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जो जीता, वही पेशवा बाजीराव

  • कैलाश विजयवर्गीय
    भारत के इतिहास की सटीक जानकारी देने के लिए पाठ्यक्रम में बदलाव को लेकर एक वर्ग बार-बार छाती पीटता रहता है। हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ने पाठ्यक्रम में बदलाव किया तो राजनीति शुरु हो गई। इतिहास की पुरानी पाठ्य पुस्तक पढ़ने वाले जानते हैं कि भारतीय योद्धाओं के स्थान पर विदेशी आक्रांताओं को ज्यादा महत्व दिया गया। सबसे बड़ा उदाहरण है 20 वर्ष की आयु से लगातार 20 साल में 41 युद्ध जीतने वाले महान योद्धा पेशवा बाजीराव की इतिहास में उपेक्षा। हम मुहावरे सुनते आ रहे हैं कि जो जीता वही सिकन्दर। अब इस मुहावरे को बदलने की जरूरत है जो जीता वही, बाजीराव होना चाहिए। अकबर महान था के स्थान पर राणा प्रताप महान थे, यह पढ़ाया जाना चाहिए। इतिहास की सटीक जानकारी देकर ही हम अजेय योद्धा पेशवा बाजीराव के जीवन के बारे में सच्चाई जान सकते हैं। कहानियों और फिल्मों में केवल बाजीराव-मस्तानी की प्रेम कहानी ही पढ़ाई और दिखाई जाती रही है। ‘अजेय हिन्दू सेनानी सम्राट’ महान सेनानायक पेशवा बाजीराव प्रथम की 28 अप्रैल को पुण्यतिथि है। छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने के लक्ष्य को पेशवा बाजीराव ने पूरा किया था। 40 वर्ष की आयु में बाजीराव का निधन नहीं होता तो हिन्दुस्तान की तस्वीर दूसरी होती। बाजीराव का एक ही लक्ष्य था दिल्ली की मुगल सल्तनत को उखाड़ फेंकना और भारत को हिन्दू स्वराज स्थापित करना था। इतिहास में यह नहीं पढ़ाया जाता है कि किस तरह थोड़े से सैनिकों के साथ दिल्ली पहुंचकर बाजीराव ने मुगल सल्तनत को झुकने को मजबूर कर दिया था। इतिहास में यह दर्ज है कि छत्रपति शिवाजी महाराज अपने पुत्र और चार हजार मराठा सैनिकों के साथ 9 मई 1966 को मुगल बादशाह औरंगजेब के दरबार में पहुंचे थे। औरंगजेब ने शिवाजी महाराज का उचित सम्मान नहीं किया। निडर शिवाजी ने भरे दरबार में औरंगजेब को विश्वासघाती कहा तो उन्हें जयपुर भवन में कैद कर लिया गया। कुछ समय बाद शिवाजी औरंगजेब की कैद से भाग निकले और उन्होंने मुगल सल्तनत को तहस-नहस करने का प्रण लिया था। मुगल सल्तनत को झुकाने के शिवाजी महाराज के प्रण को पूरा किया 20 वर्ष के बाजीराव बल्लाल भट्ट ने। युवा बाजीराव के भय के कारण औरंगजेब का नाती मोहम्मद शाह रंगीला ने खुद को दिल्ली के लालकिले में बंद कर लिया और भगाने की योजना बनाने लगा था। 10 दिन की दूरी घोड़ों पर 48 घंटों में पूरी करने वाले बाजीराव का आज तक कोई मुकाबला नहीं कर पाया। बाजीराव मुगल सल्तनत को झुकने पर मजबूर करने के बाद वापस लौट गए। लड़ाई के मैदान में कुशल रणनीति बनाने में माहिर बाजीराव को गुरिल्ला युद्ध में भी महारत हासिल थी। 41 युद्ध जीतने वाले बाजीराव ने मुगलों के आतंक के साथ ही हिन्दुस्तान की जनता को पुर्तगालियों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। विदेशी आक्रांताओं हमारे मंदिरों को तोड़ा और लोगों को जबरन धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया। इन विदेशी आक्रांताओं ने महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा। विदेशी आक्रांताओं के आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए बाजीराव ने उत्तर से लेकर दक्षिण तक अधिकार जमा लिया था। इसी कारण लोग उन्हें शिवाजी का रूप मानते थे। ऐसे महान अजेय योद्धा को पुण्य तिथि पर कोटिशः नमन।

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