‘भारत की एक राष्ट्रीयता’ का शंखनाद करने वाले पुरोधा

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  • सप्रेजी हिन्दी नवजागरण के पुरोधा थे।
  • सप्रेजी ने हिन्दी में अर्थशास्त्रीय चिंतन की परंपरा का सूत्रपात किया। अर्थशास्त्र की हिन्दी शब्दावली तैयार की।
  • सप्रेजी ने हिन्दी समालोचना शास्त्र का परिष्कार किया।
  • सप्रेजी ने हिन्दी में मौलिक कहानी और निबंध लेखन विधा का परिमार्जन किया।
  • सप्रेजी ने राष्ट्रभाषा हिन्दी के उन्नयन के लिए जीवन समर्पित किया।
  • सप्रेजी ने लोकमान्य तिलक कृत ‘गीता रहस्य’ और समर्थ स्वामी रामदास कृत ‘दासबोध’ का अनुवाद कर हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि की।
  • सप्रेजी ने छत्तीसगढ़ में हिन्दी पत्रकारिता का सूत्रपात किया। (छत्तीसगढ़ मित्र, 1900)
  • सप्रेजी ने होनहार युवा प्रतिभाओं का परिष्कार कर राष्ट्रीय कार्यों में प्रवृत्त किया। यथा – माखनलाल चतुर्वेदी, द्वारकाप्रसाद मिश्र, सेठ गोविन्ददास, मावलीप्रसाद श्रीवास्तव, लक्ष्मीधर वाजपेयी, लल्लीप्रसाद पाण्डे।
  • सप्रेजी की वरेण्य सेवाओं का सर्वोच्च सम्मान करते हुए उन्हें हिन्दी साहित्य सम्मेलन के देहरादून अधिवेशन (1924) का अध्यक्ष चुना गया।


विजयदत्त श्रीधर

एक सौ पचास साल पहले, मध्यप्रदेश के दमोह जिले के पथरिया में, 19 जून 1871 को, हमारे चरित नायक माधवराव सप्रे का जन्म हुआ। कभी मराठा शासकों की प्रशासनिक व्यवस्था संभालने के लिए महाराष्ट्र से आया सप्रे-परिवार कई पीढिय़ों तक सम्पन्न और खुशहाल था। फिर वक्त के थपेड़ों में विपन्न हुआ। रोजी-रोटी के लिए विस्थापित हुआ। परन्तु बालक माधवराव कुशाग्र थे, सो पढ़ते गए। वजीफा मिला। बढ़ते गए। उन दिनों बहुत ऊँची मानी जाने वाली बी.ए. की डिग्री हासिल की।

चाहते तो फिरंगी हुकूमत में किसी ऊँचे ओहदे पर तैनात हो जाते। प्रस्ताव मिले भी थे, परन्तु स्वीकार नहीं किए। लोकमान्य बाल गंगाधर तिळक से गहरे तक प्रभावित माधवराव सप्रे ने सरकारी नौकरी के बजाय पेण्ड्रा के जमींदार के राजकुमार का शिक्षक बनना पसंद किया। वेतन पचास रुपये प्रतिमाह। यह घटना है सन् 1899 की। कुछ बचत जमा हुई तो उस दिशा में कदम आगे बढ़ाए, जो उनका लक्ष्य था। संकल्प था।

जनवरी, 1900 में पेण्ड्रा से मासिक ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का संपादन-प्रकाशन आरंभ किया। वामनराव लाखे और रामराव चिंचोलकर सहयोगी बने। पहले ‘दक्षिण कोसल’ कहे जाने वाले प्राकृतिक रूप से समृद्ध किंतु बदहाल इस भू-भाग को पहलेपहल सप्रेजी ने ‘छत्तीसगढ़’ की सार्वजनिक संज्ञा प्रदान की। वे शिक्षा के प्रसार और जन जागरण के माध्यम से छत्तीसगढ़ के विकास का वातावरण रचना चाहते थे। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होने से तीन वर्ष ही ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ निकल पाया। इस अल्पायु में भी पत्र ने, संपादक ने, असाधारण कृतित्व का परिचय दिया। छत्तीसगढ़ की धरती पर पत्रकारिता का पौधा रोपा। सुविचारित पत्रकारिता का संस्कार स्थापित किया। हिन्दी में समालोचना शास्त्र का व्यवस्थित स्वरूप निर्धारित किया। मौलिक कहानी की नींव रखी।

‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का अवसान सप्रेजी के लिए आघात था, परंतु एक अन्य ऐतिहासिक भूमिका का सूत्रपात कर गया। काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने ‘हिन्दी विज्ञान कोश’ की महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम शुरू किया। सप्रेजी भी योजनाकारों में शामिल थे। सवाल यह उठा कि आर्थिक खण्ड तैयार करने का दायित्व कौन निभाए। यह जिम्मेदारी माधवराव सप्रे पर आई। उन्होंने इसे बखूबी निभाया। अंग्रेजी के 1320 शब्दों के लिए हिन्दी के 2115 शब्द गढ़े।

