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हमारे जनमाध्यमों की विश्वसनीयता का सवाल

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  • पत्रकारिता शिक्षण के सौ साल बाद फेक न्यूज का गहरा संकट

सर्वे के अनुसार केवल 38 प्रतिशत भारतीयों का ही समाचारों की विश्वसनीयता पर भरोसा है। जबकि दूसरी तरफ फिनलैंड जैसे देश में 65 प्रतिशत लोग अपने समाचार माध्यमों पर विश्वास करते हैं। यह भी हमारे समाचार माध्यम प्रतिष्ठानों, उसमें काम करने वाले कर्मियों और पत्रकारिता के शैक्षिक संस्थानों के चिंतन का विषय होना चाहिए।

  • शिवकुमार विवेक

इसे विडंबना ही कहेंगे कि भारत में पत्रकारिता के शिक्षण के 100 वर्ष पूरे होने पर हम पत्रकारिता के विरुपों पर बात कर रहे हैं। सौ साल की यात्रा में जिस पत्रकारिता को ज्यादा परिपक्व, परिष्कृत और परिमार्जित रूप में दिखना चाहिए, वह अगंभीर गैर जिम्मेदार नजर आ रही है। यह बात पत्रकारिता के समग्र स्वरूप के बारे में कही जा रही है अन्यथा मुद्रित पत्रकारिता यानी समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने अपने भारतीय इतिहास में कई अवसरों पर बहुत गौरवशाली भूमिका का परिचय दिया है, वह चाहे स्वतंत्रता संग्राम का काल हो या आपातकाल।

लेकिन ऐसा लगता है कि उसे हम अतीत की बात के रूप में ही याद करेंगे। जनजीवन में समाचार माध्यमों की भूमिका तो बनी रहेगी किंतु प्रिंट की इतनी व्यापक और प्रभावी भूमिका रह सकेगी, इस बारे में अभी प्रतीक्षा करनी होगी। क्योंकि यह न केवल प्रिंट के लिए कठिनाई का समय चल रहा है बल्कि दूसरे माध्यमों के लिए भी अपनी भूमिका को नए सिरे से स्थापित करने की चुनौती का दौर है।

समाचार पत्र-पत्रिकाएं बदलाव के दौर में अस्तित्व के गहरे संकट से जूझ रहे हैं। पूंजी और पाठकों के अभाव में केवल कुछ साधन संपन्न संगठन ही समाचार पत्र का संचालन कर सकते हैं। आर्थिक संकट ने सभी समाचार पत्रों की संपादकीय स्वतंत्रता पर भी अंकुश लगाने के रास्ते खोले हैं या उसे किन्हीं निहित स्वार्थों के घेरे में लाने के लिए मजबूर कर दिया है। स्पष्ट है कि समाचार-विचारों के संप्रेषण की स्वतंत्र और निष्पक्ष (दबाव रहित) स्पर्धा अब पहले की तरह टिके नहीं रहने वाली है। ऐसे में समाचार पत्र अपनी उसी खूबी को खो सकते हैं जो केवल उनके पास है। यह है विश्वसनीयता की पूंजी। यह पूंजी तमाम दूसरे माध्यम नहीं पा सके हैं। उनके पास साधन-संसाधन और टीआरपी वाले श्रोता-दर्शक हो सकते हैं किंतु विश्वसनीयता की कमाई नहीं है। निजी चैनलों ने सबसे बुरे तरीके से विश्वसनीयता को गंवाया है।

नब्बे के दशक में शुरू हुए टेलीविजन के निजी समाचार चैनलों ने लोगों को समाचार जानने का एक और बड़ा जरिया दिया। केंद्र सरकार ने 23 नवंबर 1996 को प्रसार भारती कानून लाकर दूरदर्शन के एकाधिकार को खत्म किया और निजी चैनलों के हाथों में समाचार का भी बड़ा बाजार सौंपा था। (जिसके भी अगले साल पच्चीस साल पूरे हो रहे हैं।) इस माध्यम ने भौगोलिक, आर्थिक व साक्षरता की सीमाओं को तोड़कर व्यापक पहुंच बनाई है। आज देश के बीस करोड़ से अधिक घरों में टेलीविजन सेट हैं।

