Home लेख क्रांतिकारी भगत सिंह के मुकदमे (2)

क्रांतिकारी भगत सिंह के मुकदमे (2)

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आजादी के अमृत महोत्सव अवसर पर प्रकाशित स्वाधीनता के श्रंखला की पिछली कड़ी में हमने भगतसिंह के मुकदमे भाग-1 प्रकाशित किया है। दूसरी कड़ी भाग -2 में प्रस्तुत है लाहौर सांडर्स हत्या-मुकदमा जब भगत सिंह जेल में थे तभी सांडर्स हत्याकांड (लाहौर षडयंत्र मुकदमा, 1929) विशेष मजिस्ट्रेट की अदालत में शुरू हुआ।

  • रंजना चितले, कथाकार व रंगकर्मी

यह मुकदमा 10 जुलाई 1929 को शुरू हुआ। फणीन्द्र नाथ घोष और भगतसिंह समेत 15 व्यक्तियों पर मुकदमा चलाया गया। सात व्यक्ति- रामशरण दास, ब्रम्हदत्त, जयगोपाल, मनमोहन बनर्जी, हंसराज वोहरा और ललित कुमार मुखर्जी मुखबिर बन गये। पहले दो को अविश्वसनीय मानकर बाकी पांच मुखबिरों के आधार पर मुकदमा चलाया गया।

लाहौर षडयंत्र मुकदमा के अंतर्गत लाहौर में विशेष ट्रिब्यूनल ने न्यायाधीश जे. कोल्डस्ट्रीम की अध्यक्षता में न्यायाधीश आगा हैदर और न्यायाधीश जी.सी हिल्टन की सदस्यता में 5 मई 1930 को कार्यवाही शुरू की। असेंबली बम कांड मुकदमे की तरह इस बार भी भगतसिंह ने अपनी सफाई के लिए वकील करने से इंकार कर दिया। उन्होंने मुकदमे के दौरान भी अपनी कोई सफाई पेश नहीं की। 20 सितंबर 1930 को जब यह स्पष्ट हो गया कि भगतसिंह को मृत्यु दंड निश्चित है, तब उनके पिता किशन सिंह ने ट्रिब्यूनल के सामने याचिका पेश की।

जब भगतसिंह को इस बात का पता चला तो उन्होंने क्रोधित हो अपने पिता को लिखा – मुझे यह जानकार हैरानी हुई कि आपने मेरे बचाव-पक्ष के लिये स्पेशल ट्रिब्यूनल को एक आवेदन भेजा है। यह खबर इतनी यातना देने वाली थी कि मैं इसे खामोशी से बर्दाश्त नहीं कर सका। इस खबर ने मेरे भीतर की शांति भंग कर उथल-पुथल मचा दी है। मैं यह नहीं समझ सकता कि वर्तमान स्थितियों में और इस मामले में आप किस तरह का आवेदन दे सकते हैं? आपको मेरे साथ सलाह-मशविरा किये बिना ऐसा आवेदन देने का कोई अधिकार नहीं था।

अदालत के निष्कर्षों में भगतसिंह के विरुद्ध प्रमाण थे –

1. वह चश्मदीद गवाह, जिसने उन्हें यह हत्या करते और फरार होते देखा। वह गवाह, जिसने उन्हें पहचाना। 2. इकबाली गवाह – जयगोपाल और हंसराज वोहरा, जो इस हत्या में भागीदार और उनके सहयोगी थे। 3. भगतसिंह द्वारा लिखे गये इश्तहार (स्कॉट मर गया), जिन्हें लिखाई विशेषज्ञों ने उनके द्वारा लिखा गया माना। भगतसिंह को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 121, 302 के अंतर्गत तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 (बी) के अंतर्गत, उसी अधीनियम की धार 6 (एफ) तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी के साथ पढ़े जाने पर दंडित किया गया। इस मुकदमे का फैसला 7 अक्टूबर 1930 को सुनाया गया- भगतसिंह की भागीदारी तथा षडयंत्र के एक मुख्य नेता के रूप में उनकी हैसियत को देखते हुए उन्हें मृत्यु हो जाने तक फांसी पर लटकाए जाने का दंड दिया जाता है। भगतसिंह की तरह उनके साथियों सुखदेव और राजगुरु को भी मृत्युदंड दिया गया। बाकी को आजावीन निर्वासन का दंड दिया गया। कुंदन लाल और प्रेम दत्त को सात और पांच साल के कारावास की सजा दी गयी।

सरकार ने निर्णय लिया कि फांसी की सजा 23 मार्च 1931 को दी जायेगी। यह निर्णय़ केंद्रीय सरकार ने निम्न तार द्वारा पंजाब सरकार को प्रेषित किया। भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च को शाम सात बजे फांसी दी जायेगी। इसकी खबर लाहौर में 24 मार्च को प्रात: काल ही लग पायेगी। रात के अंधेरे में उन्हें फांसी दे दी गयी और यह घोषणा की गयी -जनता को सूचित किया जाता है कि भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के मृत शरीरों को, जिन्हें कल शाम (23 मार्च) फांसी दे दी गयी थी, जेल से सतलुज के किनारे ले जाया गया, जहां सिख और हिंदू धर्म विधि के अनुसार उनका दाह-संस्कार कर दिया गया और उनके अवशेष नदी में प्रवाहित कर दिये गये।

न्यूयार्क के दि डेली वर्कर ने टिप्पणी की -लाहौर के तीन बंदी और भारत के स्वाधीनता सेनानी, भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हित में फांसी पर चढ़ा दिया गया हैं। आर.मैकडोनाल्ड के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार का यह सर्वाधिक रक्तरंजित कृत्य है। क्रांतिकारियों को इस तरह फांसी देना यही दिखाता है कि ब्रिटिश साम्राज्य के लिये मैकडोनाल्ड सरकार कहां तक जा सकती है।

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