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परियोजना में पन्ना टाइगर रिजर्व के 20-25 लाख पेड़ों के खत्म होने का खतरा (2): केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना की सुध लेना भी जरूरी

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बकस्वाहा के जंगल से कम से कम दस गुना बड़ा जंगल पन्ना में कटने वाला है तो फिर सवाल उठता है आखिर पर्यावरण प्रेमी, जागरूक संगठन इस टाइगर रिजर्व में हटाए जाने वाले जंगल की चिंता क्यों नहीं करते। ये वन यूनेस्को ने पिछले साल ही इन वनों को विश्व बायोस्फीयर रिजर्व में शामिल किया गया है।

  • आशीष खरे


बुंदेलखंड में बकस्वाहा के जंगल की बन्दर हीरा परियोजना के तहत 34 मिलियन कैरेट हीरे निकालने के लिए लगभग 2.15 लाख पेड़ों को काटना होगा। लेकिन इसी स्थान से महज 120 किमी दूर स्थित पन्ना नेशनल पार्क में केन-बेतवा नदी-जोड़ परियोजना के लिए 20 से 25 लाख पेड़ों को हटाना पड़ेगा। पन्ना टाइगर रिजर्व के वनों को हाल ही में यूनेस्को के विश्व बायोस्फीयर रिजर्व की सूची में शामिल किया गया है।

विश्व जल दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में हुए वर्चुअल कार्यक्रम में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस परियोजना के लिए सहमति जताते हुए एमओयू पर हस्ताक्षर किए। कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी भी इस योजना के वर्तमान स्वरूप को लेकर चिंता जता चुकी हैं, लेकिन बकस्वाहा के दो लाख पेड़ों को लेकर चिंता जताने वाले पर्यावरणविद और पर्यावरण प्रेमी इस असल मुद्दे पर चिंता जताने से बच रहे हैं।


पर्यावरण बचाने के बड़े मुद्दों पर काम जरूरी


केंद्र सरकार ने देश में नदी जोड़ो अभियान के तहत पहली परियोजना अर्थात केन बेतवा लिंक परियोजना को अंतत: हरी झंडी दे दी है। लगभग 38 हजार करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाली परियोजना में 90 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार खर्च करेगी। इस परियोजना में पन्ना टाइगर रिज़र्व के बीच मे केन नदी पर ढोढऩ बांध बनाया जाएगा। इस बांध से 220 किमी लम्बी नहर झांसी जिले के बरुआसागर स्थित बेतवा नदी तक जाएगी। लगभग दो किमी लंबे ढोढऩ बांध के बनाए जाने से नेशनल पार्क में कम से कम 5500 हैक्टेयर का जंगल डूब जाएगा। पार्क के कोर क्षेत्र की 4200 हेक्टेयर व बफर क्षेत्र की 1300 हेक्टेयर भूमि ढोडऩ बांध के डूब क्षेत्र में जा रही है। यानी इसमें मौजूद लगभग 20 लाख पेड़ों की तिलांजलि देनी होगी।

वर्तमान में गंगऊ बांध के ऊपरी हिस्से में लगभग ढाई किमी दूर बनने वाले इस बांध से पन्ना नेशनल पार्क को भयावह नुकसान होने की आशंका पन्ना के लोग जता रहे हैं। सोनिया गांधी ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को लिखे पत्र में हटाए जाने वाले पेड़ों की अनुमानित संख्या 18 लाख बताई है। अगर तुलना करें तो इस बांध के बनाये जाने पर बकस्वाहा के जंगल से कम से कम दस गुना बड़ा जंगल पन्ना में कटने वाला है तो फिर सवाल उठता है कि आखिर देशभर के पर्यावरण प्रेमी, जागरूक एनजीओ इस टाइगर रिज़र्व में हटाये जाने वाले जंगल की चिंता क्यों नहीं कर रहे हैं।

ये वन इतने महत्वपूर्ण हैं कि यूनेस्को ने पिछले साल ही इन वनों को विश्व बायोस्फीयर रिजर्व की सूची में शामिल किया है। पन्ना के भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष सतानन्द गौतम देशभर के पर्यावरणविदों के इस व्यवहार को संदेहभरी नजरों से देखते हैं, जबकि वे भी इस लिंक परियोजना की समीक्षा की मांग कर चुके हैं। उधर केंद्रीय जल आयोग के अनुसार इस परियोजना से बुंदेलखंड में 6 लाख हैक्टेयर भूमि सिंचित होगी। साथ ही लगभग 102 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य भी रखा गया है। इससे बुंदेलखंड में रोजगार के अवसर पैदा होंगे, वहीं सिंचाई का रकबा बढऩे से जीवनस्तर में सुधार आएगा। परियोजना के तहत बनने वाले ढोढऩ बांध से बिजावर तहसील के दस गांव विस्थापित होंगे। परियोजना के तहत मप्र को 1834 एमसीएम एवं उत्तर प्रदेश को 750 एमसीएम पानी मिलेगा। ढोढऩ बांध की क्षमता 2853 एमसीएम (मिलियन घन मीटर) होगी।