इस माध्यम को अपनी ताकत का इस्तेमाल करके समाज की जरूरत का जरिया बनना चाहिए था। लेकिन उल्टे समाचार चैनलों ने गैरजिम्मेदारी का परिचय देकर साख ही खोई। इतनी कि आज इनके समाचार चयन और प्रस्तुतिकरण को लेकर अंगुली उठाते-उठाते थककर समाचार देखना बंद कर चुके दर्शकों की तादाद बढ़ती जा रही है। अफसोस की बात यह है कि तीन दशक बाद भी यह माध्यम अपने निश्चित चरित्र को विकसित नहीं कर पाया है। भारतीय पत्रकारिता चौबीस घंटे त्वरित समाचार देने वाले इस माध्यम के परिपक्व होने की प्रतीक्षा करते-करते बुढ़ा गई।

हाल के दिनों में नए सूचना माध्यम के रूप में सोश्यल मीडिया विकसित हुआ है लेकिन उसने भी अनियंत्रित, स्वेच्छाचारी और गैरजिम्मेदार माध्यम का रूप ले लिया। इसे विडंबना ही कहेंगे कि पत्रकारिता शिक्षण के सौ साल बाद हम एक फेक न्यूज के गहरे संकट से भी जूझ रहे हैं। सोश्यल मीडिया की असत्य, अप्रामाणिक और असंतुलित खबरें पत्रकारिता के सबसे कीमती मूल्य, जिसे उसका मूलाधार ही माना जाता है, विश्वसनीयता को गंभीर चोट पहुंचा रही हैं। ऐसे में जाहिर है कि आम आदमी के सामने सही सूचना पाने का संकट पैदा हो खड़ा हो गया है। विचारों के मामले में फैल रहे प्रदूषण की बात तो दूसरी है।

ऐसे में दूरदर्शन का फिर से प्रासंगिक होना एक महत्वपूर्ण घटना है। हाल में हमारे एक गैर पत्रकार मित्र ने कोविड काल में निजी चैनलों की गैरजिम्मेदार, अधकचरी और असंतुलित पत्रकारिता से आजिज आकर एक अन्य पत्रकार मित्र से पूछा कि हमें कोविड महामारी के आपदाकाल में, जब घर में भय, नैराश्य और भ्रम का माहौल है, कौन सा चैनल देखना चाहिए। उन्होंने मुझे अचरज भरे शब्दों में बताया कि उन स्वतंत्रचेता पत्रकार मित्र ने दूरदर्शन देखने की सलाह दी। साथ ही, कहा कि वे सच्ची और संतुलित खबरों के लिए अखबारों के पास जाएं। एक और अनुभव तब आया जब हमारे ही बच्चों ने हमें निजी समाचार चैनल देखने पर टोकते हुए एक दिन कहा कि यह आप क्या सुनते हैं।

वैसा ही आपका दिमाग (शायद उनका आशय ‘एकतरफा, अर्धसत्य को सत्य की तरह समझने वाला और आधी-अधूरी व भ्रामक सूचनाओं से लैश’ से था।) भी बन रहा है। उनका यह ऐतराज खासतौर पर टीवी चैनलों पर लगभग हर रोज गैर प्रासंगिक मुद्दों पर अनावश्यक बहसों और लंबी-लंबी समाचार बुलेटिनों को देखने पर था। समाचारों के मामले में एक प्रतिस्पर्धी विद्यार्थी ने कहा कि देश में क्या हो रहा है, उसकी असल तस्वीर टीवी चैनलों से मिलती ही नहीं है। वे दिल्ली या उत्तर भारत की खबरों से भरे होते हैं। दक्षिण में क्या कुछ घट रहा है, हमें पता ही नहीं चलता। ऐसा टीआरपी के चक्कर में होता है। जिन सनसनीखेज या सस्ती खबरों से टीआरपी बन सकती है, चैनल उसमें पूरी जान खपा देते हैं। सुशांत सिंह हत्याकांड का कवरेज हाल का उदाहरण है।

