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हमारे देश के प्रबुद्ध वर्ग का मौन समझ से परे है : क्या हम राष्ट्रधर्म का निर्वाह कर रहे हैं ?

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कैलाशचन्द्र पन्त

भारत के राष्ट्रीय जीवन में अनेक घटनाएं ऐसी घटित हुईं जो राष्ट्र के लिए शर्म का विषय हैं। लेकिन इन दिनों घटित तीन घटनाओं ने सोचने के लिए बाध्य कर दिया है कि महात्मा गांधी की 150वीं जयन्ती मनाते हुए और राष्ट्र की स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की तैयारी करते हुए राष्ट्र की कैसी तस्वीर सामने आ रही है ? इस प्रश्न से भारतीय समाज को जूझना है, क्योंकि इसमें ही भारत की अस्मिता, जनतंत्र, संवैधानिक व्यवस्था का भविष्य निर्भर करता है। महाराष्ट्र में एक निर्वाचित गठबंधन सरकार है निश्चित ही उसके स्वायत्त अधिकार भी हैं। यह ध्यान में रखना होगा कि मौजूदा अघाड़ी गठबंधन चुनाव से पहले नहीं बना था। चुनाव परिणामों के बाद की परिस्थितियों में सत्ता पर काबिज होने की तात्कालिक व्यवस्था थी, जिसे जनमत की स्वीकृति प्राप्त नहीं थी। लेकिन संविधान ऐसी गठबंधन सरकारों को मान्यता देता है। अत: अघाड़ी सरकार को चुनौती नहीं दी जा सकती। लेकिन इस सरकार के चलते पुलिस सब इंस्पेक्टर वाजे के कारनामों का जो खुलासा होता जा रहा है उससे लगता था कि पुलिस की वर्दी में शातिर माफिया सरगना पुलिस-बल में अपना दबदबा बना चुका था।

खास बात है कि बारह वर्षों के निलंबन के बाद वह नौकरी छोड़ चुका था और सत्ताधारी शिवसेना में शामिल हो गया था। इस व्यक्ति को शिवसेना ने सत्ता संभालते ही पुन: पुलिस इंस्पेक्टर नियुक्त किया और बहुत ही गंभीर विभाग में नियुक्ति दे दी। प्रारंभिक जांच के दौरान ही मुख्यमंत्री ने स्वयं उसे एक योग्य अधिकारी होने का प्रमाण-पत्र दिया। बाजे के खिलाफ जांच किसी परिणाम तक पहुंचती इसके पहले पुलिस आयुक्त परमवीरसिंह का तबादला कर दिया जाता है। इससे दुखी परमवीर ने एक पत्र मुख्यमंत्री को लिखकर बताया कि महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने इंस्पेक्टर वाजे को सौ करोड़ रूपये की वसूली करने के निर्देंश दिये थे। इस पत्र के सार्वजनिक होते ही महाराष्ट्र की राजनीति में बवंडर खड़ा हो गया। मुख्यमंत्री और गृहमंत्री से त्यागपत्र की मांग की गई। शिवसेना के प्रवक्ता संजय राऊत, एन.सी.पी. नेता शरद पवार ने देशमुख के त्यागपत्र की मांग को सिरे से खारिज कर दिया। लेकिन मुंबई उच्च न्यायालय ने पुलिस आयुक्त के पत्र में लगे गंभीर आरोपों की जांच सी.बी.आई. को सौंपने का आदेश दिया। इस आदेश के बाद गृहमंत्री की नैतिकता जाग्रत हुई और उन्होंने त्यागपत्र दे दिया।

