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शाश्वत स्वतंत्रता के लिए थी संघ के विस्तार की चिंता

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  • स्वतंत्रता आंदोलन व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-5

गाँधीजी एकरूप समाज खड़े करने की संघ पद्धति से बहुत प्रभावित हुए थे। वे शिविर में उपस्थित स्वयंसेवकों के परस्पर छुआछूत की भावना से मुक्त व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित थे। इसके बारे में डॉक्टर साहब से पूछने पर डॉक्टर साहब ने कहा ‘यह सब राष्ट्रीय भाव जगाने से सम्भव हो सका। गाँधीजी की दृष्टि में देश की स्वतंत्रता के लिए छुआछूत मुक्त हिंदू समाज का कितना महत्व था यह सर्वज्ञात है। गाँधीजी द्वारा शिविर देखने और डाक्टर साहब से भेंट कार्यक्रम गाँधीजी की पहल पर निश्चित हुआ था। यह गाँधीजी का संघ से प्रथम परिचय था

  • नरेन्द्र जैन, प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मध्यक्षेत्र
    narendra21021957@gmail.com

डॉक्टर साहब उस समय के सभी प्रतिष्ठित नेताओं जिनमें स्वातंत्र्य वीर सावरकर, बाबा राव सावरकर, डॉक्टर मुंजे, पं मदन मोहन मालवीय को संघस्थान पर लेकर आए और संघ कार्य के दर्शन कराये। स्वयंसेवकों के मध्य उनके उद्बोधन भी हुए। 1934 के वर्धा के शिविर में गाँधीजी के पहुँचने एवं जमना लाल बजाज के निवास पर डॉक्टर साहब-गाँधीजी की भेंट जगजाहिर है। 25 दिसम्बर को गाँधीजी ने संघ के शिविर को भेंट दी। गाँधीजी के साथ जमनालाल बजाज, मीराबेन एवं महादेव भाई देसाई भी थे। गाँधीजी ने संघ पद्धति के अनुरूप भगवा ध्वज को प्रणाम किया एवं संघस्थान पर चल रहे शारीरिक कार्यक्रमों का निरीक्षण किया।

गाँधीजी ने शिविर में उपस्थित स्वयंसेवकों से भी बातचीत की। शिविर के माध्यम से देखते-समझते हुए संघ के बारे में जो जिज्ञासाएँ उठ रही थीं, उन्हें स्वयंसेवकों से बातचीत के माध्यम सुलझाने का भी प्रयत्न कर रहे थे। जब गाँधीजी को डॉक्टर हेडगेवार के 25 दिसम्बर को ही शिविर में पहुँचने की जानकारी दी गई, तब उन्होंने डॉक्टर साहब से मिलने की इच्छा व्यक्त की। तदनुसार 26 दिसम्बर को रात्रि 8.30 बजे जमनालाल बजाज के निवास पर गाँधीजी और डॉक्टर साहब की भेंट हुई। गाँधीजी के प्रश्न ‘यह कार्य आपने कांग्रेस में रहकर क्यों नहीं किया?का डॉक्टर साहब ने विस्तार से उत्तर दिया।

डॉक्टर साहब ने कहा ‘आत्म प्रेरणा से जब व्यक्ति समाज और राष्ट्र के कार्य को महत्व देता है तब उसकी भूमिका दरी और मेज उठाने वाले की नहीं बल्कि राष्ट्र-निर्माण में नींव के पत्थर की तरह हो जाती है,राजनैतिक दल में ये सम्भव नहीं। गाँधीजी एकरूप समाज खड़े करने की संघ पद्धति से बहुत प्रभावित हुए थे। वे शिविर में उपस्थित स्वयंसेवकों के परस्पर छुआछूत की भावना से मुक्त व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित थे। इसके बारे में डॉक्टर साहब से पूछने पर डॉक्टर साहब ने कहा ‘यह सब राष्ट्रीय भाव जगाने से सम्भव हो सका।

गाँधीजी की दृष्टि में देश की स्वतंत्रता के लिए छुआछूत मुक्त हिंदू समाज का कितना महत्व था यह सर्वज्ञात है।गाँधीजी द्वारा शिविर देखने और डाक्टर साहब से भेंट कार्यक्रम गाँधीजी की पहल पर निश्चित हुआ था। यह गाँधीजी का संघ से प्रथम परिचय था। यह एक संयोग ही था जो उनके वर्धा में जमनालाल बजाज के यहाँ वास्तव्य के कारण बना था । उनके निवास के सामने के खेत में पिछले 15 दिन से स्वयंसेवक मैदान-छोलदारी आदि लगाने के कार्य संलग्न थे। स्वयंसेवकों के परिश्रम करते देखकर गाँधीजी के मन में संघ के बारे में जिज्ञासा उत्पन्न हुई थी।


