृत्य और अभिनय का संगम वैजयंतीमाला, नायक से खलनायक की ओर बढ़ते तीखे नाक नख्श और कसरती बदन के मालिक अजीत, तब कॉमेडी के बादशाह जॉनी वॉकर और दजऱ्न भर सपोर्टिंग कलाकार सब बुधनी के सरकारी डाक बँगले, निजी मकानों में चार से पांच महीने मेहमान बने हुए थे। शूटिंग के दौरान सारे खास टेक्निशियंस बम्बई से आये थे लेकिन स्टिल फोटोग्राफी के लिए जि़म्मेदारी थी भोपाल के मशहूर फोटोग्राफर जैमिनी साहब को।

पुराने भोपाल के लखेरापुरा, इब्राहिमपुरा और सराफे के इलाके ही नही, पूरे शहर और सीहोर, विदिशा तक के लोगों की फोटोग्राफी की मांग पूर्ति करने में सक्षम जैमिनी साहब का स्टूडियो तब तक बम्बई वालों की नजऱ में भी समा चुका था। राष्ट्रपति..पद तक पहुंचे डॉ शंकर दयाल शर्मा, गुलिया दाई के मोहल्ले से अगर प्रदेश राजनीति में तब सक्रिय थे तो जैमिनी साहब अपनी कला और समाजसेवा में खासे लोकप्रिय रहे। उस समय की सिटी कोतवाली से सराफे की ओर जाते हुए घंटेवाला हलवाई की सुप्रसिद्ध दुकान के पास जैमिनी स्टूडियो में उस वक़्त बड़े नेताओं और हर क्षेत्र की हस्तियों का जमावड़ा लगा होता था।

जैमिनी साहब के होनहार बेटे कमलेश जी ने मेरे डी डी के टीवी शो ‘हमारे आसपास के एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में नया दौर की शूटिंग के समय की उनके पिताश्री की यादें हमसे साझा कीं। उन्होंने बताया कि पिताजी के संग्रह में दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला के एक से बढ़कर एक श्वेत-श्याम तस्वीरें मौजूद हैं। बलदेव राज चोपड़ा, जॉनी वॉकर और अजीत के एक नहीं अनेक दुर्लभ फोटोग्राफ्स फि़ल्म में दिखाई गई तांगे और बस की रेस के स्टिल्स और ‘साथी हाथ बढ़ाना…’मांग के साथ तुम्हारा गाने के शूटिंग स्टिल्स भी।

कमलेशजी को छायांकन कला, पिताजी से विरासत में मिली है उनके अनुज राकेशजी भी जाने माने मॉडल फोटोग्राफर और रंगमंंच कलाकार हैं। जैमिनी साहब के समकक्ष छायाकारों में एस के मावल साहब का नाम खास उल्लेख के क़ाबिल है।.कैमरे और लेन्सेस का संग्रहालय सा है मावल साहब के पास। उनके बेटे रज़ा मावल को विरासत में हासिल हुआ है ये हुनर।

कमलेशजी, मावल साहब, नवल जायसवाल…भोपाल रियासत के तमाम स्मारकों के साथ ही बड़ी और छोटी झील के अनेक मनमोहक नजऱों को कैमरे में कैद कर संजोये हुए हैं। इनकी कक्षा से निकले विद्यार्थियों में या उनसे प्रेरित छायाकारों में रज़ा मावल, गोविंद चौरसिया, सैयद आगा मियां, आर सी साहू, संजीव गुप्ता, सतीश तेवरे, विजय रोहतगी जैसे जाने-माने नाम हैं। कमलेशजी की बेटी नमिता मेरे टीवी शो में एंकरिंग कर चुकी हैं और आज नेशनल टेस्ट क्रिकेटर नरेंद्र हिरवानी की श्रीमती हैं। उम्र के सात दशक पूरे कर चुके कमलेशजी, आज भी अपनी कला को समर्पित..हैं। पिताजी की विरासत को शिद्दत से सम्हाले हुए तीसरी पीढ़ी को तैयार करने में संलग्न हैं।

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