सन् 1905 में ‘हिन्दी विज्ञान कोश’ का प्रकाशन हुआ। आज भले ही हिन्दी कोश अप्राप्य है, परन्तु सप्रेजी को उनके मौलिक अर्थशास्त्रीय चिंतन के लिए सदैव स्मरण किया जाएगा। सप्रेजी ने हिन्दी में अर्थशास्त्र की पुस्तक की पाण्डुलिपि तैयार की थी। परन्तु उससे वे संतुष्ट नहीं थे, इसलिए प्रकाशित नहीं कराया। जब आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने ‘सम्पत्तिशास्त्र’ लिखने का इरादा किया, तब सप्रेजी से परामर्श चाहा। द्विवेदीजी ने भूमिका में लिखा है कि सप्रेजी ने पाण्डुलिपि उन्हें भेज दी, जिससे उन्हें काफी सहायता मिली। वे सकल ज्ञान की पत्रिका ‘सरस्वती’ के नियमित लेखक थे और द्विवेदीजी उनकी प्रतिभा से काफी प्रभावित थे।

सन् 1905 में पं. माधवराव सप्रे ने नागपुर को केन्द्र बनाकर नये सिरे से कार्य आरंभ किया। यह तब के मध्यप्रान्त (सीपी एण्ड बरार) की राजधानी थी। सन 1906 में अच्छी हिन्दी पुस्तकों के प्रकाशन के लिए ‘हिन्दी ग्रंथमाला’ का आरंभ किया। कई उत्तम पुस्तकें प्रकाशित कीं। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी की ‘स्वाधीनता’ एक उदाहरण है। अप्रैल, 1907 में तिलकजी के मराठी ‘केसरी’ की भाव भूमि पर साप्ताहिक ‘हिन्दी केसरी’ का संपादन-प्रकाशन आरंभ किया। स्वाधीन-चेतना का यह मुखर-प्रखर पत्र फिरंगी हुकूमत की आँखों में खटकने लगा। सन 1908 में ‘हिन्दी केसरी’ पर शिकंजा कसने का बहाना हुकूमत ने ढूँढ लिया। राजद्रोह के आरोप में माधवराव सप्रे को गिरफ्तार कर लिया गया।

सप्रेजी के भाई सरकारी मुलाजिम थे। उन्हीं पर बड़े कुटुम्ब के पालन-पोषण का भार था। सरकार ने उन पर बहुत दबाव बनाया। बात नौकरी पर बन आई। कई दिनों तक माधवराव सप्रे अडिग रहे। झुकने को तैयार नहीं थे। परन्तु भाई की आत्महत्या की धमकी ने उन्हें माफीनामा पर हस्ताक्षर करने को मजबूर कर दिया। इस आत्मघाती कदम से वे टूट गए। जेल से छूटे, पर घर नहीं लौटे। प्रायश्चित करने एकांतवास पर चले गए। वर्धा के निकट हनुमानगढ़ में गुरुवर श्रीधर विष्णु परांजपे के आश्रम में पहुँचे। गुरु-आज्ञा से तेरह मास एकांतवास में काटे। समर्थ स्वामी रामदास कृत ‘दासबोधÓ के तेरह पारायण किए। मधुकरी से भोजन ग्रहण किया। सिर का साफा और पाँवों के जूते-चप्पल त्यागे। यह भी संकल्प लिया कि कहीं अपना नाम नहीं देंगे। किसी मंच पर नहीं जाएंगे।

कठोर प्रायश्चित का पालन कर एकांतवास से बाहर आए, तो रायपुर चले गए। रामदासी मठ बनाया। भजन-प्रवचन करने लगे। ‘दासबोध’ का हिन्दी में अनुवाद (1913) किया। यह पं. माधवराव सप्रे की एक और बड़ी भूमिका का श्रीगणेश था। लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक के कालजयी ग्रंथ ‘गीता रहस्य’ का सप्रेजी ने उत्कृष्ट भावानुवाद (1916) किया है। इस ग्रंथ के 24 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। तिलकजी ने मांडले जेल में छह साल के कारावास में ‘गीता रहस्य’ की रचना की थी। मराठी, हिन्दी, गुजराती, अँगरेजी में ‘गीता रहस्य’ उपलब्ध है। ‘महाभारत मीमांसा’ समेत कोई दस पुस्तकों का अनुवाद सप्रेजी ने किया है।

पं. माधवराव सप्रे का एक गुण अथवा दक्षता विशेष रूप से उल्लेखनीय है -होनहार प्रतिभाओं की परख करना और उन्हें वांछित कर्म-पथ पर अग्रसर करना। उन्होंने बड़ी संख्या में पत्रकारों, साहित्यकारों, स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ताओं को संस्कारित किया। माखनलाल चतुर्वेदी एक निबंध प्रतियोगिता के माध्यम से उनकी निगाह में आए। सप्रेजी की प्रेरणा से सरकारी अध्यापकी त्यागी और राष्ट्रीय कार्यों का व्रत लिया। पहले ‘प्रभा’ (1913 से 16) और फिर ‘कर्मवीर’ (1920 से 1959) का संपादन किया।

