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समाज में राजनीतिक चेतना जगाने वाले संत

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  • स्वामी करपात्रीजी महाराज की जयंती (10 अगस्त) पर विशेष

स्वामी करपात्री में अलौकिक प्रतिभा, तपस्या एवं साधना का असीम तेज था। कलि के इस प्रथम चरण में जीवनपर्यंत वर्णाश्रम व्यवस्था और धर्म की रक्षा के लिए वे संघर्षरत तो रहे ही, जगत को वेद-शास्त्र और धर्म के सूक्ष्म तत्वों से अवगत भी कराया।

अशोक “प्रवृद्ध”, पत्रकार
gashok|v@gmail.com

महान संत विश्ववंद्य, धर्मसम्राट, श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, परमवीतराग, यतिचक्रचूडामणि अनंत श्रीविभूषित, दण्डी संन्यासी, श्रीहरिहरानन्द सरस्वती स्वामी श्री करपात्री जी महाराज (1907 – 1982) भारत के ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने वर्णाश्रम मर्यादा संरक्षण, शाश्वत सनातन धर्म के सत्य सिद्धान्तों के संस्थापन, वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में अपना सर्वस्व लगा दिया। विपरीत गति, प्रतिकूल वातावरण एवं अल्पसहयोग में भी धर्म, संस्कृति, वेद, शास्त्र, मंदिर, गौ, ब्राह्मण, यज्ञ एवं आस्तिकवाद के रक्षणार्थ जन- साधारण में व्यापक प्रचार करने के गुरुतर कार्य का संपादन करने वाले स्वामी करपात्री ने पराधीन भारत में जन-जन में राजनीतिक चेतना जाग्रत करने का कार्य किया।

स्वामी करपात्री में अलौकिक प्रतिभा, तपस्या एवं साधना का असीम तेज था। कलि के इस प्रथम चरण में जीवनपर्यंत वर्णाश्रम व्यवस्था और धर्म की रक्षा के लिए वे संघर्षरत तो रहे ही, जगत को वेद-शास्त्र और धर्म के सूक्ष्म तत्वों से अवगत भी कराया। अखिल भारतीय राम राज्य परिषद नामक राजनैतिक दल के संस्थापक स्वामी करपात्री जी को धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुए इन्हें धर्मसम्राट की उपाधि प्रदान की गई।

अत्यंत कुशाग्र बुद्धि व तीव्र स्मरण शक्ति के परिचायक स्वामीजी की स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि एक बार कोई कथ्य अर्थात चीज पढ़ लेने के वर्षों बाद भी उन्हें याद रहता था और वे पूछने पर बता देते थे कि यह श्लोक अथवा मन्त्र अमुक ग्रन्थ के इतना अध्याय के इतने श्लोक संख्या अर्थात अमुक ग्रन्थ के अमुक पृष्ठ पर अमुक रूप में लिखा हुआ है। आज जो रामराज्य सम्बन्धी विचार गांधी दर्शन तक में दिखाई देते हैं, धर्म संघ, रामराज्य परिषद्, राममंदिर आन्दोलन, धर्म सापेक्ष राज्य आदि सभी के मूल में स्वामी करपात्री ही हैं।। दशनामी परम्परा के संन्यासी, स्वाधीनता संग्राम सेनानी एवं राजनेता धर्मसम्राट स्वामी करपात्री का जन्म सम्वत् 1964 विक्रमी, तदनुसार सन 1907 ईस्वी में श्रावण मास शुक्ल पक्ष, द्वितीया को उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के भटनी ग्राम में सनातनधर्मी सरयूपारीण ब्राह्मण रामनिधि ओझा एवं श्रीमती शिवरानी के आँगन में हुआ।