यहाँ दृष्टव्य है कि गाँधीजी की हरेक व्यक्तिगत-सार्वजनिक गतिविधि दैनंदिनी में अंकित की जाती थी। वर्धा शिविर को उनकी भेंट और बाद में डॉक्टर साहब से उनकी भेंट का उल्लेख अंकित नहीं हुआ या फिर उसे योजना से हटा दिया गया? यह आशंका इसलिए भी उत्पन्न होती है क्योंकि कांग्रेस में संघ का विरोध करने वाला गुट पहले से सक्रिय था। ऐसे ही मध्यप्रांत के प्रमुख कांग्रेस नेता बृजलाल बियानी के स्वामित्व में प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र में गाँधीजी के इस शिविर दर्शन को झूठा बताते हुए एक आलेख प्रकाशित किया गया।

संयोगवश गाँधीजी ने स्वतंत्रता के तुरंत बाद 16 सितम्बर 1947 को दिल्ली की वाल्मीकि कालोनी स्थित संघ कार्यालय में वास्तव्य के समय स्वयंसेवकों को सम्बोधित किया । अपने उद्बोधन में स्वयं उन्होंने वर्धा शिविर को दी भेंट एवं डॉक्टर साहब से मुलाकाात को स्मरण किया । यह बात ‘हरिजन एवं हिंदुस्तान टाइम्स में गाँधीजी के सम्बोधन के समाचार प्रकाशित होने से प्रकाश में आ गई और इतिहास में गुम होने से बच गई। अन्यथा संघ के आलोचक, बाद के कांग्रेस नेतृत्व को अधिक अवसर मिलता रहता।


यद्यपि प्रारम्भ के 10 वर्षों में संघ का कार्य मध्यप्रांत एवं विदर्भ तक ही सीमित था लेकिन उसकी आभा देशव्यापी फैल रही थी जिससे प्रभावित होकर देश भर से संघ के कार्य की माँग आ रही थी। डॉक्टर साहब स्वयं भी कोई न कोई निमित्त बनाकर देश के लगभग सभी प्रमुख स्थानों पर जाकर गणमान्य लोगों के बीच देश की स्वतंत्रता की गारण्टी यानी सशक्त, अनुशासित, राष्ट्रीय चेतना से युक्त समाज की आवश्यकता की ओर ध्यान आकर्षित करते थे। एवं संघ की कार्य की विशिष्ट पद्धति के सुपरिणामों की चर्चा कर रहे थे। शाखा पद्धति के सिखाने और संघ कार्य के विस्तार के लिये नागपुर से युवाओं का जाना प्रारम्भ हो गया था।

लेकिन इस सब का परिणाम डॉक्टर साहब के स्वास्थ्य पर पड़ रहा था। एक बार फिर दुनिया पर विश्वयुद्ध का खतरा मंडराने लगा था। डॉक्टर साहब के सामने केवल राजनैतिक स्वतंत्रता तक सीमित उद्देश्य की बजाय देश की शाश्वत स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिये देश व्यापी राष्ट्रीय चेतना से युक्त समाज खड़ा करने की चुनौती थी। अब केवल डॉक्टर साहब ही नहीं, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, सुभाषचन्द्र बोस भी सम्भावित विश्वयुद्ध को देश की स्वतंत्रता के अवसर के रूप में देख रहे थे। परन्तु डॉक्टर साहब अवसर के अनुरूप तेजी से देशव्यापी कार्य बढ़ाने के लिये बेचैन थे जिसके बल देश की आज़ादी को टिकाया भी जा सके । उनकी आँखों में ‘याचि दही याचिडोड़ा यानी अपनी इसी देह, इन्हीं आँखों से देश को स्वतंत्र देखने का सपना पल रहा था।

अत्यधिक परिश्रम से मानो खून पानी हो चुका था। उनकी बढ़ती शारीरिक अशक्यता ने उनकी वेदना बढ़ा दी थी। अपनी मृत्यु के दो दिन पूर्व 19 जून 1940 को लौह पुरुष जैसी वृत्ति से युक्त यह महापुरुष कहते हैं – मुझे भय है कि कहीं इस महायुद्ध का स्वर्णावसर हम हाथ से न खों दें। इस अवसर के पूर्व ही अपने संगठन को बलशाली होना आवश्यक है। मैं इसी जन्म में अपनी आँखों से अपने इस हिंदू राष्ट्र को स्वतंत्र देखना चाहता था, पर लगता है ईश्वर को कुछ और ही मंज़ूर है और कहते हुए डॉक्टर साहब की आँखों से झरझर आँसू बह रहे थे।

इस प्रसंग से हम समझ सकते हैं कि डॉक्टर साहब के जीवन देश की सर्वांग स्वतंत्रता का क्या महत्व था। उनकी मृत्यु पर लोकमान्य द्वारा स्थापित केसरी ने लिखा- ‘तिलक की मृत्यु के बाद बहुत से दल थे, परन्तु किसी ने भी राष्ट्र के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू – राष्ट्र पर गर्व पैदा करने,देशभक्ति व आत्मसम्मान पर ध्यान केन्द्रित नहीं किया जो राष्ट्र के आधार को मजबूत करने के लिये आवश्यक है। डॉक्टर हेडगेवार ने इसे क्रियान्वित किया।

समाप्त

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