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रजतपट पर अमर एक डॉक्टर की कहानी

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चिकित्सकों पर कई यादगार फिल्में बनीं। इनमें चीन जाकर वहां के लोगों की महामारी में सेवा करने वाले डॉ. द्वारकादास कोटणीस पर बनाई गई फिल्म काफी प्रसिद्ध हुई। उन्होंने चीनी सैनिकों के मोर्चे पर प्लेग का इलाज करते-करते खुद संक्रमित होकर जान दे दी थी।

  • राजीव सक्सेना, धारावाहिक निर्माता व समीक्षक

पड़ोसी देश चीन ने कभी हमारे एक होनहार नौजवान चिकित्सक को ‘हीरो’ का दर्जा देकर बीजिंग में उसकी न सिर्फ मूर्ति स्थापित की थी बल्कि डाक टिकट जारी कर सम्मान प्रदान किया था। पिछले वर्ष 20 सितम्बर को चीनी राष्ट्रप्रमुख शी जिनपिंग की एक तस्वीर व्हील चेयर पर बैठी एक भारतीय महिला के साथ देश के अखबारों में छपी थी। यह महिला उन जांबाज डॉक्टर द्वारकानाथ कोटणीस की बहन थीं जिन्हें 1937-38 में साइनो-जापान युद्ध के दौरान खतरनाक प्लेग से पीडि़त चीनी सैनिकों के इलाज के लिए आपको तीन डॉक्टर साथियों के साथ चीन भेजा गया था। डॉ. द्वारकानाथ दिन-रात सैनिकों के बीच रहकर उनकी तीमारदारी में खुद को प्लेग के कीटाणुओं से बचा नहीं पाये और उसी रोग ने उनकी जान ले ली।

जिस तरह विगत वर्ष अंतराष्ट्रीय स्तर पर मीडिया ने चीख-चीख कर कोरोना के मरीजों की सेवा में जुटे चिकित्सकों और पेरामेडिकल स्टाफ को प्रोत्साहित करने की अपील की, प्रधानमंत्री ने ताली-थाली बजवाईं, दीये जलवाये पर अफसोस कि उस समय अपने देश के इस होनहार डॉक्टर के लिए किसी ने तब एक मोमबत्ती तक यहां नहीं जलाई। मुम्बई के सुप्रसिद्ध साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ में आखिरी पेज के स्तंभ लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास ने कुछ पंक्तियां इस भारतीय डॉक्टर को लेकर लिखीं।

मेरे आदरणीय ताऊजी, मुम्बई में फिल्म्स डिवीजन के निवृत्त अधिकारी डी. पी. सक्सेना साहब भी आर. के. करंजिया के संपादन में ‘ब्लिट्ज’ में ज्योतिष का नियमित कॉलम लिखा करते थे। उन्होंने अब्बास साहब से उनके संबंधों को लेकर अनेक किस्से मुझे सुनाये। अब्बास साहब ने ताऊजी को बताया था कि किस तरह डॉ कोटणीस की असली कहानी उन्हें चाइना पोलिट ब्यूरो के सदस्य डॉ. डीके बसु ने मुम्बई आने पर सुनाई और अब्बास साहब ने उस पर किताब लिखी ‘एंड वन डिड नाट कम बेक।’ उन्होंने ताऊजी को बताया कि बाद में ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ अखबार में फिल्म ‘एक आदमी’ की समीक्षा पढ़कर फिल्मकार वी. शांताराम से उनकी दोस्ती हो गई और… अब्बासजी ने उन्हें डॉ. द्वारकानाथ की कहानी पर फिल्म बनाने को राजी कर लिया। कई साल बाद वी. शांतारामजी की फिल्मों के पुनरावलोकन समारोह में मुम्बई के टाटा थिएटर में मैंने यह फिल्म देखी ‘डॉक्टर कोटणीस की अमर कहानी’ और समीक्षा भी लिखी।

‘डॉ. कोटणीस की अमर कहानी’ में वी शांताराम के साथ जयश्री।

आज भी कोई भी यह फिल्म देखे तो उसका सिर डॉ. कोटणीस के लिए श्रद्धा से एक बार जरूर झुक जायेगा। चीन में डॉक्टर ने एक स्थानीय नर्स से शादी की और एक बेटा हुआ। उन पर बनी फिल्म में शांतारामजी ने खुद डॉक्टर की भूमिका की, जयश्रीजी उनकी चीनी पत्नी की भूमिका में थीं और बेटी राजश्री ने बेटे के बचपन की भूमिका निभाई। अब्बास साहब की कहानी में डॉ. कोटणीस के नहीं रहने पर उनकी पत्नी के शोलापुर महाराष्ट्र में आने का क्लाइमेक्स था। तीस साल तक भारत सरकार से इमिग्रेशन के लिए लड़ते हुए आखिर श्रीमती कोटणीस सच में शोलापुर आ गई और कहानी का काल्पनिक अंत सत्य हो गया। आज के माहौल में भारतीय ही नहीं, विश्व भर के चिकित्सकों को लेकर हर किसी के मन में श्रद्धा और सम्मान के भाव उमड़ रहे हैं।

‘खामोशी’ में राजेश खन्ना व नर्स की भूमिका में वहीदा रहमान

मैं मित्रों को इस अनूठी फिल्म को देखने की सलाह दूंगा। शांतारामज़ी की तमाम म्यूजिकल सोशल फिल्मों से अलग ये एक ‘रियल स्टोरी’ फिल्म लेखिका मित्र रिंकू चटर्जीजी ने इसी तरह की फिल्म ‘अमन’ की याद दिलाई। जिसमें भारतीय डॉक्टर जापान में जाकर मरीजों की सेवा में खुद को झोंक देता है और आखिरकार उसका निर्जीव शरीर ही स्वदेश लौटता है। कुछ और हटकर देखना चाहें तो डॉक्टर और मरीज के भावनात्मक प्रेम पर मीनाकुमारी-राजकुमार और राजेन्द्र कुमारजी की ‘दिल एक मंदिर’ और इलाज के दौरान नर्स और मरीज के लगाव पर राजेश खन्ना, धर्मेंद्र और वहीदा रहमानजी की असित सेन निर्देशित ‘खामोशी’ देखकर गुनगुनाएं…’वो शाम कुछ अजीब थी… ये शाम भी अजीब है… वो कल भी पास पास थी.. वो आज भी करीब है।’

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