इंस्पेक्टर वाजे के जिस अपराध की जांच हो रहीं है उसमें अनेक रहस्य खुलने शेष हैं और तब अघाड़ी गठबंधन की नैतिकता पर सवाल खड़े होंगे। अभी तो सी.बी.आई. जांच के हाईकोर्ट के आदेश के विरूद्ध न्यायालय में अपील की जा रही है। यह एक उदाहरण है जो सत्ताधारियों के चरित्र को और नैतिकता की उनकी परिभाषा को बेनकाब कर रहा है। लेकिन संदेह होता है कि कहीं भ्रष्टाचार की इस ऊहापोह में उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर एंटालिया के बाहर विस्फोटक कार का मिलना और मनसुख हिरेन की रहस्यमय मौत की परतें खुलने से न रह जायें। दूसरी घटना उत्तरप्रदेश के कुख्यात अपराधी मुख्तार अंसारी की है। उत्तरप्रदेश की समाजवादी सरकार के आश्रय में इस अपराधी ने अपनी आर्थिक और राजनीतिक हैसियत बढ़ाई। इसका आतंक पश्चिमी उत्तरप्रदेश पर बुरी तरह हावी था। इस पर भाजपा विधायक की हत्या का संदिग्ध आरोप तो था ही, पर अवैध वसूली, अवैध कब्जे, हत्याओं के अनेक मामले थे। यदि योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री न बने होते तो इस अपराधी सरगना का काला-पीला धंधा यों ही फलता-फूलता रहता। लेकिन इसकी गिरफ्तारी के बाद पंजाब पुलिस एक प्रकरण में पंजाब ले गई और रोपड़ जेल में बन्द कर दिया।
लम्बे समय तक उसके प्रकरण को अदालत में लटकाए रखने के बाद पंजाब पुलिस सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अंसारी को उत्तरप्रदेश की पुलिस को सौंपने के लिए तैयार हुई। प्रश्न यह है कि पंजाब सरकार इस अपराधी को शरण क्यों दे रही थी? यह राजनीतिक शरण का जघन्य प्रकरण है। इससे सिद्ध होता है कि देश के विभिन्न स्थानों पर जो माफिया गिरोह सक्रिय हैं उन्हें राजनीतिक संरत्तण प्राप्त होता है।
तीसरी घटना बंगाल से संबंधित है। वहां एक से ज्यादा बार मुख्यमंत्री ने दो बातें कही हैं। एक तो, बंगाली और बाहरी का सवाल बार बार उठाकर राष्ट्र की अवधारणा को ही खंडित किया। इससे भी ज्यादा निर्वाचन आयोग जैसी सर्वोंच्च संवैधानिक संस्था की कार्यशैली पर पक्षपात के आरोप लगाए। अपने गिरेबान में झांककर ममता बनर्जी देखें तो उनकी पार्टी पर एक सौ पचास से ज्यादा भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या के आरोपों के दाग हैं। स्वयं वह कहती रहीं कि चुनाव के बाद केन्द्रीय सुरक्षा बल और भाजपा के बाहरी कार्यकर्ता जब लौट जायेंगे तब विरोधियों से निपट लेंगी।

एक मुख्यमंत्री पद पर आसीन व्यक्ति संवैधानिक संस्था को लांछित करे, अपराधियों को संरक्षण दें, विभाजनकारी उत्तेजना पैदा करे और परोक्ष रूप से हिंसा को प्रोत्साहित करे तो समझ लेना चाहिये कि देश के संघात्मक संविधान का भविष्य क्या हो सकता है? उपर्युक्त विश्लेषण में तीन अलग अलग राज्यों की महत्वपूर्ण घटनाओं को ही शामिल किया गया है। इन पर राजनीतिक दलों की सामान्य प्रतिक्रियाएं सुनने को मिली। दलीय सीमाओं से बाहर उनसे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन हमारे देश के प्रबुद्ध वर्ग का मौन समझ से परे है। वामपंथी, धर्म निरपेक्ष नकाबधारी दलों से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। क्योंकि वे जाने-अनजाने किसी न किसी भ्रष्टाचार में लिप्त रहे तथा माफिया गिरोहों को संरक्षण देते रहे। लेकिन देश में मुक्त चिन्तन करने वाला बड़ा वर्ग भी है।
(लेखक साहित्यकार और वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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