फिलहाल पांच जगहों पर टूटी है केन की धारा


केन एवं बेतवा दोनों ही नदियां यमुना की सहायक नदियां हैं। केन-बेतवा लिंक परियोजना का उद्देश्य केन नदी में मौजूद अतिरिक्त पानी को बेतवा नदी तक नहर से भेजना है। केन नदी की कुल लंबाई 427 किमी है, वहीं बेतवा की लंबाई 590 किमी है। ऐसे में मोटे तौर पर यह बात समझ में आती है कि केन नदी का स्वरूप बेतवा से छोटा है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि केन नदी में बांधों अथवा सिंचाई परियोजनाओं की संख्या कम है, इसलिए अतिरिक्त पानी उपलब्ध है। लेकिन पन्ना के लोग इससे इत्तेफाक नहीं रखते हैं।

पन्ना के भाजपा नेता सतानंद गौतम कहते हैं कि पिछले कुछ सालों में पन्ना से लेकर कटनी तक मानसून में भीषण गिरावट हुई है। इन दिनों केन नदी की धार पांच स्थानों पर टूटी हुई है। जबकि परियोजना पूर्ण होने पर इन्हीें दिनों में (गैर मानसून सीजन ) उप्र को 750 एमसीएम पानी देना होगा। सवाल यह है कि जब आज केन में पानी नहीं है तो फिर तब कहां से लाएंगे। वह कहते हैं कि केन नदी पर एक दर्जन सिंचाई परियोजनाएं पन्ना, छतरपुर एवं यूपी के बांदा, महोबा जिलों में पहले से संचालित अथवा निर्माणाधीन हैं। फिलहाल तो हालात ऐसे हैं कि उन्हीें परियोजनाओं के लिए पानी नहीं है, तो फिर अतिरिक्त पानी कहां से आएगा, यह समझ से परे है। ऐसा लगता है कि जो हो रहा है, वह वर्षों पुराने तथ्यों के आधार पर हो रहा है। इस परियोजना को शुरू करने से पहले सब कुछ नए सिरे से देखना जरूरी था।


केन में पानी की मात्रा की जानकारी सार्वजनिक नहीं

केन नदी में कितना पानी है, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। इसके पीछे तर्क है कि केन नदी यमुना की सहायक नदी है और यमुना गंगा की सहायक नदी है। गंगा से जुड़ी नदियों की जानकारी सार्वजनिक किया जाना देशहित में नहीं है। पन्ना में केन नदी में पर्याप्त पानी न होने की दुहाई देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता भावना कुमारी कहती हैं कि केन नदी पन्ना टाइगर रिजर्व के बीच से बहती है।

यहां विशाल बांध बनाए जाने से टाइगर रिजर्व का कम से कम 12 फीसदी हिस्सा सीधे तौर पर बांध में डूब जाएगा। वहीं पानी बाहर दे दिए जाने से टाइगर रिजर्व की जैव विविधता नष्ट हो जाएगी। पन्ना राजघराने की राजमाता दिलहर कुमारी भी इस परियोजना का खुलकर विरोध कर रही हैं। बीते एक दशक में बमुश्किल पन्ना टाइगर पुनर्जीवित हुआ है। यहां लगभग 18 लाख पेड़ हैं, जो लिंक परियोजना में खत्म हो जाएंगे। टाइगर रिजर्व को इससे जो नुकसान पहुंचेगा, उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी। इसे लेकर एनजीटी एवं सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं भी दायर की गई हैं।


राजनीति का त्याग जरूरी

कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की भीषण किल्लत के बाद देश में पर्यावरण, जैव विविधता को लेकर काफी जागरूकता आई है। ऐसे में देश में कहीं भी पेड़ कटने की घटनाएं सुर्खियां बन रही हैं और लोग इसे लेकर नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। इस माहौल में यह समझ रखना भी जरूरी है कि आखिर देश के पर्यावरण को सुरक्षित एवं बेहतर रखने के लिए असल चुनौतियां क्या हैं।

यह जरूरी है कि देश के सामने जंगल बचाने के लिए बड़े मुद्दे रखे जाएं, जिससे बड़ी सफलताएं हासिल की जा सके। जंगल एवं जैव विविधता को सुदृढ़ करने के लिए इस पर मुद्दे पर राजनीति को एक ओर रखना होगा। सत्ता पक्ष को जहां इच्छाशक्ति दिखना होगा, वहीं विपक्ष को इस मुद्दे पर राजनीति से परहेज करना होगा, तभी सफलता संभव है। (अगले अंक में अनवरत..)
(लेखक बुंदेलखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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