ऐसे में दूरदर्शन ने उस समाचार प्रसारक की छवि को बरकरार रखा है जो देश की व्यापक और लगभग यथार्थ तस्वीर को रखता है। चाहे कोई खबर टीआरपी लाती हो नहीं, यदि देश के नागरिक को जानना चाहिए तो दूरदर्शन समाचार पर वह मिल जाएगी। प्रस्तोताओं की शालीनता, गंभीरता और समझ उसे अधिक संप्रेषणीय बना देती है। राज्यसभा टीवी की पिछली बहसों का मुकाबला कोई भी निजी चैनल नहीं कर सकता। कोविडकाल में चिकित्सकों से सलाह व उनकी विशेषज्ञ राय के साथ ही जनता को मार्गदर्शन देने में दूरदर्शन ने सराहनीय भूमिका निभाई।

इसकी सचाई को आप पिछले सप्ताह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रायटर्स इंस्टीट्यूट ऑफ जर्नलिज्म द्वारा किए गए सर्वे में देख सकते हैं। इसमें दूरदर्शन को चैनलों में दूसरे क्रम पर देश का सबसे विश्वसनीय चैनल माना गया है। यद्यपि यहां श्रव्य माध्यम में आकाशवाणी के समाचारों की साख को भी याद करना होगा। दूरदर्शन व आकाशवाणी को सबसे ज्यादा विश्वसनीय माना गया है। यह भी गौर करने लायक है कि सर्वे के अनुसार केवल 38 प्रतिशत भारतीयों का ही समाचारों की विश्वसनीयता पर भरोसा है। जबकि दूसरी तरफ फिनलैंड जैसे देश में 65 प्रतिशत लोग अपने समाचार माध्यमों पर विश्वास करते हैं। यह भी हमारे समाचार माध्यम प्रतिष्ठानों, उसमें काम करने वाले कर्मियों और पत्रकारिता के शैक्षिक संस्थानों के चिंतन का विषय होना चाहिए।

इस सर्वे में एक महत्वपूर्ण बात यह उभरकर आई कि प्रिंट सभी माध्यमों में सर्वाधिक विश्वसनीय है। यद्यपि यह स्थापित सत्य है कि मुद्रित शब्द आज भी ब्रह्म है। मुद्रित माध्यम में शब्द चूंकि अमिट हो जाता है, इसलिए बहुत तौलकर लिखा जाता है। चैनलों के वायुगामी शब्दों और सोश्यल मीडिया के असंपादित और दायित्वहीन तथ्यों व भाषा की तुलना में पत्र-पत्रिकाओं के मुद्रित शब्दों का भरोसा ज्यादा है जिसे इस पतनकाल में कई लोग खत्म करने पर तुले हैं। एक हजार से ज्यादा टेलीविजन चैनलों की बाढ़ में अखबार की विश्वसनीयता का सबसे ऊपर होना चैनलों की पत्रकारिता के लिए शोचनीय विषय होना चाहिए।

इसी वर्ष न्यायालयों ने विभिन्न याचिकाओं का समाधान करते हुए सरकार से चैनलों और सोश्यल मीडिया पर नियंत्रण करने को कहा है। सरकार इस मामले में उनके आत्मनियंत्रण की रिवायत को जारी रखना चाहती है। ब्रॉडकास्टर एसोसिएशन ने कुछ नियम तय किए हैं जिसे चैनल बार-बार दिखाकर दर्शक को भरोसा दिलाते हैं कि वे कायदे से काम करने वालों में हैं किंतु खबरों के असंतुलन, भेदभाव, सतहीपन और अपूर्णता को सिर्फ चैनल संचालक ही रोक सकते हैं। क्योंकि बहुत सी खबरें वास्तव में अर्धसत्य के रूप में सामने आती हैं जिन्हें दौड़-भाग के युग में तत्काल ज्यों के त्यों परोसा जाता है। माध्यम की विश्वसनीयता का सवाल तात्कालिक लाभों के फेर में गौण कर दिया जाता है।

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