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हम सभी की आत्माओं के आत्मीय, सारी दुनिया के महापुरुष

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रोमां रोलां, यूरोपियन लेखक

महात्मा, जिन्होंने विश्व सत्ता के साथ अपने को एकाकार कर दिया। शांत, काली आंखें, छोटा कद, दुबला शरीर, लंबोतरा चेहरा, सूप जैसे कान, माथे पर सफेद टोपी, पहनावे में साफ धुले कपड़े, पैर नंगे, भोजन में भात और फल, पानी के सिवा और कुछ नहीं पीते। लेटते हैं जमीन पर, सोते हैं कम, काम करते हैं लगातार, शरीर की तो जैसे कोई खोज खबर ही नहीं रखते। उन्हें देखने पर सबसे पहले जो चीज नजर आती है वह महान धैर्य और उत्कट प्रेम।

पियर्सन ने उन्हें सन 1913 में देखा थादक्षिण अफ्रीका में। देखते ही उन्हें असीसी के संत फ्रांसिस की याद आ गई। आदमी सरल शिशु जैसे हैं। अपने विरोधियों के साथ भी मधुर और विनयी। आंतरिकता में कहीं जरा सी भी खोट नहीं है। उनकी विचार विवेचना में भी वैसी ही नम्रता है। सावधान इतने हैं कि ‘मुझसे भूल हुई कहने में भी उन्हें दुविधा होती है। यद्यपि भूल को स्वीकार करने में भी वे पैर पीछे नहीं रखते। जैसा-तैसा समझौता भी वह नहीं मान लेते, किसी तरह कूटनीतिक भद्रता उनमें नहीं है। लंबे चौड़े भाषणों के मोह से वे दूर रहते हैं। उनमें उनका मन नहीं रमता। उन्हें देखते ही जनता जिस तरह उच्छवसित हो उठती है,उसके प्रति भी उनमें वैसी ही उदासीनता है।

कभी-कभी तो जनता का विश्वास इतना प्रचंड हो जाता है कि अगर उनके मित्र मौलाना शौकत अली का बलिष्ठ शरीर किले की दीवार की तरह हमेशा उनकी रक्षा न करता रहता तो उसके दबाव में उनका छोटा सा शरीर पिस ही जाता। अपने प्रति आकुल श्रद्धा की इस समवेत उछल कूद से वे शब्दश: अस्वस्थ रहते हैं और क्योंकि संख्या के प्रति उनके मन में शंका है और वैसी ही जबरदस्त घबराहट है उमड़ती हुई जनता से, अत: उन्हें थोड़े से लोगों के बीच ही आराम मालूम पड़ता है। प्रसन्न वे केवल एकांत में रहते हैं। सुनना चाहते हैं नीरव निभृत स्वर की वाणी।

यही है वह व्यक्ति जिन्होंने 30 करोड़ जनों को जगा दिया है, कंपा दिया है ब्रिटिश साम्राज्य को और आरंभ किया है मानव राजनीति का एक ऐसा सशक्त आंदोलन, जिसकी तुलना लगभग 2000 वर्षों के इतिहास में नहीं है। असल नाम है मोहनदास करमचंद गांधी जन्म 1869 ईस्वी की 2 अक्टूबर को हुआ, ओमान उपसागर के किनारे पोरबंदर में। भारत के उत्तर पश्चिम के एक स्वाधीन प्राय राज्य के उस ‘सादे’ शहर में। वह उत्साहपूर्ण जीवन से भरी उस सशक्त जाति के हैं, अभी उस दिन तक जिसके भाई भाई में लड़ाई ठनी ही रहती थी। जाति की व्यवसायिक बुद्धि भी पैनी है, रोजगार की पकड़ खासी है।

उसका वाणिज्य होता था समृद्ध अदन से लेकर जंजीबार तक। उनके पिता और दादा दोनों ही दीवान थे। स्वतंत्र स्वभाव के कारण दोनों को अपमानित होना पड़ा था। कभी तो उन्हें प्राण भय से भागते फिरने को भी विवश होना पड़ा था। ऊंची जाति का न होने पर भी उनका परिवार धनी और संस्कार संपन्न था। सजग और बुद्धिमान था। वे लोग जैन थे? अहिंसा में उनकी आस्था थी, आगे चलकर जिस अहिंसा का उन्हें स्वयं भी सारे संसार में प्रचार करना था।