बचपन में उनका नाम हरिनारायण रखा गया। दीक्षा के उपरान्त उनका नाम हरिहरानन्द सरस्वती हुआ, किन्तु वे अपने जन्म काल में भी करपात्री नाम से ही प्रसिद्ध थे, क्योंकि वे अपने हाथ के अंजुलि का उपयोग खाने के बर्तन की तरह करते थे। कर अर्थात हाथ और पात्र अर्थात बर्तन। इस प्रकार करपात्री का अर्थ हुआ- हाथ ही बर्तन हैं जिसके। स्वामी करपात्रीजी अत्यंत अल्पवय 8-9 वर्ष की आयु से ही सत्य की खोज हेतु घर से पलायन करते रहे, इसलिए उनके परिजनों द्वारा 9 वर्ष की अल्पायु में महादेवी नाम्नी कन्या के साथ उनका विवाह करा दिया गया । विवाह के पश्चात् तथा पत्नी के आ जाने पर भी वे घर-गृहस्थी के प्रति पूर्ववत् ही उदासीन एवं अनासक्त रहते । साधु-संतो में ही उनका मन रमा रहता था ।

वे संसार से विरक्त रहते थे । पिता ने जान लिया कि अब यह अधिक दिनों तक घर में टिकने वाला नहीं है। पिता की इच्छा थी कि एक संतान हो जाती तो वंश चलने लगता। पिता की इच्छा पूरी हुई और करपात्रीजी की सत्रह वर्ष की अवस्था में उनके घर एक कन्या का जन्म हुआ। तदुपरांत कुछ ही दिनों पश्चात वे घर से निकल पड़े। पारिवारिक जनों ने इन्हें पुन: घर लौटाने का बहुत प्रयत्न किया, परंतु वे संसार की नश्वरता से परिचित हो चुके थे । उन्हें उत्कट वैराग्य जाग्रत हो चुका था। अत: परमार्थ-पथ से लौटकर पुन: घर आना उन्हें स्वीकार नहीं हुआ। उसी वर्ष उन्होंने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा ली और हरि नारायण से हरिहर चैतन्य बन गये। अलवर में नर्मदा के तट पर स्वामी श्री विश्वेश्वरानंदजी करपात्री के विद्यागुरु थे । विद्याध्ययन के प्रति ललक और गति इतनी तीव्र थी कि सम्पूर्ण वर्ष का पाठ्यक्रम घंटों और दिनों में हृदयंगम कर लेते।

वहां करपात्री ने दो वर्ष के अल्पकाल में ही व्याकरण, न्याय, सांख्य और वेदान्त की शिक्षा प्राप्त की और प्रस्थानत्रयी आदि विषयों मेें निपुण हो गए। करपात्री ने षड्दर्शनाचार्य स्वामी श्री विश्वेश्वराश्रमजी महाराज से व पंजाबी बाबा श्री अच्युतमणिजी महाराज से अध्ययन ग्रहण किया और17 वर्ष की आयु से हिमालय गमन प्रारंभ कर अखंड साधना, आत्मदर्शन, धर्म सेवा का संकल्प लिया। काशी धाम में शिखासूत्र परित्याग के बाद विद्वत, संन्यास प्राप्त किया। एक ढाई गज़ कपड़ा एवं दो लंगोटी मात्र रखकर भयंकर शीतोष्ण, वर्षा सहन करना उनका स्वभाव बन गया था।

गंगातट पर फूस की झोंपड़ी में एकाकी निवास, घरों में भिक्षाग्रहण करना, चौबीस घंटों में एक बार, भूमिशयन, निरावण चरण अर्थात पद यात्रा इनका कार्य बन गया। गंगातट नखर में प्रत्येक प्रतिपदा को धूप में एक लकड़ी की कील गाड़कर एक पैर से खड़े होकर तपस्यारत रहते। चौबीस घंटे व्यतीत होने पर जब सूर्य की धूप से कील की छाया उसी स्थान पर पड़ती, जहाँ 24 घंटे पूर्व थी, तब दूसरे पैर का आसन बदलते। ऐसी कठोर साधना और घरों में भिक्षा के कारण करपात्री कहलाए। श्री विद्या में दीक्षित होने पर धर्मसम्राट का नाम षोडशानन्द नाथ पड़ा। 24 वर्ष की आयु में परम तपस्वी श्री स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वतीजी महाराज से विधिवत दण्ड ग्रहण कर अभिनवशंकर के रूप में प्राकट्य हुआ। एक सुन्दर आश्रम की संरचना कर पूर्ण संन्यासी बनकर परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री स्वामी हरिहरानंद सरस्वती करपात्रीजी महाराज कहलाए। उनका अधिकांश जीवन वाराणसी में ही बीता।

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