राष्ट्रीय धारा के प्रमुख कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। माखनलालजी को महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में जेल जाने वाले मध्यप्रान्त के पहले सत्याग्रही होने का गौरव मिला। द्वारका प्रसाद मिश्र भी सप्रेजी का चयन थे। वे ‘श्रीशारदा’, दैनिक ‘लोकमत’ और ‘सारथी’ के संपादक रहे। प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। इतिहास के विद्वान थे। राजनीति में भी आगे बढ़े। तीसरा उदाहरण सेठ गोविंददास का है, जिनकी ‘लक्ष्मी’ का ‘सरस्वती’ से नाता जोडऩे का काम सप्रेजी ने किया। वे अग्रणी हिन्दी सेवी के रूप में प्रतिष्ठित हुए। ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं।

‘सरस्वती’ और अन्य कई पत्रिकाओं में माधवराव सप्रे के निबंध प्रमुखता से प्रकाशित होते थे। उनके शिक्षा विषयक निबंध ज्यादातर ‘विद्यार्थी’ पत्रिका में छपे हैं। बाद में ऐसे बीस निबंधों का संकलन ‘जीवन संग्राम में विजय प्राप्ति के कुछ उपाय’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। आर्थिक मुद्दों पर उनके निबंध प्राय: ‘सरस्वती’ में छपे हैं। विषयों की विविधता उनके निबंधों में खूब मिलती है।

कृती व्रती पं. माधवराव सप्रे की प्रणम्य भूमिका राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा और धार देने की है। हिन्दी नवजागरण के वे पुरोधा हैं। ‘स्वदेशी आंदोलन और बायकाट’ अर्थात ‘भारत की उन्नति का एकमात्र उपाय’ शीर्षक निबंध में सप्रेजी ने भारत की दुर्दशा और उससे उबरने के उपायों को भली भाँति समझाया है। बंग-भंग विरोधी आंदोलन के समय इस निबंध ने पाठकों का ध्यान खींचा। इसे पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया, जिसकी 8000 प्रतियाँ छपी थीं। हमारे सामाजिक ह्रास के कुछ कारणों का विचार, राष्ट्रीयता की हानि का कारण, भारत की एक राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय जागृति की मीमांसा इत्यादि प्रखर वैचारिक निबंधों के माध्यम से सप्रेजी ने जन जागरण का महत्वपूर्ण काम किया।

हिन्दी साहित्य सम्मेलन का पंद्रहवाँ अधिवेशन नवंबर 1924 में देहरादून में सम्पन्न हुआ। इसकी अध्यक्षता पं. राधाचरण गोस्वामी को करनी थी। अस्वस्थता के कारण वे नहीं आ पाए तब नया अध्यक्ष चुनने की समस्या आई। सर्वसम्मति से पं. माधवराव सप्रे को यह गुरुतर दायित्व सौंपा गया। अध्यक्षीय आसंदी से सप्रेजी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकारने की अपील की। यहाँ उन्होंने पराधीनता की बेडिय़ाँ काटने का भी आह्वान किया।

भरतपुर हिन्दी संपादक सम्मेलन के सभापति के आसन से ‘कर्मवीर’ संपादक माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा था – ”आज के हिन्दी भाषा के युग को पण्डित महावीरप्रसादजी द्विवेदी द्वारा निर्मित तथा तेज को पण्डित माधवरावजी सप्रे द्वारा निर्मित कहना चाहिए।’ यह सप्रेजी का सर्वथा सटीक मूल्यांकन है।

पचपन वर्ष की आयु में 23 अप्रैल 1926 को, सप्रेजी की जीवनलीला समाप्त हुई। रायपुर में उनकी भौतिक देह का विसर्जन हुआ। उनका कृतित्व बहुआयामी है। अवदान असाधारण और कालजयी है। सर्वथा योगेश्वर श्रीकृष्ण के गीता-संदेश के सदृश – ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’। पत्रकारिता, साहित्य-सृजन, राष्ट्रभाषा हिन्दी का उन्नयन, जन जागृति, स्वाधीनता आंदोलन, शिक्षा-संस्कार, नई पीढ़ी की दीक्षा इत्यादि विविध क्षेत्रों में सप्रेजी ने आधारभूत कार्य किया।

परन्तु किसी फल की कामना से नहीं। किसी उपलब्धि का लक्ष्य लेकर वे नहीं चले। नाम और यश की भी चाह नहीं की। ऐसे कर्मयोगी पं. माधवराव सप्रे की साद्र्ध शती (1871-2021) उनके अवदान और कृतित्व का पुनर्पाठ करने का सुअवसर है। यह माधवराव सप्रे का महत्व और चिरकालिक प्रासंगिकता को आत्मसात करने का अवसर है। विशेष रूप से नई पीढ़ी के लिए, ताकि वह उस कर्म-पथ पर अगसर हो जिसका दिग्दर्शन सप्रेजी कर गए हैं।

(लेखक संस्थापक-संयोजक, सप्रे संग्रहालय, भोपाल हैं।)

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