बुद्धि की अपेक्षा प्रेम ही जोनों को ईश्वर के मंदिर का मार्ग दिखलाता है। महात्मा के पिता पैसे को कुछ समझते ही न थे। पैसे छोड़ भी नहीं गए अपने बाल बच्चों के लिए। जो कुछ था अपनी जिंदगी में ही दान धर्म में खर्च कर गए और उनकी मां ऐसी कठोर धार्मिक वृत्ति की थीं मानो संत एलिजाबेथ हों, उपवास में दान देने में रोगियों की सेवा सुश्रूषा में। 19 साल की उम्र में इंग्लैंड के लिए रवाना हुए, लंदन विश्वविद्यालय के कानून विभाग में शिक्षा प्राप्त करने के लिए। 1988 के सितंबर महीने में लंदन पहुंचे। आरंभ के कई महीने अनिश्चय में बीते। ठगे गए और सीखते रहे अंग्रेजी अर्थ में जेंटलमैन बनने की लालसा से।

कुछ समय उन्होंने बुद्धू की तरह यूं ही खो दिया, गठरी के रुपए भी। बाद में अपने जीवन को सुदृढ़ श्रृंखला में कठोर धर्म बंधन में बांधा। मित्रों के जरिए बाइबल से परिचय हुआ लेकिन तब तक उस पुस्तक के मार्ग पर चलने का समय नहीं आया। शुरू के कई अध्ययनों ने ही उनमें थकावट भर दी। लंदन में ही उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता के सौंदर्य का पता चला। उसके मतवाले हो उठे। उस प्रवास में उन्हें भारत के इसी आलोक की आवश्यकता थी। उसने उनकी आस्था लौटा दी। उन्होंने जान लिया कि उनकी मुक्ति केवल हिंदू धर्म में ही है।

सन 18 91 ईस्वी में भारत लौटे। वापसी विषाद से भरी थी।?कुछ समय पहले ही मां की मृत्यु हो चुकी थी। मुंबई के हाईकोर्ट में उन्होंने वकालत शुरू की।?यद्यपि कुछ समय बाद वह धंधा छोड़ दिया। वह धंधा उन्हें अनीतिपूर्ण लगता था। उसी समय कुछ महान भारतीयों ने उनमें उस भविष्य की झलक जगा दी जो आगे चलकर उनमें साकार होना था। एक ओर थे मुंबई के बिना ताज के बादशाह दादा भाई नौरोजी और दूसरी ओर अध्यापक गोखले। दोनों ही भारत के प्रति एक प्रकार की धार्मिकता पूर्ण प्रेम चेतना से प्रदीप्त। गोखले उन लोगों में अन्यतम थे जो भारतीय शिक्षा के पुनरुज्जीवन के अग्रणी और अपने देश के श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ थे और दादा भाई तो गांधीजी के ही शब्दों में भारतीय राष्ट्रीयता के प्रवर्तक ही थे, एक ही साथ विनय और प्रज्ञा की प्रतिमूर्ति। 1892 में गांधी जी ने जन जीवन में अहिंसा के क्रियात्मक व्यवहार की प्राथमिक शिक्षा उन्हीं से पाई।

सन 1 93 से उनके भारत संबंधी कार्यों का आरंभ हुआ जो दो विभिन्न समय निर्दिष्ट भागों में विभाजित है 1893 से 1914 तक उनका कार्यक्षेत्र था दक्षिण अफ्रीका उसके बाद से भारतवर्ष। गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो नेता का सम्मान लेकर लौटे। उनकी महान बातों ने उनके संग्राम को एक मानवीय चेतना से अनुप्रेरित किया। यह बातें यह साबित करती हैं कि वह केवल भारत के ही नहीं, सारी दुनिया के महापुरुष हैं। हम सभी की आत्माओं के आत्मीय हैं। महात्मा अब से 4 साल पहले जिस संग्राम में प्रवृत्त हुए, एक तरह से वह संग्राम हम सब के हित के लिए था।

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